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मुरादाबाद में किसानों ने आखिर क्यों छोड़ दी धान की खेती? ‘कमल’ उगाकर कमा रहे लाखों रुपये

पारंपरिक खेती में लगातार बढ़ती लागत और अनिश्चित मुनाफे के बीच मुरादाबाद के पाकबड़ा इलाके के गांव मोड़ा तेहिया के किसानों ने कृषि क्षेत्र में बदलाव की एक नई और बेहद सफल इबारत लिखी है. यहां के किसान अब पारंपरिक रूप से की जाने वाली धान की खेती को छोड़कर बड़े पैमाने पर कमल की खेती की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं. स्थानीय स्तर पर किसानों का यह अनूठा प्रयास न सिर्फ उनकी तकदीर बदल रहा है, बल्कि आसपास के अन्य ग्रामीण इलाकों के किसानों के लिए भी प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत बन चुका है.

मुरादाबाद में किसानों ने आखिर क्यों छोड़ दी धान की खेती? ‘कमल’ उगाकर कमा रहे लाखों रुपये

गांव के ही एक प्रगतिशील किसान पवन बताते हैं कि धान की तुलना में कमल की खेती से उन्हें सीधा दोगुना प्रॉफिट मिल रहा है. इस मुनाफे के पीछे का सबसे मुख्य कारण यह है कि कमल की फसल का कोई भी हिस्सा बर्बाद नहीं जाता है. इसकी जड़ से लेकर फूल और बीजों तक, हर एक चीज बाजार में बेहद अच्छे और ऊंचे दामों पर हाथोंहाथ बिक जाती है. यही वजह है कि आज इस गांव के लगभग 30 प्रतिशत किसान इस लाभकारी व्यवसाय से जुड़ चुके हैं और उनका यह खास व्यवसाय अब मुरादाबाद से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक के बड़े बाजारों में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है.

छोटे से तालाब से की थी लोगों ने शुरुआत

गांव मोड़ा तेहिया के किसानों ने बताया कि कमल की खेती से होने वाला मुनाफा केवल इसके खूबसूरत फूलों की बिक्री तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ और तने को भी स्थानीय और बाहरी बाजारों में बहुत ही शानदार दाम मिलते हैं. कमल के तने को स्थानीय स्तर पर भसीड़े की सब्जी के रूप में बेहद चाव से खाया जाता है, जिसके कारण बाजार में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है.

इसके अलावा, फसल से प्राप्त होने वाले बीजों को ‘कमलगट्टा’ कहा जाता है, जिनका उपयोग पूजापाठ के साथसाथ मखाने बनाने में भी होता है. पूजा और सजावट के लिए फूलों की बिक्री अलग से अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनती है.

धान से आसान है ये खेती

धान की खेती में जहां अत्यधिक पानी, खाद, कीटनाशकों और दिनरात की कड़ी मेहनत की आवश्यकता होती है, वहीं कमल की खेती में इन सबके मुकाबले बहुत कम खर्च और लागत आती है. किसान पवन का कहना है कि जहां खेत गहरा होता है और जमीन मोटी होती है, वहां इसकी पैदावार और भी बेहतरीन होती है.

हालांकि, इस खेती के लिए फिलहाल सरकार की तरफ से किसानों को कोई सीधी वित्तीय रियायत या मदद नहीं मिल पा रही है. इसके बावजूद, एक ही फसल से कई स्रोतों द्वारा होने वाली शानदार कमाई के कारण यह खेती आज क्षेत्र में कृषि बदलाव की एक नई और समृद्ध तस्वीर पेश कर रही है.

क्या बोले वैज्ञानिक?

कृषि वैज्ञानिक डॉ. दीपक मेहंदी दत्ता ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद मंडल में इन दिनों पारंपरिक कृषि पद्धति से इतर एक नई और बेहद मुनाफेदार क्रांति देखने को मिल रही है. डॉ. दीपक मेहंदी दत्ता के अनुसार किसान अब धान की पारंपरिक खेती को छोड़कर बड़े पैमाने पर व्यावसायिक कमल की खेती की तरफ तेजी से रुख कर रहे हैं.

इस बड़े बदलाव का सबसे मुख्य कारण कमल की खेती में लगने वाली बेहद कम लागत और इससे होने वाला बहुआयामी बंपर मुनाफा है.

उन्होंने बताया कि जहां धान की खेती में प्रति एकड़ ₹19,000 से ₹24,000 का खर्च करने के बाद किसानों को सरकारी एमएसपी या खुली मंडी में बेचने पर बमुश्किल ₹35,000 से ₹50,000 तक का शुद्ध मुनाफा मिल पाता है, वहीं कमल की खेती में करीब ₹25,000 की शुरुआती लागत लगाकर किसान प्रति एकड़ ₹2.5 लाख से ₹3 लाख तक का शानदार नेट प्रॉफिट कमा रहे हैं.

डॉ. दीपक मेहंदी दत्ता ने बताया कि कमल की फसल से किसानों को तीन अलगअलग स्रोतों से आय प्राप्त हो रही है, जिसमें कमल के फूल, सब्जी व अचार के लिए प्रसिद्ध कमल का टिंडा और औषधीय व धार्मिक महत्व वाले कमलगट्टे शामिल हैं. दिल्ली की गाजीपुर मंडी और बरेली के आढ़ती सीधे खेतों से ही माल उठा लेते हैं, जिससे यह नकदी फसल धान के मुकाबले 6 से 7 गुना अधिक रिटर्न देकर किसानों की तकदीर बदल रही है.

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