
शिलाजीत ऊँचे पर्वतों पर पत्थर की दरारों में पाया जाना वाला गोंद जैसा पदार्थ है। साधारण जनता इसे केवल यौन क्षमता बढ़ाने की दवाई के नाम से जानती है जबकि यह बहुत से गंभीर रोगों की शानदार औषधि भी है। आजकल शिलाजीत के लिए बाजार में बहुत से विज्ञापन चल रहे हैं जिसमें शिलाजीत के बारे में अधूरी जानकारी दी जाती है। आज जानिये शिलाजीत के बारे सब बातें।
शिलाजीत कैसे पैदा होती है –
शिलाजीत उन पहाड़ी स्थानों पर होती है जहाँ डंडा थोर, तिपतिया, दाढ़ी घास, मोस प्रजाति के पौधे, थूजा, मर्केन्शिया , हार्न वेर्ट, रीसेल के पौधे बहुतायत में पाए जाते हैं। तेज धूप पड़ने पर इन पौधे से गोंद निकलता हैं जो पत्थर के ऊपर से बहता हुआ पहाड़ की दरारों में जाकर सूखकर जम जाता हैं। यह गोंद पत्थर के संपर्क में आकर पत्थर के अंदर मौजूद खनिज को अपने साथ ले लेती है। इसी गोंद की अशुद्ध शिला जीत कहते है। बाजार में इसे ही बेचा जाता है।
अशुद्ध शिलाजीत से शुद्ध शिलाजीत कैसे बनाते हैं?
अशुद्ध शिलाजीत में गोंद, मिटटी, पत्थर, घास, पौधे के अवशेष सहित तमाम गन्दगी रहती है। इसे त्रिफला के गर्म काढ़े में 12 से 18 घंटे तक भिगोया जाता है। जो हिस्सा पानी में घुलता है उसे बाद में पकाकर पानी समाप्त कर सूखा लिया जाता है। इसे शुद्ध शिलाजीत कहते हैं। सीस शुद्ध शिलाजीत में विभिन्न जड़ी बूटियां मिलाकर टेबलेट, सिरप, कैप्सूल, मलहम आदि बनाये जाते हैं।
शिलाजीत में क्या होता है?
शिलाजीत में पौधे के गोंद के अनुरूप विभिन्न पदार्थ होते हैं। जटिल रूप से इसके अंदर केल्सियम अधिक मात्रा में होता है। साथ ही फुलविक एसिड, हुमिक एसिड, प्राकृतिक स्टेरॉयड, चिकनाई , प्रोटीन , विटामिन, एलुमिनियम, मेगनीसियम, आयरन पाया जा सकता है। अच्छी शिलाजीत उसे कहते हैं जो ऐसे स्थान से ली गयी हो जहाँ ऊपर बताये गए पौधे अच्छी मात्रा में हो और पहाड़ पर सीधी धूप पड़ती हो।
शिलाजीत कहाँ पैदा होती है ?
शिलाजीत की सबसे अधिक प्राप्ति रूस से होती है उसके बाद पकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर, तिब्बत में होती है। बहुत थोड़ी मात्रा में लदाख, कश्मीर में मिलती है। वर्तमान में भारत में शिलाजीत पाकिस्तान से चीन के रास्ते आती है।
शिलाजीत को किन रोगों में उपयोग करते हैं?
शिलाजीत को पथरी, सूजन, डाइबिटीज, पेट और आँतों के घाव, शुक्राणु समस्या में अन्य दवाइओं के साथ मिश्रण के रूप में प्रयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त यह इम्युनिटी बढ़ाने, शरीर को पोषण देने, कमजोरी दूर करने, यौन शक्ति वर्धन, सप्लीमेंट के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
कितनी मात्रा में सेवन करना चाहिए?
शिलाजीत की मात्रा प्रत्येक व्यक्ति की उम्र, बीमारी, प्रकृति (तासीर ) के अनुसार निर्धारित की जाती है। जिसे केवल पंजीकृत आयुर्वेद चिकित्सक ही निर्धारत कर सकता है। मोटे तौर पर 250 मिलीग्राम से लेकर 1500 मिलीग्राम प्रतिदिन के बीच में निर्धारत की जा सकती है।
शिलाजीत के साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं ?
प्रत्येक औषधि या पदार्थ के अपने साइड इफेक्ट्स भी होते हैं। शिलाजीत के उपयोग से पेट में जलन, दिल धड़कन का का अनियमित होना, पेट में भारीपन, बदहजमी, दस्त, छाती में दर्द, चक्कर, चेहरे के अंगों में सूजन आदि अनुभव हो सकते हैं। यदि ऐसा कोई लक्षण अनुभव हो रहा है तो औषध उपयोग को बंद कर तत्काल चिकित्सक परामर्श लिया जांचा चाहिए। इनमे से अधिकतर लक्षण ख़राब क्वालिटी की शिलाजीत या शिलाजीत के तत्वों से एलर्जी होने पर देखे गए हैं।
शिलाजीत के सेवन के समय कोई परहेज आवश्यक होता है ?
शिलाजीत के उपयोग के दौरान कुलथी दाल, शराब, अधिक मात्रा में चाय / काफी, अचार, सिरका से बने पदार्थ उपयोग नहीं किये जाने चाहिए।
शिलाजीत के सेवन से कितने समय में लाभ प्राप्त होता है ?
स्वस्थ व्यक्तियों को योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के परामर्श से इसका सेवन कम से कम छह माह तक करना चाहिए। रोगियों में सेवन अवधि केवल आयुर्वेद चिकित्सक तय कर सकते हैं।
शिलाजीत कहाँ से लेनी चाहिए ?
शिलाजीत वास्तव में एक औषधि है। साइड इफेक्ट रहित, उचित लाभ के लिए अच्छी क्वालिटी, सही शुद्धिकरण, सही मात्रा आदि का निर्धारण बहुत आवश्यक है। यह वास्तव में एक सप्लीमेंट नहीं है। इसलिए किसी योग्य आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श के पश्चात ही उचित औषध को खरीदना एवं प्रयोग करना चाहिए।



