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सजा हो तो ऐसी, रिश्वतखोरी पर औरंगजेब ने कैसे अपनी ही बहन से छीना मल्लिका-ए-जहां का ओहदा?

रिश्वतखोरी और अवैध कमाई की बीमारी नई नहीं है. मुगल दौर के सबसे निरंकुश शासक के तौर पर चर्चित औरंगज़ेब के दौर में भी यह रोग खूब फलाफूला. शिकायतें पहुंचने के बाद भी या तो बादशाह ने इन्हें दरगुजर किया या खुद को बेबस पाया. बादशाह से सीधी मुलाकात या उनकी इनायत के लिए वजीरों को साधना जरूरी होता था. एवज में बड़ी रकम चुकता करने की शर्त रहती थी. और तो और औरंगजेब की बहन रोशनआरा ने वसूली में सबको पीछे छोड़ दिया.

सजा हो तो ऐसी, रिश्वतखोरी पर औरंगजेब ने कैसे अपनी ही बहन से छीना मल्लिका-ए-जहां का ओहदा?

मल्लिकाएजहां की हैसियत में गलत रास्तों से उसने खूब दौलत बटोरी. हालात इतने बदतर हो गए कि बादशाह शाहजहां की मौत के बाद रोशनआरा के खिलाफ दस्तावेजी सबूतों के पुलिदों के साथ औरंगजेब अपनी बड़ी बहन जहांआरा के पास पहुंच गया. इस सबको अपनी आत्मकथा में जहांआरा ने दर्ज किया है. पढ़िए उसी के कुछ अंश.

शाहजहां की मौत के बाद औरंगज़ेब आगरा में

शाहजहां की मौत के एक महीने बाद औरंगज़ेब आगरा पहुंचा. कैद के दौरान औरंगज़ेब की इजाज़त से उसकी बड़ी बहन जहांआरा पिता शाहजहां की देखभाल करती रही थी. गद्दी की लड़ाई में जहांआरा दारा के खेमे में थी. छोटी बहन रोशनआरा ने औरंगज़ेब का साथ दिया था. गद्दी पर बैठने के बाद औरंगज़ेब ने रोशनआरा को मल्लिकाएजहां का ख़िताब अता किया था. दारा का साथ देने के बाद भी जहांआरा से औरंगज़ेब के रिश्ते बिगड़े नहीं थे.

मुगल बादशाह शाहजहां.

असलियत में बादशाह बनने के बाद औरंगज़ेब को दरबार के जो पुराने कागज़ात मिले थे, उनसे उसे जानकारी हुई थी कि दारा की तरफदारी कर रहे शाहजहां से जहांआरा ने जेब को भी बेटे की ही तरह देखने और उसके साथ भी बराबर का इंसाफ़ करने के लिए लिखा था. यही वजह थी कि जब कैदी पिता शाहजहां की देखभाल के लिए जहांआरा ने साथ रहने की औरंगज़ेब से इजाज़त मांगी थी तो उसने कहा था कि ध्यान रखियेगा कि आप वहां कैदी नहीं हैं.

औरंगज़ेब ने जहांआरा यह कहकर चौंका दिया था कि कैदी पिता और उनके इर्दगिर्द रहने वाले हर कारिंदे की जासूसी होती थी लेकिन बहन को उसने इससे मुक्त रखने का हुक्म दे रखा था.

औरंगजेब.

जहांआरा पशोपेश में

दिलचस्प था कि शाहजहां की मौत के बाद औरंगज़ेब अपनी उस बहन को मल्लिकाएजहां के ओहदे के लिए राजी करने के लिए आगरा पहुंचा, जिसने गद्दी की लड़ाई में दुश्मन भाई दारा का साथ दिया था. इससे भी बड़ी बात थी कि इस मुकाम के लिए वह उस बहन रोशन आरा को बेदखल कर रहा था, जिसने सत्ता संघर्ष में उसका साथ दिया था और जबतब वह इसे जताने का कोई मौका नहीं चूकती थी. औरंगज़ेब की इस पेशकश को कुबूल करने में जहांआरा कई वजहों से हिचक रही थी.

उसने औरंगज़ेब से कहा, “दिमाग से सोचो. रोशन आरा का हक़ मारकर हमको क्या हासिल होगा? यह सच है कि दारा हमसे छोटा था. हमारा झुकाव उसकी ओर ज्यादा था. रोशन आरा के फौरन बाद तुम हुए थे. इसलिए वह हमेशा कहती और मानती थी कि उसके हिस्से के भाई तुम हो. इसलिए उसे ही मल्लिकाएजहां रहने दो.” लेकिन औरंगज़ेब टस से मस नहीं हुआ. जाते समय कागज़ात का एक मोटा बस्ता वह जहांआरा को सुपुर्द कर गया.

जहांआरा बेगम.

रोशन आरा की पैसे की हवस

मल्लिकाएजहां की हैसियत कुबूल करने को लेकर पशोपेश में पड़ी जहांआरा ने उस बस्ते के कागज़ात पढ़ना शुरू किया , जो औरंगज़ेब उसे हवाले कर दिल्ली वापस हो चुका था. जहांआरा ने लिखा, “न जाने दूसरों की तकलीफ़ से रोशन आरा को क्या सुकून मिलता है? मगर ऐसे लोग अपने स्वार्थ में इतने अंधे हो जाते हैं कि आखिर में अपना ही बुरा करते हैं. हम जैसेजैसे सरकारी कागज़ात, वाक़ियानिगारों, हरकारों की रिपोर्टें पढ़ते गए, वैसेवैसे कलेजा मुंह को आता गया. रोशन आरा को कितना सोनाचांदी, हीरेजवाहरात और रुपयापैसा चाहिए था! एक तरफ़ ईमानदारी और सादगी की मिसाल बादशाह आलमगीर तो दूसरी तरफ़ ठीक उसके उलट मल्लिकाएजहां. इन कागजातों में उसके खिलाफ़ हर तरह के भ्रष्ट बर्ताव और बेईमानी की शिकायतें थीं. हाकिमों से लेकर तिजारत और ज़ियारत करने वाले भी बादशाह से उसकी शिकायतें करने लगे थे. जब इन शिकायतों का पुलिंदा बढ़ता ही गया और जमुना का पानी हुकुमत के सिर के ऊपर से बहने लगा तब बादशाह औरंगजेब की सहने की हद खत्म हो गई.”

रोशनआरा बेगम.

ऊपर से नीचे तक रिश्वत

बाद में औरंगज़ेब ने रोशन आरा की मल्लिकाएजहां के ओहदे से छुट्टी कर दी थी. लेकिन वहां तो कुएं में भांग पड़ी थी. मशहूर इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने अपनी किताब ‘औरंगज़ेब’ में लिखा, ” नूरजहां का पिता जहांगीर का प्रधानमंत्री रहते निर्लज्जतापूर्वक रिश्वत मांगता था. औरंगज़ेब के शुरुआती वजीरों में एक जाफर खान का भी यही हाल था. उसने जयसिंह से दक्खिन की सूबेदारी बरकरार रहने के लिए सिफ़ारिश के वास्ते तीस हजार की थैली ली थी. दरबार में मामूली ओहदे पाने या उसे कायम रखने के लिए भी कुछ अलग से देना जरूरी था. घूस लेलेकर कई काजी खासे मालामाल हो गए. इनमें सबसे ज्यादा बदनाम अब्दुल वहाब था.”

मुगलों के दौर के सिक्के.

कहीं लुकछिप कर तो कहीं भेंटसौगात

औरंगज़ेब की खिदमत में रहने वाले कारिंदों को ऊपरी कमाई के खूब मौके मिलते थे. बादशाह से कुछ हासिल करने की उम्मीद करने वाले इनको साधने और खुश करने के लिए नकदी और कीमती सौगातें भेंट करते थे. ये अकेले में बादशाह को खुश देखकर किसी की सिफ़ारिश तो किसी का पत्ता कटवा देते थे. दिलचस्प है कि इन पर जो रकम चढ़ती, उसे देने वाला अपने से नीचे वाले से वसूलता. वसूली का यह सिलसिला नीचे पहुंचतेपहुंचते आखिर में व्यापारी और किसानों पर बोझ बनता.

यदुनाथ सरकार के अनुसार बेशक खुलकर रिश्वत लिया जाना ठीक नहीं समझा जाता था लेकिन जिनके काम रहते थे, उन्हें पता था कि काम करने वाला कैसे रास्ते पर आएगा? ज्यादातर मामलों में लुकछिपकर तो कहीं भेंटसौगातों की आड़ में खेल जारी रहता था. पैसे देकर कोई काम कराना या फिर मुकदमों में माफिक फैसला करा लेना मामूली बात थी.

लगातार युद्धों की वजह से वसूली ने पकड़ा जोर

राजशाही के उस दौर में बादशाह की इच्छा ही सबकुछ थी. आम आदमी की पहुंच बादशाह तक मुमकिन नहीं थी. ऐसे में दरबार से लेकर हुकूमत की निचली पायदान तक तैनात सरकारी लोगों के अख्तियार बेहिसाब थे. चूंकि बादशाह तक फरियाद पहुंचना आसान नहीं था, इसलिए जिनके हाथ में अधिकार थे, उनकी मनमानी से निजात का इकलौता तरीका उनकी नाजायज़ मांगों को पूरा करना था.

यदुनाथ सरकार के मुताबिक किसी राजनीतिक अधिकार की प्रजा कल्पना नहीं कर सकती थी और उसकी हालत भेड़ों सरीखी थी. निरंकुश राज्य में आम आदमी की और उसकी जमा पूंजी तथा अन्य संपत्ति की सलामती उन सरदारों मनसबदारों के रहम पर थी, जिनका उन पर सीधा नियंत्रण था. औरंगज़ेब के वक्त सरकारी अमले की लूट बढ़ने की एक बड़ी वजह उसका लगातार युद्धों में उलझा रहना भी था. इन युद्धों ने एक ओर शाही खजाने पर खर्चे का भारी बोझ बढ़ाया, दूसरी ओर बादशाह लंबेलंबे समय तक दिल्ली से दूर रहा. जाहिर था कि ऐसे में वजीरों सरदारों को मनमानी और हुकूमत में अपनी हैसियत के बेजा इस्तेमाल का खूब मौका मिला. उन पर हथियारों और सेना के लिए ज्यादा से ज्यादा रकम जुटाने का भी दबाव रहता था. इस आड़ में उन्होंने शाही खजाने के साथ ही अपने लिए दौलत जुटाने के नएनए रास्ते खोज निकाले.

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