

मध्य प्रदेश के धार भोजशाला विवाद की सुनवाई टालने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया है. मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने गुरुवार (2 अप्रैल, 2026) से शुरू हो रही हाई कोर्ट की सुनवाई पर रोक की मांग की थी. चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने कहा कि उसे अभी मामले में दखल देने की जरूरत नहीं लगती. मुस्लिम पक्ष परिसर की वीडियोग्राफी समेत दूसरी बातों को लेकर अपनी आपत्ति हाई कोर्ट में ही रखे.
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की तरफ से संरक्षित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर को लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि वह मां वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है. इसका निर्माण 11वीं सदी में परमार वंश के राजा ने कराया था. वहीं मुस्लिम समुदाय इस जगह को कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है. मामला फिलहाल मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में लंबित है. हाई कोर्ट के आदेश पर 2024 में परिसर का वैज्ञानिक सर्वे हुआ था. अब मामले की अंतिम सुनवाई होने जा रही है.
मस्जिद पक्ष के वकील सलमान खुर्शीद ने हाई कोर्ट में सुनवाई को टालने की मांग की. खुर्शीद ने कहा कि ASI की तरफ से करवाई गई वीडियोग्राफी की कॉपी मस्जिद कमेटी को नहीं मिली है. उन्हें ASI रिपोर्ट पर जवाब दाखिल करने का मौका मिलना चाहिए. जल्दबाजी में सुनवाई नहीं होनी चाहिए. खुर्शीद ने कहा- वहां खुदाई भी करवाई गई थी, जबकि इससे सुप्रीम कोर्ट ने मना किया था.
हिंदू पक्ष की तरफ से वकील विष्णु जैन और बरुन सिन्हा पेश हुए. उन्होंने कहा कि गुरुवार को हाई कोर्ट में सुनवाई है. वहां सभी बातें रखी जा सकती हैं. हिंदू पक्ष रंगीन तस्वीरें और वीडियो मांगने वाला है. दूसरा पक्ष भी ऐसा कर सकता है. जैन ने यह भी बताया कि मुस्लिम पक्ष का वीडियो मांगने वाला आवेदन हाई कोर्ट में लंबित है. उसे खारिज नहीं किया गया है
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने कहा कि फिलहाल सभी पक्षों को हाई कोर्ट में ही अपनी बात रखनी चाहिए. हाई कोर्ट सभी दलीलों पर कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत विचार करेगा. हाई कोर्ट वीडियो और तस्वीरें मांगने वाले आवेदनों पर भी विचार करेगा. सुप्रीम कोर्ट अभी इस मामले में कोई दखल नहीं देना चाहता.



