Renting vs Buying: मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु या पुणे जैसे बड़े शहरों में अपने नाम का एक घर होना हर किसी की सबसे बड़ी चाहत होती है. अक्सर लोग इसे केवल पैसों का लेनदेन नहीं मानते, बल्कि अपनी भावनाओं और इज्जत से जोड़कर देखते हैं. लेकिन आज के दौर में, जब प्रॉपर्टी के दाम बहुत ऊंचे हैं, तो क्या भारीभरकम ईएमआई चुकाना सही है? या फिर किराये के मकान में रहकर अपने पैसे शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में लगाना ज्यादा फायदेमंद है? इस उलझन को सुलझाने के लिए आइए 1 करोड़ रुपये के फ्लैट का पूरा हिसाबकिताब समझते हैं, ताकि आप बिना किसी नुकसान के सही फैसला ले सकें.

1 करोड़ रुपये के घर की असली लागत समझिए
अगर आप किसी बड़े शहर में 1 करोड़ रुपये का 2BHK फ्लैट खरीदने का मन बनाते हैं, तो सबसे पहले आपको अपनी बचत से 20 फीसदी यानी 20 लाख रुपये डाउन पेमेंट के तौर पर देने होंगे. बाकी बचे 80 लाख रुपये के लिए अगर आप 8.5 फीसदी ब्याज दर पर 20 साल के लिए होम लोन लेते हैं, तो हर महीने करीब 69,400 रुपये की ईएमआई बनेगी. इसके ऊपर से रजिस्ट्री, स्टाम्प ड्यूटी, मेंटेनेंस और प्रॉपर्टी टैक्स मिलाकर 6 से 8 लाख रुपये अलग से खर्च होंगे. अब गणित ये है कि 20 साल में आप 80 लाख के लोन पर लगभग 86.5 लाख रुपये सिर्फ ब्याज दे चुके होंगे. यानी 1 करोड़ का घर आपको आखिरकार 1.66 करोड़ रुपये में पड़ेगा.
किराये के मकान से मिल सकता है फायदा
अब जरा सिक्के का दूसरा पहलू भी देख लेते हैं. भारत के बड़े शहरों में 1 करोड़ रुपये के घर का किराया आमतौर पर औसतन 22,000 से 25,000 रुपये प्रति महीना होता है. अगर आप घर खरीदने के बजाय 25,000 रुपये किराये पर रहते हैं, तो ईएमआई और किराये का अंतर यानी हर महीने 44,400 रुपये आपकी जेब में बच जाते हैं. इसके अलावा, डाउन पेमेंट वाले 20 लाख रुपये भी आपके पास सुरक्षित रहते हैं.
अगर आप डाउन पेमेंट के बचे 20 लाख रुपये को 12 फीसदी सालाना रिटर्न देने वाले म्यूचुअल फंड में 20 साल के लिए लगा देते हैं, तो यह रकम बढ़कर लगभग 1.93 करोड़ रुपये हो जाती है. वहीं, हर महीने बचने वाले 44,400 रुपये की लगातार एसआईपी करने पर 20 साल बाद 4.43 करोड़ रुपये का फंड और तैयार हो जाता है. यानी 20 साल बाद आपके पास कुल 6.36 करोड़ रुपये की बड़ी रकम होगी, जो मकान की कीमत से काफी ज्यादा है.
घर लेने से पहले जान लें यह आसान फॉर्मूला
आपको घर खरीदना चाहिए या किराये पर रहना चाहिए, इसे तय करने का एक सीधा तरीका है, ‘ईएमआईटूरेंट रेशियो’ . इसे निकालने के लिए अपने इलाके के महीने के किराये को महीने की ईएमआई से भाग दिया जाता है. अगर यह अनुपात 1 से 1.5 के बीच आता है, तो घर खरीदना ही अक्लमंदी है. लेकिन अगर यह अनुपात 2.5 से ऊपर निकल जाता है , तो फिर वित्तीय नजरिए से किराये पर रहना और बाकी पैसे निवेश करना ही ज्यादा फायदेमंद रहता है.
आपके लिए खुद का घर सही है या किराये का कमरा
पैसे का गणित अपनी जगह है, लेकिन खुद के घर का एक अलग ही सुकून होता है. अपना घर होने पर कोई मकान मालिक आपको अचानक बाहर नहीं निकाल सकता, आप अपनी मर्जी से घर को सजा सकते हैं और बुढ़ापे में रहने का एक पक्का ठिकाना रहता है. वहीं, किराये पर रहने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपको जॉब के सिलसिले में शहर बदलने में कोई दिक्कत नहीं होती और आप कम बजट में भी बहुत बढ़िया लोकेशन पर रह सकते हैं.
अगर आपकी नौकरी पक्की है, पास में डाउन पेमेंट का पूरा पैसा है और आप अगले 1015 साल उसी शहर में रुकना चाहते हैं, तो घर खरीदना सही कदम होगा. लेकिन अगर आपकी उम्र 20 से 35 साल के बीच है, करियर में बदलाव की गुंजाइश है और आप बचे हुए पैसों को अनुशासन के साथ इन्वेस्ट कर सकते हैं, तो किराये पर रहना ही आपके लिए सबसे सही रास्ता है.



