
दक्षिण भारत के मंदिर सिर्फ पूजा पाठ की जगह नहीं हैं, ये पुराने जमाने की साइंस और कला का ऐसा बेजोड़ नमूना हैं जिसे देखकर आज के इंजीनियर्स का भी सिर चकरा जाता है. हमने मंदिरों के कई तरह के चमत्कारों के बारे में सुना है, लेकिन साउथ में तीन मंदिर ऐसे हैं जहां की मूर्तियां बिल्कुल किसी जीते जागते इंसान की तरह बर्ताव करती हैं.
कहीं भगवान के सीने में धड़कन महसूस होती है, तो कहीं उन्हें हम इंसानों की तरह पसीना आता है. इन मंदिरों की कहानियां इतनी अनोखी हैं कि इन पर यकीन करना किसी के लिए भी मुश्किल हो जाता है.
आइए आज आपको दक्षिण भारत के इन्हीं तीन सबसे अनोखे और रहस्यमयी मंदिरों की सैर पर ले चलते हैं, जहां का सच विज्ञान की समझ से भी कोसों दूर है.
चिदंबरम नटराज मंदिर का महा रहस्य
तमिलनाडु में स्थित चिदंबरम नटराज मंदिर भगवान शिव के सबसे खास धामों में से एक माना जाता है. यहां भगवान शिव की नटराज रूप में बेहद खूबसूरत मूर्ति स्थापित है.
इस मंदिर को लेकर वैज्ञानिकों और रिसर्च करने वालों के बीच हमेशा से एक बड़ी बहस चलती आई है. दावा किया जाता है कि इस मंदिर की मुख्य मूर्ति के ठीक दिल वाली जगह पर अगर बहुत ध्यान से महसूस किया जाए, तो वहां लगातार एक धड़कन की आवाज सुनाई देती है.
ये धड़कन बिल्कुल वैसी ही होती है जैसी किसी जीवित इंसान के सीने से आती है. यहां तक कि कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यह मंदिर पृथ्वी के चुंबकीय केंद्र पर बना हुआ है, जिसकी वजह से यहां एक बेहद शक्तिशाली ऊर्जा का अहसास होता है.
इस रहस्य को समझने के लिए कई लोगों ने कोशिश की, लेकिन आज तक कोई भी इसके पीछे की असली वजह का पता नहीं लगा पाया है.
थिरुमालीरुंचोलई मंदिर का सच
अब बात करते हैं तमिलनाडु के ही तिरुनेलवेली में बने थिरुमालीरुंचोलई मंदिर की. यह पावन धाम भगवान विष्णु को समर्पित है और यहां का नजारा गर्मियों के दिनों में हर किसी को हैरान कर देता है.
जब बाहर कड़ाके की धूप होती है और गर्मी का पारा चढ़ने लगता है, तो मंदिर के गर्भगृह में मौजूद भगवान विष्णु की पत्थर की मूर्ति को साक्षात पसीना आने लगता है.
मूर्ति के चेहरे और शरीर पर पानी की छोटी छोटी बूंदें साफ दिखाई देने लगती हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी आम इंसान को उमस भरे मौसम में पसीना आता है. इस अनोखी घटना को देखने के लिए दूर दूर से लोग आते हैं.
मंदिर के पुजारी हर दिन सूती कपड़े से भगवान के इस पसीने को बहुत आदर के साथ पोंछते हैं. विज्ञान के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि एक बंद और ठंडे गर्भगृह में रखे ठोस पत्थर से पानी की बूंदें इस तरह कैसे बाहर निकल सकती हैं.
पेरूर पट्टेश्वरर मंदिर का अजूबा
कोयंबटूर के पास स्थित पेरूर पट्टेश्वरर मंदिर अपने आप में प्राचीन कला का एक अद्भुत केंद्र है. लेकिन यहां की सबसे बड़ी चर्चा एक खास मूर्ति को लेकर होती है. इस मंदिर के परिसर में बनी एक मूर्ति की मूंछें समय के साथ अपने आप बड़ी होती जाती हैं.
स्थानीय लोगों और मंदिर के पुराने पुजारियों का कहना है कि इस मूर्ति की मूंछों के बाल प्राकृतिक रूप से बढ़ते हैं, जिसके कारण एक निश्चित समय के बाद उन्हें हल्का सा तराशा या ठीक किया जाता है.
निर्जीव पत्थर पर बालों का इस तरह से उगना और उनका बढ़ना किसी के भी रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है. कई लोगों ने इसे महज़ एक वहम माना, लेकिन सालों से इस बदलाव को करीब से देखने वाले भक्त इसे भगवान का साक्षात चमत्कार ही मानते हैं.
आस्था और विज्ञान की इस अनोखी जंग में जीत हमेशा श्रद्धा की ही होती है
इन तीनों मंदिरों की अद्भुत घटनाएं यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि क्या वाकई इन प्राचीन मूर्तियों में कोई दिव्य जीवन वास करता है. विज्ञान जहां इसे पत्थरों की खास बनावट, वातावरण की नमी या किसी खास रासायनिक प्रतिक्रिया का नाम देकर टालने की कोशिश करता है, वहीं भक्तों के लिए यह उनके आराध्य का साक्षात रूप है.
हमारे पूर्वजों ने इन मंदिरों को किस तकनीक और सोच के साथ बनाया था, यह रहस्य आज भी उन ऐतिहासिक दीवारों के भीतर ही दफन है. लेकिन एक बात तो बिल्कुल साफ है भाई, इन मंदिरों में कदम रखते ही जो असीम शांति और चमत्कारों का अहसास होता है, उसे शब्दों में बयां कर पाना नामुमकिन है.
यही वजह है कि सदियों बाद आज भी इन पवित्र जगहों के प्रति लोगों की आस्था रत्ती भर भी कम नहीं हुई है.



