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शादी जिससे होनी है उसी से होगी क्या सच में शादी प्रारब्ध से तय होती है..

शादी जिससे होनी है उसी से होगी क्या सच में शादी प्रारब्ध से तय होती है..

भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक परंपरा में यह माना जाता है कि जीवन की कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं प्रारब्ध से जुड़ी होती हैं। विवाह भी उनमें से एक माना जाता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार जिससे और जिस समय विवाह होना होता है वही संयोग अपने समय पर बनता है।

इस विचार को समझने के लिए एक सरल उदाहरण लिया जाता है।

क्या आपने अपने माता पिता को चुना था

नहीं।

जब आपने जन्म लिया तो माता पिता पहले से आपके जीवन का हिस्सा थे। उसी तरह यह माना जाता है कि भाई बहन मित्र पति पत्नी और संतान जैसे कई रिश्ते भी जीवन में अपने समय पर आते हैं।

आज के समय में बहुत से लोग अपने लिए जीवनसाथी खोजने की कोशिश करते हैं। कई बार रिश्ते बनते हैं लंबे समय तक चलते हैं और फिर किसी कारण टूट भी जाते हैं। ऐसे अनुभव व्यक्ति को दुख और निराशा दे सकते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण यह कहता है कि यदि कोई रिश्ता आपके जीवन के लिए नियत नहीं है तो वह किसी न किसी कारण समाप्त हो जाएगा। और जो रिश्ता आपके प्रारब्ध में है वह उचित समय पर आपके जीवन में अवश्य आएगा।

इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति प्रयास करना छोड़ दे। इसका अर्थ केवल इतना है कि परिणाम को लेकर अत्यधिक चिंता और बेचैनी न रखें।

जब व्यक्ति केवल जीवनसाथी की तलाश में ही उलझा रहता है तो कई बार वह अपने महत्वपूर्ण कार्यों जैसे पढ़ाई करियर आत्मविकास और परिवार की जिम्मेदारियों से दूर हो जाता है। गलत लोगों पर विश्वास करने से मानसिक आघात भी मिल सकता है और लोगों पर से भरोसा कम होने लगता है।

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में एक विचार यह भी है कि जीवन में जो कर्म वर्तमान में आपके सामने हैं उन पर पूरी निष्ठा से ध्यान देना चाहिए। यदि इस समय आपका कर्तव्य पढ़ाई है तो पढ़ाई करें। यदि नौकरी है तो उसे ईमानदारी से करें। यदि सेवा का अवसर है तो सेवा करें।

समय आने पर धन संबंधी अवसर भी मिलते हैं और उचित जीवनसाथी का संयोग भी बनता है। इसलिए वर्तमान कर्म पर ध्यान देना और परिणाम को ईश्वर पर छोड़ देना मानसिक शांति का मार्ग माना गया है।

हालांकि यह एक आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण है। विवाह जीवन का महत्वपूर्ण निर्णय है इसलिए केवल भाग्य के भरोसे रहने के बजाय सही जानकारी लेना परिवार से विचार करना और समझदारी से निर्णय लेना भी उतना ही आवश्यक है।

जीवन में कर्म और धैर्य दोनों का अपना महत्व है। वर्तमान में अपना श्रेष्ठ कर्म करते रहें और भविष्य को लेकर अनावश्यक चिंता करने के बजाय सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखें।

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