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जंतर-मंतर पर पुलिस निगरानी और फेशियल रिकग्निशन को कानूनी चुनौती क्यों? एक्सपर्ट से समझें

दिल्ली के जंतरमंतर को लंबे समय से विरोधप्रदर्शनों की प्रमुख जगह माना जाता है. यहां छात्र, कर्मचारी, सामाजिक संगठन और अलगअलग समूह अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाते आ रहे हैं. आजकल भी यहां काकरोच जनता पार्टी के सदस्य आन्दोलनरत हैं. इस स्थान पर पुलिस ने कैमरा निगरानी, वीडियो रिकॉर्डिंग और फेशियल रिकग्निशन जैसी तकनीक इस्तेमाल कर रही है, जिस पर सवाल उठ रहे हैं. इसी सिलसिले में दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है. इसमें कहा गया है कि प्रदर्शनकारियों की लगातार निगरानी उनके मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकती है.

जंतर-मंतर पर पुलिस निगरानी और फेशियल रिकग्निशन को कानूनी चुनौती क्यों? एक्सपर्ट से समझें

आइए, समझते हैं कि आखिर जंतरमंतर पर बढ़ रही पुलिस की निगरानी एवं फेशियल रिकग्निशन तकनीक की कानूनी स्थिति क्या है? क्या यह वाकई निजता के अधिकार का उल्लंघन है?

आखिर क्या है यह पूरा मामला?

पूर्व जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष ने दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है. याचिका में जंतरमंतर पर स्थायी निगरानी टावर और आधुनिक पुलिस वाहनों के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई गई है. इन वाहनों में कैमरे और फेशियल रिकग्निशन जैसी तकनीक होने की बात कही गई है.

जंतरमंतर पर प्रदर्शन की तस्वीर. फोटो: PTI

याचिका में तर्क दिया गया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की लगातार तस्वीरें लेना, वीडियो बनाना और उनकी पहचान करना बहुत व्यापक निगरानी है. याचिकाकर्ता का कहना है कि यह निगरानी केवल मंच, भाषण या जुलूस तक सीमित नहीं रहती. आरोप है कि प्रदर्शन स्थल पर लोगों के खाने, आराम करने और चिकित्सा सहायता लेने जैसी निजी गतिविधियों को भी रिकॉर्ड किया जा रहा है.

फेशियल रिकग्निशन तकनीक क्या करती है?

फेशियल रिकग्निशन एक डिजिटल तकनीक है. यह कैमरे में दिख रहे व्यक्ति के चेहरे की बनावट, आंखों की दूरी, नाक, जबड़े और अन्य विशेषताओं का विश्लेषण करती है. इसके बाद सिस्टम उस चेहरे का एक डिजिटल पैटर्न तैयार करता है. फिर इसकी तुलना पुलिस या किसी अन्य संस्था के पास मौजूद तस्वीरों के डेटाबेस से की जा सकती है. यदि कोई मिलान मिलता है, तो सिस्टम संभावित पहचान बता सकता है. समस्या यह है कि यह तकनीक गलत भी हो सकती है. किसी व्यक्ति की पहचान गलत होने पर उसे शक, पूछताछ या परेशानी का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए इस तकनीक के उपयोग के लिए स्पष्ट नियम और जवाबदेही जरूरी मानी जाती है.

फेशियल रिकग्निशन. फोटो: Pexels

विरोध के अधिकार पर डर का असर भी

भारत का संविधान नागरिकों को बोलने और शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने का अधिकार देता है. लोग सरकार, नीतियों या सामाजिक मुद्दों के खिलाफ अपनी बात कह सकते हैं. याचिका में कहा गया है कि यदि हर प्रदर्शनकारी को लगे कि उसका चेहरा रिकॉर्ड हो रहा है, उसकी पहचान दर्ज हो रही है और उसका डेटा भविष्य में इस्तेमाल हो सकता है, तो वह प्रदर्शन में आने से डर सकता है. इसे चिलिंग इफेक्ट कहा जाता है. इसका अर्थ है कि डर के कारण लोग अपने वैध अधिकार का इस्तेमाल कम करने लगे. वे बोलने, लिखने, सभा करने या विरोध करने से बच सकते हैं.

इसलिए चुनौती देने वालों का कहना है कि निगरानी का असर केवल उस व्यक्ति पर नहीं पड़ता जिसे रिकॉर्ड किया जा रहा है. इसका असर उन लोगों पर भी पड़ता है जो भविष्य में विरोध में शामिल होना चाहते हैं.

दिल्ली हाई कोर्ट

निजता का अधिकार क्यों महत्वपूर्ण है?

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2017 के पुट्टस्वामी फैसले में निजता को मौलिक अधिकार माना था. निजता केवल घर के भीतर की चीज नहीं है. सार्वजनिक जगह पर भी व्यक्ति की गरिमा, निजी जीवन और व्यक्तिगत जानकारी का महत्व रहता है. यह सही है कि सार्वजनिक स्थल पर लोगों को दूसरे देख सकते हैं, लेकिन लगातार रिकॉर्डिंग, चेहरों की डिजिटल पहचान और डेटा को लंबे समय तक रखने का मामला अलग है. एक व्यक्ति सड़क पर चल रहा हो, यह सामान्य बात है. लेकिन उसकी हर गतिविधि को कैमरे से रिकॉर्ड करना, चेहरे का डिजिटल डेटा बनाना और उसे डेटाबेस से मिलाना अधिक गंभीर हस्तक्षेप माना जा सकता है. यही अंतर इस कानूनी चुनौती के केंद्र में है.

क्या कहता है कानून और कानून के जानकार?

सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी कुमार दुबे भी साल 2017 के जस्टिस केएस पुट्टू स्वामी के फैसले के हवाले से राइट टू प्राइवेसी की चर्चा करते हैं. उनका कहना है कि यह एक फंडामेंटल राइट है. इस हिसाब से प्रदर्शनकारियों की निजता का हनन हो रहा है. उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है. पुलिस की इस पहल से प्रदर्शन करने वालों में निश्चित खौफ हो सकता है.

जस्टिस के एस पुट्टू स्वामी के फैसले में एक उसका एसेंशियल टेस्ट ये भी है कि अगर पुलिस को किसी मामले की जांच करने के लिए, जिसमें देश की एकता, अखंडता, संप्रभुता और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान हुआ है तो यह फैसला पुलिस को पावर भी देता है.

वह कहते हैं कि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कोई एसेंशियल रेग्युलेटरी प्रणाली नहीं है. कोई कानून नहीं है. यह बात सही है लेकिन जिस तरह से भीड़ हिंसक हुई. पुलिस वालों के ऊपर अटैक हुआ. बुजुर्गों पर हमले हुए. चोटें लगी तो उस सब के लिए जरूरी है कि तकनीक से हमलावरों की पहचान हो. शांतिपूर्ण प्रदर्शन सबका अधिकार है, लेकिन जैसे ही वह हिंसा में तब्दील होता है तो वहाँ पर कानून व्यवस्था अपना काम करती है. अब मसला उच्च न्यायालय में है. अदालत माननीय अदालत को देखना है कि वे इस मामले में क्या रुख अख्तियार करते हैं.

वकील अश्विनी कुमार दुबे निजता में दखल देने वाली सरकारी कार्रवाई को तीन कसौटियों पर खरा देखने की वकालत करते हैं.

  1. पहली: कानून यानी कार्रवाई के पीछे स्पष्ट और वैध कानूनी आधार होना चाहिए.
  2. दूसरी: वैध उद्देश्य. सरकार को बताना चाहिए कि निगरानी किस जरूरी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए की जा रही है.
  3. तीसरी: अनुपातिकता यानी जो कदम उठाया गया है, वह जरूरत से ज्यादा बड़ा नहीं होना चाहिए. यदि कम दखल वाले तरीके से काम चल सकता है, तो बहुत व्यापक निगरानी उचित नहीं मानी जाएगी. याचिका में कहा गया है कि जंतरमंतर की निगरानी इन तीनों कसौटियों पर सवाल खड़े करती है.

कानून और नियमों की कमी

भारत में पुलिस द्वारा फेशियल रिकग्निशन और एआई आधारित निगरानी के उपयोग के लिए अलग, विस्तृत और समर्पित कानून नहीं है. यही इस बहस का बड़ा कारण है. स्पष्ट नियमों की कमी में कई सवाल उठते हैं. पुलिस किसका डेटा जुटा सकती है? यह डेटा कितने समय तक रखा जाएगा? इसे कौन देखेगा? डेटा को चोरी या लीक होने से कैसे बचाया जाएगा? गलत पहचान होने पर नागरिक क्या कर सकेगा? डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 निजी डेटा के उपयोग से जुड़ा कानून है, लेकिन सरकारी एजेंसियों को इसमें व्यापक छूट मिल सकती है. आलोचकों का कहना है कि ऐसी छूट के कारण पुलिस निगरानी पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं रह जाता. याचिका का मुख्य तर्क है कि बिना स्पष्ट प्रक्रिया और स्वतंत्र निगरानी के ऐसी तकनीक का उपयोग मनमाना हो सकता है.

महिलाओं की गरिमा का सवाल

याचिका में महिलाओं की निजता और गरिमा पर विशेष चिंता जताई गई है. आरोप है कि बारिश के समय पर्याप्त आश्रय न होने पर कुछ महिलाओं को भीगे कपड़ों में प्रदर्शन स्थल पर रहना पड़ा. ऐसी संवेदनशील स्थिति में वीडियो रिकॉर्डिंग को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं. किसी व्यक्ति की सहमति के बिना उसकी कमजोर या असहज स्थिति को रिकॉर्ड करना उसकी गरिमा को प्रभावित कर सकता है. यह मुद्दा केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है. बुजुर्ग, बीमार, दिव्यांग और मानसिक तनाव से गुजर रहे प्रदर्शनकारी भी अधिक संवेदनशील स्थिति में हो सकते हैं.

क्या कहती है सरकार और पुलिस?

सरकार ने अदालत में कहा है कि प्रदर्शन की वीडियोग्राफी कानूनव्यवस्था बनाए रखने का सामान्य उपाय है. इसका उद्देश्य सार्वजनिक सुरक्षा और शांति बनाए रखना है. सरकार का यह भी तर्क है कि जब लोग खुले सार्वजनिक स्थान पर प्रदर्शन कर रहे हों, और कई लोग स्वयं वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हों, तब निजता का दावा सीमित हो सकता है. यह तर्क भी महत्वपूर्ण है. हिंसा, तोड़फोड़ या आपराधिक गतिविधियों की जांच में वीडियो सबूत उपयोगी हो सकते हैं. पुलिस को भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के लिए तकनीक की जरूरत पड़ सकती है. लेकिन असली सवाल यह है कि सुरक्षा के नाम पर निगरानी की सीमा क्या होनी चाहिए?

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