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पेट्रोल-डीजल के बाद अब सड़कों पर संकट! ईरान जंग ने कैसे बढ़ा दी भारत की टेंशन?

Iran War Impact on Indian Roads: ईरान युद्ध फिर से शुरू होने का ख़तरा तो ख़बरों में बना ही हुआ है. एक और ख़बर है इससे जुड़ी जिस पर लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है. और ध्यान भी कैसे जाएगा, क्योंकि पब्लिक को तो इसका अंदाज़ा ही होता कि सड़कें भी इससे जुड़ी हुई है. जी, सौ बात की एक बात ये कि क्या ईरान युद्ध की वजह से हमारे यहां सड़कें नहीं बन रहीं?

पेट्रोल-डीजल के बाद अब सड़कों पर संकट! ईरान जंग ने कैसे बढ़ा दी भारत की टेंशन?

और ये जो बारिश में सड़कें बहे जा रही हैं, गड्ढे हुए जा रहे हैं, क्या इनकी रिपेयर भी नहीं हो पाएगी? मतलब क्या आने वाले टाइम में हमें टूटीफूटी सड़कें झेलनी पड़ सकती हैं? अभी तो बारिश का मौसम है तो सड़कें बनाने का काम रुक जाता है, लेकिन क्या आपने नोट किया सड़कें बनाने का काम बारिश से पहले ही रुकसा गया था. गड्ढे वगैरह भी भरना और बाक़ी रिपेयरिगं भी धीमी पड़ गई थी. और सबसे बड़ी चिंता तो ये खड़ी हो गई कि बरिशों के बाद क्या हाल होगा? क्यों? क्या सड़कें भी कच्चे तेल से बनती हैं क्या?

जी, ये भी कच्चे तेल से ही बनती हैं. वो कालाकाला जो गाढ़ासा लिक्विड होता है ना सड़क बनाने वाला, वो कच्चे तेल से ही निकालते हैं. पब्लिक हालांकि उसको तारकोल या कोलटार कहती है, लेकिन वो कोलटार या तारकोल नहीं होता. तारकोल तो कोयले से बनता है. सड़क जिससे बनाते हैं वो असल में बिचुमेन होता है जो तारकोल जैसा ही दिखता है. कच्चा तेल जब रिफाइनरी में जाता है तो वहां उसे गर्म करके सबसे पहले हल्की चीजें निकाल ली जाती हैं.

कच्चे तेल से बिगड़ा सड़कों का खेल

पेट्रोल निकाल लेते हैं, डीज़ल निकाल लेते हैं, केरोसीन निकाल लेते हैं, LPG भी उसी से निकलती है. फिर जो सबसे भारी और चिपचिपा हिस्सा बचता है, वही बिचुमेन बन जाता है. ये काला, गाढ़ा और चिपकने वाला पदार्थ होता है देखा होगा आपने ताज़ा सड़क बनने पर जूतों में और टायरों में चिपक जाता है. सड़क बनाने में पत्थर, बजरी और मिट्टी को एक साथ जोड़ने का काम यही करता है. बिना बिचुमेन के सड़क मज़बूत नहीं बन पाती. सड़क की मरम्मत भी इसी से करते हैं, गड्ढे भी इसीसे भरते हैं. और ये है ही नहीं.

बिचुमेन की भारत में भयंकर शॉर्टेज
मतलब भयंकर शॉर्टेज चल रही है. भारत में हर साल सड़कें बनाने और मरम्मत करने के लिए क़रीब 90 लाख टन बिचुमेन की जरूरत पड़ती है. भारत में जो रिफाइनरियां हैं वो क़रीब 54 लाख टन ही बिचुमेन बना पाती हैं. बाकी 36 लाख टन यानी 3040% बिचुमेन विदेश से मंगाना पड़ता है और ये हमारे यहां इराक़ से आता है, UAE से आता है, ईरान से आता है, ओमान से आता है. यानी स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से ही हो कर आएगा. फ़रवरी के आख़िर में ईरान में युद्ध शुरू हुआ था. तब से वो रास्ता बंद है. तो बड़ी दिक़्क़त तो कच्चे तेल की है, गैस की है. बिचुमेन का नंबर तो वैसे भी बाद में आएगा. फिर से जंग होने के आसार बनने लगे हैं तो कच्चे तेल के दाम फिर बढ़ने शुरू हो गए हैं. और पेट्रोलडीजल के दामों का तो सवाल है ही, बिचुमेन के दाम तो जबल हो चुके हैं. पहले बिचुमेन की कीमती थी 40 हजार रुपये टन. युद्ध के बाद से हो गई है 80 हज़ार रुपये टन. और भी बढ़ने के आसार बताए जा रहे हैं.

बिचुमेन के चलते सड़कों का काम ठप
तो जो कच्चा तेल आ रहा है उससे हमारी रिफाइनरी से जो बिचुमेन निकल रहा है वो डबल रेट का हो गया है. और बाहर से जो आ रहा था वो तो आना ही कम हो चुका है. यानी शॉर्टेज भी ज़बरदस्त चल रही है और जो है वो डबल रेट का मिल रहा है. सड़क बनाने के जो ठेके उठे हुए हैं, ठेकेदारों का कहना है कि वो पुराने रेट के हिसाब से उठे हुए हैं. डबल रेट पर बिचुमेन ले कर वो सड़क बना ही नहीं सकते. और बनाना भी चाहें तो सप्लाई ही उतनी नहीं है. ख़ासकर छोटे ठेकेदार जो प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी योजनाओं के तहत गांवों की सड़कें बनाते हैं या गड्ढे भरते हैं, वो तर्क दे रहे हैं कि उनके लिए तो काम जारी रखना ही मुश्किल हो गया है. राज्यों की जो सड़कें बनती हैं उनका भी यही हाल है. बड़े हाईवे जो बन रहे हैं वहां भी काम धीमा हो गया है. कई जगह काम रुक गया है. बड़े हाइवे बनवाने वाली अथॉरिटी NHAI भी बिचुमेन की सप्लाई बनाए रखने की कोशिश कर रही है. लेकिन बड़ी समस्या तो ये बनी ही हुई है.

भारत कितना बना रहा बिचुमेन?
भारत ने वैसे बायोबिचुमेन बनाने का काम भी शुरू किया है. धान के भूसे से इसको बनाना शुरू किया गया है. जनवरी में प्रोडक्शन शुरू हो चुका है. लेकिन साल का 90 लाख टन जो चाहिए उसमें तो अभी ये तड़के जितना ही बन रहा है. आने वाले सालों में ज़रूर इससे शायद राहत मिल जाए, लेकिन अभी तो वही कच्चे तेल से निकलने वाला बिचुमेन ही चाहिए होगा. यानी ये जो युद्ध हुआ है इस साल इसने सड़क पर चलने वाली गाड़ियों पर ही संकट नहीं खड़ा किया है, सड़कों पर ही संकट खड़ा हो गया है. गड्ढे तो वैसे ही हुए जा रहे हैं जैसे हर साल होते हैं, बारिश में सड़कें तो वैसे ही बहे जा रही हैं जैसे बहती हैं हमारे यहां, बिचुमेन का हाल ऐसा ही रहा तो अब ये गड्ढे जल्दी से भरने वाले भी नहीं. सौ बात की एक बात.

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