नई दिल्ली : लगभग तीन साल तक सर्टिफिकेशन विवाद में फंसी रहने के बाद दिलजीत दोसांझ की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘सतलुज’आखिरकार ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज हो गई है। 3 जुलाई से स्ट्रीम हो रही इस फिल्म ने रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर चर्चा छेड़ दी है। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है।

पहले था ‘पंजाब ’95’, विवाद के बाद बदला नाम
निर्देशक हनी त्रेहान की इस फिल्म का मूल नाम ‘पंजाब ’95’ था, जिसे बाद में विवादों के चलते बदलकर ‘सतलुज’ कर दिया गया। फिल्ममेकर के मुताबिक, सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन ने फिल्म में 127 कट लगाने की मांग की थी, जिसके कारण इसकी रिलीज लंबे समय तक अटकी रही। अब यह फिल्म बिना किसी कट के नए शीर्षक के साथ ओटीटी पर उपलब्ध है।
दमदार स्टारकास्ट
फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालरा की भूमिका निभाई है। उनके साथ कंवलजीत सिंह,अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओहलयान भी अहम किरदारों में नजर आते हैं।
कौन थे जसवंत सिंह खालरा?
1952 में पंजाब के अमृतसर जिले के खालरा गांव में जन्मे जसवंत सिंह खालरा पहले बैंक कर्मचारी थे। 1980 के दशक के अंत में उन्होंने मानवाधिकारों से जुड़े मामलों पर काम करना शुरू किया।ऑपरेशन ब्लू स्टार, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 के सिखविरोधी दंगोंजैसी घटनाओं ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।
इसके बाद उन्होंने उन लोगों के मामलों की जांच शुरू की, जो कथित तौर पर पंजाब में उग्रवाद के दौर में लापता हो गए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्हें अमृतसर नगर निगम के रिकॉर्ड में ऐसे दस्तावेज मिले, जिनमें हजारों लोगों के नाम दर्ज थे, जिनका कथित तौर पर पुलिस द्वारा गुप्त रूप से अंतिम संस्कार किए जाने का दावा किया गया था। उनकी इस खोज ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक ध्यान आकर्षित किया।
1995 में खुद हो गए थे लापता
साल 1995 में जसवंत सिंह खालरा स्वयं रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गए। विभिन्न रिपोर्टों और मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, उन्हें आखिरी बार अपने घर के बाहर देखा गया था। बाद में आरोप लगे कि उन्हें पुलिसकर्मियों ने हिरासत में लिया था। इस मामले में लंबे समय तक कानूनी कार्रवाई चली और यह देश के चर्चित मानवाधिकार मामलों में शामिल रहा।
‘सतलुज’सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि पंजाब के उथलपुथल भरे दौर और मानवाधिकारों से जुड़े एक संवेदनशील अध्याय को बड़े पर्दे पर सामने लाने की कोशिश है। यही वजह है कि रिलीज के साथ ही यह फिल्म एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है।



