BusinessIndia

टेक की पिच पर अंबानी vs अडानी! मेटा के आने से मजेदार हुआ क्लाउड का खेल

मार्क जकरबर्ग ने AI इंफ्रास्ट्रक्चर में अरबों डॉलर लगाने का वादा किया है, जिससे लोगों को शक हुआ कि उनका सोशलमीडिया साम्राज्य इस सेक्टर से कैसे कमाई करेगा. अब हमारे पास इसका एक ठोस जवाब है. मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक. भारी खर्च वाले निवेश को कमाई के नए जरिए में बदल रहा है.

टेक की पिच पर अंबानी vs अडानी! मेटा के आने से मजेदार हुआ क्लाउड का खेल

ब्लूमबर्ग न्यूज ने पिछले हफ्ते मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के हवाले से बताया कि “मेटा कंप्यूट” नाम के एक इंटरनल इनिशिएटिव के तहत, कंपनी अपनी एक्स्ट्रा कैपेसिटी को बड़े बिजनेस क्लाइंट्स को किराए पर देने की योजना बना रही है. यह देखना बाकी है कि क्लाउड बिजनेस पर माइक्रोसॉफ्ट कॉर्प, अल्फाबेट इंक. और अमेजन डॉट कॉम इंक. के दबदबे को यह कितनी चुनौती दे पाती है. लेकिन इसकी शुरुआती हलचल कहां महसूस होगी, यह देखने के लिए भारत पर नजर रखना काफी जरूरी है.

क्लाउडकैपेसिटी के बिजनेस में जकरबर्ग के आने से एशिया के दो सबसे अमीर उद्योगपतियों, मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के बीच चल रही कड़ी टक्कर का स्वरूप पूरी तरह बदलने वाला है. कुछ समय पहले तक, ऐसा लग रहा था कि भारत में AI इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती होड़ में अडानी आगे निकल रहे हैं.

वे तेजी से हाइपरस्केल सर्वर फॉर्म बना रहे थे और Google को इंफ्रास्ट्रक्चर देने के लिए एक अहम पार्टनरशिप भी हासिल कर ली थी. पोर्ट, एयरपोर्ट और पावर ग्रिड के बिजनेस में माहिर अरबपति के लिए, डेटा सेंटर के कंक्रीट और कूलिंग सिस्टम वाले बिजनेस में आना एक स्वाभाविक कदम लग रहा था.

लेकिन ये योजनाएं अंबानी की महत्वाकांक्षाओं से टकराती हुई दिखाई दे रही हैं. अगर अडानी के इंफ्रास्ट्रक्चर साम्राज्य के विस्तार के लिए डिजिटल रियल एस्टेट एक साफ फोकस है, तो अंबानी की मुख्य कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के लिए व्यक्तिगत और कॉर्पोरेट कस्टमर्स के लिए AI भी उतना ही जरूरी है.

यह ग्रुप अपनी 10 साल पुरानी टेलीकॉम और मीडिया यूनिट, जियो प्लेटफॉर्म्स लिमिटेड को टेक्नोलॉजी के नजरिए से पब्लिक मार्केट में लाना चाहता है. खास बात तो ये है कि मेटा ने इसमें 2020 में 9.99 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी थी.

मेटा एआई वॉर को कैसे कर रहा तीखा?

अंबानी और अडानी, दोनों में से किसी की भी सॉफ्टवेयर आउटसोर्सिंग में मौजूदगी नहीं है. और यह उनके लिए अच्छी बात है. जेनरेटिव AI के आने से भारत के नंबर 1 सर्विस एक्सपोर्ट का पूरा गणित बदल गया है.

अब देश की पहचान सिर्फ तकनीकी रूप से कुशल, अंग्रेजी बोलने वाले युवा नहीं हैं जो पश्चिमी प्रोग्रामर्स की तुलना में बहुत कम वेतन पर काम करने को तैयार हों. अब फायदा उन पूंजीपतियों को है जो सस्ते में AI टोकन बनाने के लिए सोलर और विंड पावर का इस्तेमाल कर रहे हैं.

दक्षिण में बेंगलुरु का सॉफ्टवेयर हब वह जगह है जहां मेटा के इंजीनियर अपना खुद का सिलिकॉन बना रहे हैं, जबकि पश्चिमी तट पर गुजरात टोकन फैक्टरीज के लिए बिजली पैदा करने में आगे है. यहीं पर अडानी ने 100 अरब डॉलर के AI कंप्यूट प्रोजेक्ट के तहत दुनिया का सबसे बड़ा सिंगललोकेशन क्लीनएनर्जी प्रोजेक्ट लगाया है.

अब अंबानी 5,50,000 एकड़ की सुविधा के साथ दांव बढ़ा रहे हैं, जो सिंगापुर से तीन गुना बड़ी है. ग्रुप का दावा है कि इसके पूरा होने पर, यह दुनिया भर में चौबीसों घंटे ग्रीन पावर के सबसे सस्ते स्रोतों में से एक होगा.

इस एनर्जी के लिए एक कस्टमर पहले ही आ चुका है. पिछले महीने, अंबानी ने गुजरात के जामनगर में 168मेगावाट का डेटा सेंटर बनाने के लिए मेटा के साथ साझेदारी की घोषणा की. कागज पर, यह एक आम इंफ्रास्ट्रक्चर लीज जैसा दिखता है.

दोनों के लिए बड़ी चुनौती

अडानी एक मजबूत खिलाड़ी बने हुए हैं, खासकर गूगल के साथ उनकी रणनीतिक साझेदारी की वजह से. सोलर और विंड एनर्जी के अलावा, इस बड़े उद्योगपति की न्यूक्लियर पावर के लिए भी बड़ी योजनाएं हैं. यह एक ऐसा सेक्टर है जिस पर पहले सरकार का एकाधिकार था, लेकिन हाल ही में इसे प्राइवेट सेक्टर के लिए खोल दिया गया है. यह उनके लिए एक और हथियार साबित हो सकता है जिससे वे चौबीसों घंटे AI क्वेरी चलाने के लिए जरूरी बिना रुकावट बेसलोड बिजली देने वाले टोकन की कॉस्ट कम कर सकते हैं.

फिर भी, मेटारिलायंस की साझेदारी ने कॉम्पिटिशन का लेवल बढ़ा दिया है. जकरबर्ग के लिए, भारत यह साबित करने के लिए एक बेहतरीन प्रयोगशाला है कि मेटा एंटरप्राइज क्लाउड में सफल हो सकती है. और अंबानी के लिए, यह एक और सबूत है कि भारतीय कैपिटलिज्म के प्लेटफॉर्म पर, गठबंधन बनाने में उनकी महारत ही उन्हें एक प्रमुख खिलाड़ी बनाती है.

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply