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‘कुरान और बाइबिल में भी है गाय का महत्व’, ममता कुलकर्णी ने फिल्म ‘गोदान’ को बताया हर भारतीय के लिए जरूरी

Mamta Kulkarni Claims Seeing Lord Kalki Supports Godaan Movie Cow Importance

Mamta Kulkarni: भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में ‘गौ-माता’ के महत्व को उजागर करने के लिए निर्देशक अमित प्रजापति की फिल्म ‘गोदान’ जल्द ही बड़े पर्दे पर दस्तक देने वाली है। यह फिल्म न केवल धार्मिक बल्कि गाय के वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व को भी रेखांकित करती है। हाल ही में विवादों और अपने आध्यात्मिक बयानों को लेकर चर्चा में रहीं पूर्व अभिनेत्री और साध्वी ममता कुलकर्णी ने इस फिल्म का पुरजोर समर्थन किया है।

ममता ने आईएएनएस (IANS) के साथ एक विशेष बातचीत में फिल्म की सराहना की और सभी देशवासियों से इसे देखने की अपील की। उन्होंने जोर देकर कहा कि गाय का सम्मान किसी एक धर्म तक सीमित नहीं होना चाहिए।

सभी धर्मों में पूजनीय है गाय: ममता कुलकर्णी

ममता कुलकर्णी ने कहा कि कामधेनु इंटरनेशनल प्रोडक्शन की फिल्म ‘गोदान’ भारतीय संस्कृति और विज्ञान का एक अनूठा संगम है। उन्होंने साझा किया, “गाय का जिक्र सिर्फ वेदों और पुराणों में ही नहीं, बल्कि बाइबिल और कुरान में भी है। मैंने इन सभी ग्रंथों का अध्ययन किया है और कहीं भी गाय की हत्या को सही नहीं ठहराया गया है।” उन्होंने कहा कि गाय सभी धर्मों में मां के समान है और उसकी हत्या पूरी तरह वर्जित होनी चाहिए।

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कल्कि अवतार और भविष्य की चेतावनी

अपने आध्यात्मिक अनुभवों पर चर्चा करते हुए ममता ने दावा किया कि वे 25 वर्षों की तपस्या के बाद समाधि की अवस्था तक पहुँच चुकी हैं। उन्होंने एक चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा, “मैंने भगवान विष्णु के दसवें अवतार भगवान कल्कि का प्रशिक्षण और दर्शन देखा है। अब एक ऐसा समय आने वाला है जब गाय दूध देना बंद कर देगी। जैसे आज हम पानी बर्बाद कर रहे हैं, वैसा ही परिणाम हमें भुगतना होगा। जो लोग अभी नहीं जागे, उनके लिए बहुत देर हो जाएगी।”

“युद्ध और भुखमरी हमारे कर्मों का फल”

ममता कुलकर्णी ने समाज की मानसिक स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे ‘विकृति’ करार दिया। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का हवाला देते हुए कहा कि आज दुनिया में जो युद्ध और भुखमरी दिख रही है, वह हमारे गलत कर्मों का ही फल है। उन्होंने चेतावनी दी कि लोगों को गाय को नुकसान पहुँचाने से पहले दस बार सोचना चाहिए। फिल्म ‘गोदान’ के जरिए वे लोगों को यह संदेश देना चाहती हैं कि प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता ही मानवता की रक्षा कर सकती है।

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