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चरखे की जगह अशोक चक्र क्यों आया? तिरंगे में हुए आखिरी बदलाव की पूरी कहानी

आज से ठीक 79 बरस पहले भारतीय राष्ट्रीय ध्वज ने आकार लिया था. तब से आज तक 22 जुलाई को नेशनल फ्लैग डे के रूप में भारतवासी मनाते आ रहे हैं. इसी दिन साल 1947 में चरखे की जगह अशोक चक्र लगाया गया और संविधान सभा ने अपनी मंजूरी दी. इसी के 24 दिन बाद देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद घोषित किया गया. भारत की आनबानशान तिरंगा तब से जहां कहीं भी लहराता हुआ दिखाई देता है तो भारतीयों के रोमरोम में रोमांच भर देता है.

चरखे की जगह अशोक चक्र क्यों आया? तिरंगे में हुए आखिरी बदलाव की पूरी कहानी

आइए, नेशनल फ्लैग डे यानी 22 जुलाई के बहाने समझते हैं कि चरखे की जगह अशोक चक्र क्यों लाया गया? क्या है तिरंगे में बदलाव की पूरी कहानी?

कैसे हुआ तिरंगे का शुरुआती विकास?

भारत का वर्तमान तिरंगा एक दिन में नहीं बना. आज़ादी के आंदोलन के दौरान कई झंडे बने. अलगअलग समूहों ने अलग ध्वजों का उपयोग किया. इन झंडों में देशभक्ति, स्वराज और एकता की भावना दिखाई देती थी. साल 1906 में कोलकाता में एक शुरुआती राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था. इसमें हरा, पीला और लाल रंग था. बाद के वर्षों में कई दूसरे डिजाइन सामने आए. साल 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने विदेश में एक भारतीय ध्वज फहराया. यह भारत की आज़ादी की मांग का अंतरराष्ट्रीय प्रतीक बना. फिर 1917 में होमरूल आंदोलन के दौरान एक अलग ध्वज अपनाया गया. इसमें कई धारियां, तारे और दूसरे चिह्न थे, लेकिन तब तक कोई भी झंडा पूरे देश के लिए स्थायी रूप से स्वीकार नहीं हुआ.

पिंगली वेंकैया ने पहले तिरंगे की डिजाइन में चरखा शामिल किया था.

आज के तिरंगे की कल्पना किसने की?

तिरंगे के विकास में पिंगली वेंकैया का महत्वपूर्ण योगदान था. वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे. उन्होंने झंडों के डिजाइन का अध्ययन किया था. वे एक ऐसे ध्वज की कल्पना करते थे जो पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करे. साल 1921 में विजयवाड़ा में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधी को एक झंडे का डिजाइन दिखाया. उस डिजाइन में लाल और हरे रंग थे. उस समय इन रंगों को भारत के बड़े धार्मिक समुदायों से जोड़कर देखा जाता था. महात्मा गांधी ने सुझाव दिया कि इसमें सफेद रंग भी जोड़ा जाए. सफेद रंग शांति और देश के अन्य समुदायों के प्रतिनिधित्व के लिए रखा गया. इसी ध्वज के बीच में चरखा रखा गया. यह ध्वज धीरेधीरे आज़ादी के संघर्ष का लोकप्रिय प्रतीक बन गया.

चरखा क्यों चुना गया था?

चरखा महात्मा गांधी के विचारों का बहुत बड़ा प्रतीक था. महात्मा गांधी स्वदेशी पर जोर देते थे. उनका मानना था कि भारत को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहिए. ब्रिटिश शासन के समय भारत से कच्चा माल बाहर भेजा जाता था. विदेशों में बने कपड़े फिर भारत में बेचे जाते थे. इससे भारतीय बुनकरों और कारीगरों को नुकसान हुआ. स्थानीय उद्योग कमजोर हुए. महात्मा गांधी ने लोगों से विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने को कहा. उन्होंने खादी पहनने और चरखा चलाने को बढ़ावा दिया. चरखा केवल कपड़ा बनाने का साधन नहीं था. धीरेधीरे चरखा स्वाभिमान का प्रतीक बन गया. गांव, किसान, मजदूर और कारीगर सभी इस प्रतीक से जुडते गए.

तिरंगा में सफेद रंग शांति, सत्य और प्रकाश का प्रतीक है.. फोटो: PTI

कांग्रेस के ध्वज में चरखा क्यों था?

साल 1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एक नया तिरंगा अपनाया. इसमें ऊपर केसरिया, बीच में सफेद और नीचे हरा रंग था. सफेद पट्टी के बीच में नीले रंग का चरखा रखा गया था. यह झंडा आज के राष्ट्रीय ध्वज से काफी मिलता था. अंतर केवल इतना था कि वर्तमान झंडे में चरखे की जगह अशोक चक्र है.

यह तिरंगा स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बहुत लोकप्रिय हुआ. इसे सभाओं, यात्राओं, आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों में फहराया गया. ब्रिटिश सरकार इसे अक्सर चुनौती की तरह देखती थी. लोगों के लिए यह झंडा आज़ादी की उम्मीद था.

आज़ादी के करीब उठा एक नया सवाल

साल 1947 में भारत की आज़ादी निश्चित हो गई थी. अब देश को एक ऐसे ध्वज की जरूरत थी जो केवल कांग्रेस का नहीं, बल्कि पूरे भारत का झंडा हो. भारत में अलगअलग धर्म, भाषाएं, जातियां और संस्कृतियां थीं. नया राष्ट्रध्वज सबका प्रतिनिधित्व करने वाला होना चाहिए था, इसलिए यह जरूरी था कि ध्वज को किसी एक राजनीतिक संगठन से सीधे न जोड़ा जाए. चरखा स्वतंत्रता आंदोलन का अत्यंत सम्मानित प्रतीक था. लेकिन वह कांग्रेस के झंडे से भी बहुत जुड़ गया था. नया राष्ट्रीय ध्वज दलगत पहचान से ऊपर होना चाहिए था. इसलिए ध्वज के बीच में ऐसा प्रतीक चुनने पर विचार हुआ जो भारत की प्राचीन विरासत और सार्वभौमिक मूल्यों को दिखाए.

चरखे के डिजाइन से जुड़ी व्यावहारिक परेशानी

चरखे को बदलने के पीछे एक व्यावहारिक कारण भी था. चरखे का डिजाइन दोनों तरफ से एक जैसा दिखाना कठिन था. झंडा जब दोनों ओर से देखा जाता है, तो उसका चिह्न सही रूप में दिखना चाहिए. चरखे के धागे और तकली का स्वरूप एक दिशा में बना होता था. दूसरी ओर से देखने पर वह उलटा दिखता था. राष्ट्रीय ध्वज के लिए एक सरल, स्पष्ट और दोनों तरफ से संतुलित चिह्न जरूरी था. अशोक चक्र गोल है. उसमें 24 तीलियां हैं. वह दोनों तरफ से लगभग एक ही रूप में दिखाई देता है, इसलिए वह ध्वज के लिए अधिक उपयुक्त माना गया.

कहां से लिया गया अशोक चक्र?

अशोक चक्र भारत के प्राचीन इतिहास से लिया गया है. यह सम्राट अशोक के समय की कला और विचारधारा से जुड़ा है. इस चक्र का रूप सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ के सिंहशीर्ष से लिया गया है. यही सिंहशीर्ष भारत का राजचिह्न भी बना. सिंहशीर्ष में चार सिंह हैं. उसके नीचे एक गोलाकार पट्टी है. इसमें पशु आकृतियां और धर्मचक्र बने हैं. अशोक चक्र को धर्मचक्र भी कहा जाता है. यहां धर्म का अर्थ केवल किसी धर्म या पूजापद्धति से नहीं है. इसका व्यापक अर्थ है न्याय, कर्तव्य, नैतिकता और सही आचरण. सम्राट अशोक ने युद्ध के बाद शांति, करुणा और नैतिक शासन का संदेश अपनाया था. इसलिए उनका चक्र शक्ति के साथ जिम्मेदारी की भी याद दिलाता है.

तिरंगे में सबसे ऊपर केसरिया रंग साहस, त्याग और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक है. फोटो: PTI

24 तीलियों का क्या अर्थ है?

अशोक चक्र में 24 तीलियां हैं. इन्हें जीवन की गति और कर्तव्य का प्रतीक माना जाता है. चक्र बताता है कि देश को रुकना नहीं चाहिए. उसे लगातार आगे बढ़ना चाहिए. इन्हें सत्य, साहस, धैर्य, शांति, सेवा, न्याय, संयम और सदाचार जैसे मूल्यों से जोड़ा जाता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चक्र गति का प्रतीक है. ठहराव को जीवन और समाज के लिए अच्छा नहीं माना गया. भारत को स्वतंत्र होने के बाद आगे बढ़ना था. उसे गरीबी, अशिक्षा, भेदभाव और पराधीनता की समस्याओं से निकलना था. अशोक चक्र इसी निरंतर प्रगति का संदेश देता है.

राष्ट्रीय ध्वज में मौजूद रंगों का अर्थ भी जानें

राष्ट्रीय ध्वज में तीन समान क्षैतिज पट्टियां हैं. सबसे ऊपर केसरिया रंग है. यह साहस, त्याग और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक माना जाता है. यह देश के नेतृत्व और नागरिकों को निजी स्वार्थ से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है. बीच में सफेद रंग है. यह शांति, सत्य और प्रकाश का प्रतीक है. सफेद पट्टी देश को सही दिशा में चलने की याद दिलाती है. हरा रंग यह समृद्धि, विकास, भूमि, कृषि और जीवन से जुड़ा है. भारत की बड़ी आबादी गांवों और खेती से जुड़ी है, इसलिए यह रंग धरती और उन्नति की भावना को भी दिखाता है.

क्या था अंतिम बदलाव का बड़ा संदेश?

भारत के तिरंगे में चरखे की जगह अशोक चक्र का आना एक सोचसमझकर लिया गया फैसला था. चरखा संघर्ष और आत्मनिर्भरता का प्रतीक था. अशोक चक्र न्याय, गति, शांति और नैतिक कर्तव्य का प्रतीक बना. नया भारत केवल ब्रिटिश शासन से मुक्त नहीं होना चाहता था. वह एक लोकतांत्रिक, समावेशी और प्रगतिशील राष्ट्र बनना चाहता था. अशोक चक्र इसी लक्ष्य को व्यक्त करता है. तिरंगा हमें बताता है कि साहस चाहिए, शांति चाहिए, विकास चाहिए और निरंतर आगे बढ़ने की इच्छा चाहिए. यही कारण है कि अशोक चक्र आज भारत की राष्ट्रीय पहचान का इतना शक्तिशाली प्रतीक है.

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