
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का मेडल खाता खोलने वाले बिहार के पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार आज पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गए हैं। पुरुषों की हैवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीतकर शानदार उपलब्धि हासिल की। लेकिन इस सफलता के पीछे वर्षों का संघर्ष, मेहनत और त्याग छिपा है।
बिहार के बेटे ने दिलाया भारत को पहला मेडल
28 वर्षीय झंडू कुमार ने प्रतियोगिता में 190 किलोग्राम का सर्वश्रेष्ठ वजन उठाकर ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। उन्होंने पहली कोशिश में 181 किलोग्राम सफलतापूर्वक उठाया, दूसरी कोशिश में 190 किलोग्राम का भार पार किया, जबकि तीसरे प्रयास में 196 किलोग्राम उठाने की कोशिश सफल नहीं हो सकी। इसके बावजूद उनका प्रदर्शन भारत के लिए पहला पदक लेकर आया।
सड़क किनारे सब्जी बेचकर किया परिवार का सहारा
बिहार के नालंदा जिले के हरनौत के रहने वाले झंडू कुमार का बचपन आर्थिक तंगी में बीता। परिवार की मदद के लिए उन्होंने माता-पिता के साथ सड़क किनारे सब्जियां बेचीं। उन्होंने अपना ब्रॉन्ज मेडल अपने माता-पिता को समर्पित करते हुए कहा कि उनके आशीर्वाद और भरोसे ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने की ताकत दी।
मेडल जीतने का था पूरा भरोसा
झंडू कुमार ने बताया कि प्रतियोगिता से पहले वार्म-अप के दौरान ही उन्हें महसूस हो गया था कि वह अच्छा प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने कहा कि 190 किलोग्राम का वजन उठाने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि इससे भी बेहतर कर सकते हैं, लेकिन तकनीकी कारणों से अंतिम प्रयास सफल नहीं हो पाया। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय अपने कोच और लगातार की गई मेहनत को दिया।
ई-रिक्शा चलाकर पूरा किया सपना
झंडू ने बताया कि शुरुआत में उन्हें पैरा पावरलिफ्टिंग के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। बाद में इस खेल के बारे में पता चला और उन्होंने पूरी मेहनत से तैयारी शुरू की। ट्रेनिंग के साथ-साथ परिवार चलाने के लिए सब्जी भी बेचनी पड़ती थी।
कुछ समय बाद उनकी दुकान बंद हो गई, जिसके बाद उन्होंने ई-रिक्शा चलाना शुरू किया। दिनभर ई-रिक्शा चलाने के कारण शरीर थक जाता था और नियमित ट्रेनिंग करना मुश्किल हो जाता था। लेकिन राष्ट्रीय चैंपियनशिप में हिस्सा लेने का सपना इतना बड़ा था कि उन्होंने अपना ई-रिक्शा तक बेच दिया ताकि पूरी तरह खेल पर ध्यान दे सकें।
संघर्ष बना सफलता की पहचान
झंडू कुमार की कहानी बताती है कि सीमित संसाधन भी बड़े सपनों के सामने बाधा नहीं बनते। सब्जी बेचने से लेकर ई-रिक्शा चलाने और फिर कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए पदक जीतने तक का उनका सफर लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है। आज उनकी मेहनत और जज्बे ने उन्हें देश के नए खेल नायकों की सूची में शामिल कर दिया है।



