अमेरिका और ईरान के बीच हुए एक नाजुक समझौते के बाद होर्मुज स्ट्रेट के फिर से खुलने से, अगर यह स्थिति बनी रहती है, तो इस वित्त वर्ष के बाकी समय में भारतीय कंपनियों पर मुनाफे का दबाव काफी कम हो सकता है. पहले जो अनुमान लगाया गया था, उसकी तुलना में यह राहत की बात है. क्रिसिल ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि एनर्जी मार्केट्स ने इस राहत पर तुरंत प्रतिक्रिया दी है और कच्चे तेल की कीमतें नरम हुई हैं. हालांकि, गैस और यूरिया जैसे जरूरी इनपुट की उपलब्धता में धीरेधीरे ही सुधार होने की उम्मीद है, क्योंकि संघर्ष के दौरान सप्लाईसाइड में आई दिक्कतों को ठीक होने में समय लगेगा. रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी इस स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की संख्या संघर्ष से पहले के लेवल से काफी कम है.

मार्जिन के अनुमान में बदलाव
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर यह समझौता कायम रहता है और आगे कोई रुकावट नहीं आती है, तो संघर्ष से प्रभावित 34 सेक्टरों पर ऑपरेटिंग मार्जिन का असर 100 बेसिस पॉइंट्स तक सीमित रहेगा . रिपोर्ट में कहा गया कि पहले, लंबे समय तक संघर्ष और स्ट्रेट के बंद रहने की आशंका को देखते हुए, हमने 200 बेसिस पॉइंट्स के असर का अनुमान लगाया था. साथ ही, सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च और खपत में स्थिरता की उम्मीदों से मांग की स्थिति मजबूत बनी हुई है. इसके अलावा, इनपुट लागत में बढ़ोतरी की भरपाई के लिए कीमतों में की गई नियंत्रित बढ़ोतरी से भी कमाई में मदद मिलनी चाहिए.
जल्द सामान्य होगी तेल की सप्लाई
रिपोर्ट में कहा गया कि रेटेड कॉर्पोरेट कर्ज का 65 प्रतिशत हिस्सा रखने वाले 34 सेक्टरों के हमारे विश्लेषण में यह माना गया है कि कच्चे तेल की सप्लाई जल्द ही सामान्य हो जाएगी और इस वित्त वर्ष में ब्रेंट की औसत कीमत 8085 डॉलर प्रति बैरल रहेगी. गैस की सप्लाई में थोड़ी देरी हो सकती है और इस वित्त वर्ष में कुल मिलाकर 4 महीने तक रुकावट की आशंका है. स्ट्रेट के फिर से खुलने से महंगी स्पॉट गैस पर भारत की निर्भरता भी धीरेधीरे कम होने की उम्मीद है.
रेवेन्यू और मार्जिन पर कम असर
रिपोर्ट के अनुसार, 24 सेक्टरों पर रेवेन्यू और मार्जिन दोनों पर बहुत कम असर पड़ेगा और रिकवरी मुख्य रूप से दूसरी छमाही में होगी. वहीं, बाकी 10 सेक्टरों पर काफी दबाव देखने को मिल सकता है, जहां ऑपरेटिंग मार्जिन संघर्ष से पहले के अनुमानों की तुलना में एकदसवें से एकतिहाई तक गिर सकता है. इन 10 में से चार सेक्टरों के लिए क्रेडिट क्वालिटी का आउटलुक स्थिर/न्यूट्रल है, क्योंकि बैलेंस शीट की मजबूती कम मुनाफे के असर को झेलने में मदद करेगी. वहीं, बाकी छह सेक्टर के लिए क्रेडिट क्वालिटी का आउटलुक थोड़ा नेगेटिव है, क्योंकि इन पर मुनाफ़े में दसवें हिस्से या उससे ज़्यादा का असर, वर्किंग कैपिटल की ज्यादा जरूरत और बैलेंसशीट की औसत मजबूती जैसे फैक्टर असर डाल रहे हैं.



