भारत में हर साल करोड़ों लोगों की मौत हो जाती है. लेकिन उनमें से अधिकांश लोगों की मौत की असल वजह मेडिकल रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाती है. सरकार के लिए अधिक से अधिक मौतों को मेडिकली सर्टिफाइड करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि किसी देश की स्वास्थ्य नीति, बीमारी से लड़ने की रणनीति और भविष्य की स्वास्थ्य योजनाएं इसके डेटा पर ही निर्भर रहती है.

संसद में गृह मंत्रालय ने बीजेपी सांसद डा. संबित पात्रा के सवाल के जवाब में बताया कि साल 2024 में देशभर में 20,66,117 मौतों का मेडिकल सर्टिफिकेट ऑफ कॉज ऑफ डेथ जारी किया गया. देशभर में MCCD व्यवस्था जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत लागू है. इसके तहत मरीज का इलाज करने वाले डॉक्टरों को एक निर्धारित फॉर्म भरना होता है, जिसमें मृत्यु का कारण दर्ज करना जरूरी होता है.
Medical Certified Death
क्या है मेडिकल सर्टिफिकेशन ऑफ कॉज ऑफ डेथ?
मेडिकल सर्टिफिकेशन ऑफ कॉज ऑफ डेथ वह प्रक्रिया है. इसमें किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसका इलाज कर रहे डॉक्टर की तरफ से यह प्रमाणित किया जाता है कि मौत किस बीमारी, चोट या अन्य कारण से हुई है. यह सर्टिफिकेट सिर्फ मृत्यु को दर्ज करने के लिए बल्कि यह जानने के लिए भी जरूरी होता है कि देश में किन बीमारियों से लोगों की जान अधिक जा रही है.
संसद संबित पात्रा ने लोकसभा में अपने सवाल में पूछा कि क्या सरकार MCCD नीति लागू कर रही है, किन राज्यों में यह व्यवस्था नहीं है और क्या इसके प्रभाव का अध्ययन किया गया है. इसके जवाब में गृह राज्य मंत्रीनित्यानंद राय ने बताया कि MCCD पूरे देश में लागू है. साल 2024 में सभी 36 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों से 20,66,117 मेडिकल सर्टिफाइड मौतें दर्ज हुई हैं.
किन राज्यों में सबसे ज्यादा मेडिकल प्रमाणित मौतें?
- महाराष्ट्र: 3,27,174
- पश्चिम बंगाल: 2,74,770
- तमिलनाडु: 2,69,576
- कर्नाटक: 1,52,003
- गुजरात: 1,23,744
- राजस्थान: 1,04,324
- तेलंगाना: 98,647
- दिल्ली: 88,868
- उत्तर प्रदेश: 85,577
- ओडिशा: 84,562
- बिहार: 17,101
- झारखंड: 12,613
- हरियाणा: 14,868
यूपी, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में मेडिकल सर्टिफाइड मौतों की संख्या कम क्यों?
अगर मेडिकल सर्टिफाइड मौत के आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे किमहाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में मेडिकल सर्टिफिकेशन की संख्या अच्छीखासी है. हालांकि, यूपी, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में डॉक्टरों द्वारा घोषित मौतों की संख्या कम है. इसकी ये वजह कतई नहीं है कि यहां कम मौतें हुई हैं.
दरअसल, संसद के जवाब में केवल मेडिकल प्रमाणित मौतों की संख्या दी गई है. कुल पंजीकृत मौतों की संख्या नहीं दी गई है. इन राज्यों में मेडिकल सर्टिफाई डेथ केसेज इसलिए कम दिखाई पड़ सकते हैं, क्योंकि जागरूकता की कमी या फिर किन्हीं अन्य वजहों से मृतक अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे हैं. घर पर ही उनकी मौत हो रही है. उन्हें अस्पताल ले जाने की बजाय यही अंतिम संस्कार कर दिया जा रहा है.
केंद्र शासित प्रदेशों में भी मेडिकल सर्टिफाइड मौतों का आंकड़ा कम है. लद्दाख में 114, लक्षद्वीप में 389, सिक्किम में 1,818, अंडमान एवं निकोबार में 2,436 मेडिकल सर्टिफाइड मौते दर्ज हैं. वहीं, देश कुछ छोटे राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश में 326, नागालैंड में 444, सिक्किम में 1,818, मणिपुर में 2,446 मेडिकल सर्टिफाइड मौतें रिकॉर्ड की गई है. दरअसल, इन राज्यों की आबादी कम होने के कारण आंकड़े भी स्वाभाविक रूप से कम हैं
MCCD डेटा इतना महत्वपूर्ण क्यों?
कई एक्सपर्ट्स का कहना है अगर देश में हो रही मौतों की सही वजह नहीं पता चलेगी तो सरकार को ये नहीं पता चलेगा कि लोगों की जान किस बीमारी से सबसे ज्यादा जा रही है. इसके अलावा कोरोना जैसी महामारी को भी ट्रेस करना मुश्किल होगा. यही वजह है कि मेडिकल सर्टिफिकेट ऑफ कॉज ऑफ डेथ बहुत जरूरी है ताकि सरकार समय रहते ही तमाम बीमारियों के खिलाफ प्रभावी नीतियां बना सकें. साथ ही उसे यह भी पता चल सकेगा कि किन राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत है?
इसके अलावा हार्ट अटैक , कैंसर जैसी बीमारियों की रोकथाम पर भी समय से कदम उठाया जा सकेगा. अगर सड़क दुर्घटनाओं से मौतें बढ़ रही हैं या संक्रमण से तो उसे भी एड्रेस किया जा सकेगा.यही डेटा राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों, अस्पतालों की योजना, दवाओं की उपलब्धता और संसाधनों के आवंटन का आधार बनता है.
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?
फिलहाल, मेडिकल सर्टिफिकेट ऑफ कॉज ऑफ डेथ पूरे देश में लागू है. लेकिन इसका लागू होना पर्याप्त नहीं है. सबसे बड़ी चुनौती है कि देश में अधिक से अधिक मौतों का मेडिकल सर्टिफिकेशन हो.इसके लिए अस्पतालों, निजी स्वास्थ्य संस्थानों और डॉक्टरों की भागीदारी बढ़ानी होगी, ताकि मृत्यु के कारणों का वैज्ञानिक और विश्वसनीय रिकॉर्ड तैयार हो सके. अगर ऐसा नहीं होता है तोभारत की स्वास्थ्य नीति, महामारी प्रबंधन और भविष्य की चिकित्सा योजनाएं बुरी तरह प्रभावित होंगी.


