नई दिल्ली: आर्कटिक की बर्फ दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है. साइंस एडवांसेज नाम के जर्नल में छपी एक नई रिसर्च ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है. धरती का उत्तरी हिस्सा अब तक एक बड़े स्पंज की तरह काम करता था. यह हवा से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखता था. लेकिन नई स्टडी में एक बहुत ही डराने वाली बात सामने आई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि 2050 के दशक तक आर्कटिक कार्बन सोखना बंद कर देगा. इसके बाद यह खुद कार्बन छोड़ना शुरू कर देगा. इसका सीधा मतलब है कि ग्लोबल वार्मिंग बहुत तेजी से बढ़ेगी. पुराने क्लाइमेट मॉडल्स में सतह के नीचे छिपे कार्बन को नजरअंदाज किया गया था. लेकिन अब गहराई में छिपे इस पुराने कार्बन को भी कैलकुलेट किया गया है. यह धरती के भविष्य के लिए एक बहुत ही खतरनाक संकेत है.

आर्कटिक का कार्बन स्पंज 2050 तक कैसे बन जाएगा सबसे बड़ा दुश्मन?
सालों से क्लाइमेट मॉडल्स यह मानकर चल रहे थे कि उत्तरी इलाके हमारे लिए ढाल बनेंगे. वैज्ञानिकों को लगता था कि यह इलाका इस सदी के अंत तक कार्बन सोखता रहेगा. बढ़ते तापमान से बर्फ पिघल सकती है और ग्रीनहाउस गैसें निकल सकती हैं. लेकिन इसके साथ ही वहां पौधों की ग्रोथ भी तेज होती है. इससे वातावरण से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड सोखी जा सकती है. इसी वजह से पुराने मॉडल्स बताते थे कि यह इलाका कार्बन का नेट एब्जॉर्बर बना रहेगा. लेकिन नई रिसर्च कहती है कि यह तस्वीर पूरी तरह से अधूरी है. वैज्ञानिकों का कहना है कि पुराने मॉडल्स में एक बड़ी गलती थी. उन्होंने गहराई में छिपे पुराने कार्बन को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया था. यह कार्बन मुख्य रूप से साइबेरिया और अलास्का में बर्फ के नीचे दबा है. अगर यह बाहर आ गया तो क्लाइमेट चेंज को रोकना लगभग असंभव हो जाएगा.
वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि इस चूक का असर बहुत बड़ा है. इससे ऊंचे अक्षांशों पर जमा कार्बन के भंडार का सही अंदाजा नहीं लग पाया. यह समझना भी मुश्किल हो गया कि बर्फ पिघलने से कितना कार्बन बाहर आएगा. रिसर्च के अनुसार कार्बन से भरपूर सतह 10 मीटर नीचे तक हो सकती है. वहीं येडोमा डिपॉजिट्स की गहराई करीब 20 मीटर तक पहुंच सकती है. येडोमा डिपॉजिट्स एक खास तरह की बर्फ वाली जमीन होती है. इसे परमाफ्रॉस्ट कहा जाता है जो हजारों सालों से जमी हुई है. अगर यह पिघलती है, तो इसके अंदर मौजूद कार्बन बाहर आ जाएगा. कनाडा और अलास्का के बड़े हिस्से में भी ऐसे डिपॉजिट्स मौजूद हैं. इसलिए इस छुपे हुए खजाने को समझना बहुत जरूरी हो गया था.
नए मॉडल ने दुनिया को कौन सा डरावना सच बताया?
इस समस्या को सुलझाने के लिए वैज्ञानिकों ने ओआरसीएचआईडीईईएमआईसीटी मॉडल को अपडेट किया. आसान भाषा में कहें तो उन्होंने इस मॉडल को गहराई तक पढ़ना सिखाया. इस मॉडल ने देखा कि हजारों सालों में जमीन के नीचे कार्बन कैसे जमा हुआ. नए वर्जन ने आखिरी हिमयुग के बाद से बने डीप येडोमा डिपॉजिट्स का एनालिसिस किया. रिसर्चर्स ने 1900 से 2014 तक के ऐतिहासिक डेटा का इस्तेमाल किया. इसके बाद उन्होंने 2015 से 2100 तक के भविष्य का अनुमान लगाया. इसके लिए तीन अलगअलग सामाजिक और आर्थिक परिदृश्यों का उपयोग किया गया. इन नतीजों की तुलना पुराने मॉडल्स से की गई ताकि बदलाव को समझा जा सके. अपडेटेड मॉडल ने बताया कि उत्तरी मिट्टी में पुराने अनुमान से कहीं ज्यादा कार्बन जमा है.
आखिर बर्फ के नीचे दबा कार्बन अचानक से गैस कैसे बनने लगेगा?
जैसेजैसे आर्कटिक गर्म हो रहा है वैसे ही बर्फ भी तेजी से पिघल रही है. बर्फ के पिघलने से मिट्टी के अंदर मौजूद माइक्रोब्स एक्टिव हो जाते हैं. ये माइक्रोब्स हजारों सालों से जमे हुए ऑर्गेनिक मैटर को तोड़ना शुरू कर देते हैं. इस प्रोसेस की वजह से कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसें निकलती हैं. सिमुलेशन दिखाते हैं कि आर्कटिक की कार्बन सोखने की क्षमता लगातार कमजोर हो रही है. 2050 के आसपास उत्तरी इलाके कार्बन सोखने से ज्यादा उसे छोड़ना शुरू कर सकते हैं. इसका मतलब है कि क्लाइमेट की मदद करने वाला आर्कटिक अब उसे नुकसान पहुंचाएगा. तापमान बढ़ने से ऊपरी मिट्टी की परत हर गर्मियों में ज्यादा मोटी हो जाती है. आप इसे एक विशाल फ्रीजर को धीरेधीरे खोलने जैसा समझ सकते हैं. जितना गहरा पिघलाव होगा उतना ही ज्यादा कार्बन हवा में मिलेगा.
क्या यह खतरा वैज्ञानिकों के अनुमान से भी ज्यादा भयानक हो सकता है?
रिसर्चर्स ने चेतावनी दी है कि उनके अनुमान असल खतरे से कम हो सकते हैं. इसका कारण यह है कि मॉडल में कुछ महत्वपूर्ण प्रोसेस को पूरी तरह शामिल नहीं किया गया था. इसका एक उदाहरण बर्फ का अचानक से पिघलना है. कभीकभी परमाफ्रॉस्ट धीरेधीरे पिघलने के बजाय अचानक गिर सकता है. इससे भारी मात्रा में पुराना कार्बन हवा में मिल सकता है. एक और प्रोसेस थर्मोकार्स्ट झीलों से जुड़ा हुआ है. ये झीलें तब बनती हैं जब बर्फ वाली जमीन पिघलकर गड्ढों में बदल जाती है. पानी जमे हुए मिट्टी की तुलना में गर्मी को ज्यादा तेजी से ट्रांसफर करता है. इससे आसपास की बर्फ और जल्दी पिघलती है जो और ज्यादा गैसें रिलीज करती है. वाइल्डफायर और जमीन की बर्फ के डायनामिक्स को भी पूरी तरह शामिल नहीं किया गया था. ये सभी कारक भविष्य में कार्बन एमिशन को और ज्यादा बढ़ा सकते हैं. पहले के साइंटिस्ट्स इस अंधे बिंदु को नहीं देख पाए थे. लेकिन अब यह साफ है कि आर्कटिक की बर्फ हमारे लिए तबाही का कारण बन सकती है. धरती को इस बड़े खतरे से बचाने के लिए दुनिया भर के देशों को तुरंत एक्शन लेना होगा.



