
काठमांडू: साउथ एशिया की कूटनीति में इस वक्त एक ऐसा खेल चल रहा है, जिसने नेपाल और बांग्लादेश के हुक्मरानों की रातों की नींद उड़ा दी है. खुद को बड़ा रणनीतिकार समझने वाले इन देशों को अंदाजा भी नहीं था कि भारत के खिलाफ चीन या पाकिस्तान कार्ड खेलना इन्हें कितना भारी पड़ जाएगा. नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह ने जब भारत की आस्था के सबसे बड़े प्रतीक यानी कैलाश मानसरोवर यात्रा पर उंगली उठाने की जुर्रत की, दिल्ली ने बिना कोई शोर मचाए चुपके से एक ऐसा ‘पावर प्लांट गेम’ खेल दिया कि काठमांडू से लेकर ढाका तक हड़कंप मच गया. भारत ने इन दोनों देशों की वो दुखती नस दबा दी है, जिसके बाद अब उनके पास सुधरने के अलावा और कोई चारा नही है.
क्या है नेपाल और बांग्लादेश की ये डील?
हाल ही में नेपाल, भारत और बांग्लादेश के त्रिकोणीय पावर कॉरिडोर से एक ऐसी खबर आई है जिसने ये साफ कर दिया है कि इस पूरे इलाके की एनर्जी जियोपॉलिटिक्स की चाबी सिर्फ और सिर्फ दिल्ली के पास है. दरअसल, इस साल नेपाल ने एक बड़ा आर्थिक लक्ष्य तय किया था. नेपाल सरकार और वहां की इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी ने योजना बनाई थी कि वो इस साल बांग्लादेश को दी जाने वाली बिजली की मात्रा में भारी बढ़ोतरी करेंगे. प्लान के मुताबिक, नेपाल को बांग्लादेश को 40 MW बिजली बेचनी थी, जिसे बढ़ाकर इस साल 60 MW करने का इरादा था. नेपाल के लिए ये सौदा बेहद फायदेमंद था क्योंकि इससे उसकी अर्थव्यवस्था को एक नई रफ्तार मिलती और खजाना भर जाता.
इस पूरे मामले में एक बहुत बड़ा ट्विस्ट तब आया जब भारत सरकार की तरफ से ये साफ कर दिया गया कि हमारी आधिकारिक परमिशन के बिना इस कॉरिडोर में एक यूनिट बिजली का भी ट्रांसफर नहीं किया जा सकता. भारत के इस कड़े रुख के पीछे कोई अड़ंगा लगाने की मंशा नहीं, बल्कि तकनीकी और भौगोलिक हकीकत है.
भारत का ट्रांसमिशन नेटवर्क: क्यों मजबूर हैं पड़ोसी देश?
भौगोलिक रूप से देखें तो नेपाल और बांग्लादेश के बीच कोई सीधी जमीनी सीमा नहीं है जो उन्हें एक-दूसरे से जोड़ती हो. नेपाल की पहाड़ियों और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स से जो भी बिजली पैदा होती है, उसे बांग्लादेश तक पहुंचाने के लिए भारत की जमीन और भारत के ‘ट्रांसमिशन नेटवर्क’ यानी बिजली की लाइनों का इस्तेमाल करना ही पड़ेगा. यही वो नस है जिसे भारत ने मजबूती से पकड़ रखा है.
जैसे ही बांग्लादेश ने नेपाल से एक्स्ट्रा 20 MW बिजली इम्पोर्ट करने की तैयारी शुरू की, भारत की सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) ने इस पर अपनी रिपोर्ट दी. भारत की इस शीर्ष संस्था ने ‘ट्रांसमिशन लाइन कैपेसिटी’ यनी बिजली ले जाने वाले तारों की क्षमता का तकनीकी हवाला देते हुए इस अतिरिक्त बिजली के अप्रूवल को फिलहाल रोक दिया है. तकनीकी भाषा में कहें तो मौजूदा लाइनों पर पहले से ही लोड बहुत ज्यादा है और बिना किसी नए एग्रीमेंट या इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड के इस क्षमता को बढ़ाना संभव नहीं है.
नेपाल और बांग्लादेश ने मिलकर बिजली के व्यापार का एक बड़ा प्लान तैयार तो कर लिया था लेकिन जब तक भारत का ट्रांसमिशन नेटवर्क इसके लिए हामी नहीं भरता, तब तक ये योजना सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहने वाली है. ये पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि दक्षिण एशिया में बिजली पैदा करना जितना बड़ा काम है, भारत के साथ कूटनीतिक तालमेल बिठाना उससे भी कहीं ज्यादा जरूरी है.
अरबों की कमाई कर चुका है नेपाल: भारत से मिला है 1100 MW का अप्रूवल
इस पूरे विवाद के बीच एक बेहद दिलचस्प पहलू भी है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भारत ने नेपाल के विकास में हमेशा एक सच्चे दोस्त की भूमिका निभाई है. अगर आंकड़ों की बात करें तो नेपाल पहले ही भारत और बांग्लादेश के बाजारों को मिलाकर 1100 MW से ज्यादा बिजली एक्सपोर्ट करने की आधिकारिक मंजूरी भारत से हासिल कर चुका है.
सिर्फ पिछले एक साल के भीतर भारत को बड़े पैमाने पर बिजली बेचकर नेपाल ने अरबों रुपये का मुनाफा कमाया है, जिससे उसकी विदेशी मुद्रा भंडार को भारी मजबूती मिली है. इन आंकड़ों से जाहिर है कि भारत कभी भी नेपाल के आर्थिक विकास के रास्ते में नहीं आता, बल्कि जब बात द्विपक्षीय या त्रिपक्षीय समझौतों की होती है तो भारत अपने राष्ट्रीय हितों और तकनीकी सुरक्षा को सबसे ऊपर रखता है लेकिन अगर कोई देश भारत की सुरक्षा या उसकी धार्मिक-सांस्कृतिक यात्राओं पर राजनीति करने की कोशिश करेगा तो भारत को भी अपने हितों की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाने का पूरा हक है.
पावर प्लांट नहीं, ‘पावर पॉलिटिक्स’
इस पूरे घटनाक्रम ने दक्षिण एशिया के देशों को एक बहुत बड़ा और कड़ा सबक सिखाया है. आज के दौर में सिर्फ बड़ी-बड़ी नदियों पर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स खड़े कर देना या बिजली बना लेना ही काफी नहीं होता. अगर आपको उस बिजली को बेचना है और मुनाफा कमाना है तो आपको इस इलाके की ‘पावर पॉलिटिक्स’ और एनर्जी जियोपॉलिटिक्स को भी बहुत गहराई से समझना होगा.
अगर कूटनीतिक भूमिकाओं की बात करें तो इस पूरे खेल में नेपाल सिर्फ एक बिजली उत्पादक बनकर रह गया है, जो अपनी ही बनाई बिजली बेचने के लिए भारत की मंजूरी का इंतजार कर रहा है. वहीं, बांग्लादेश सिर्फ एक खरीदार है, जिसकी पूरी ऊर्जा जरूरतें और फैक्टरियां भारत-नेपाल समझौते पर टिकी हुई हैं. इन सबके बीच भारत एक मजबूत ट्रांजिट कॉरिडोर की भूमिका में है, जो पूरे ट्रांसमिशन ग्रिड और सुरक्षा मानकों का रखवाला है. इससे साफ हो जाता है कि दक्षिण एशिया का एनर्जी ग्रिड एक ऐसी चेन है जिसकी सबसे मजबूत कड़ी भारत है. नेपाल की बिजली बांग्लादेश की फैक्ट्रियों और घरों को तभी रोशन कर पाएगी, जब भारत का ग्रिड इसके लिए पूरी तरह तैयार और सहमत होगा.



