
लखनऊ: दा र्जिलिंग यानी पश्चिम बंगाल के सुदूर पहाड़ों पर बसा एक खूबसूरत शहर। यहां तक पहुंचने के लिए सिलीगुड़ी से करीब 65 किमी की यात्रा, जो पहाड़ों को चीरती हुई सड़क मार्ग से तय करना होता है। पश्चिम बंगाल के पूर्वी हिमालय के शिवालिक पर्वत माला पर स्थित यह शहर समुद्र तल से करीब सात हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। दार्जिलिंग आने वाले अमूमन वे लोग होते हैं, जो गंगटोक की सैर सपाटा करने जाते हैं। गंगटोक से करीब 70 किमी दूर दार्जिलिंग के लिए बेहद डरावने पहाड़ी मार्ग से आना होता है। सिलीगुड़ी से आते वक्त भी ऐसे ही रोमांचित करने वाली यात्रा का आनंद आता है।
गंगटोक से या सिलीगुड़ी से कितने ही सूखे मौसम में आप दार्जिलिंग के लिए निकले, कुछ ही दूरी पर स्थित पहाड़ी मार्ग पर पहुंचते ही आपको बरसात की फुहारें भिगोने से बाज नहीं आती। कभी तेज कभी मद्धिम और कभीकभी तो केवल ओस जैसी फुहारें आपकी यात्रा को गुदगुदा कर बेहद हसीन बना देती हैं। दार्जिलिंग आने के लिए कोई खास महीना नहीं होता, यहां आने के लिए हर महीने खास होते हैं और सभी का उसी अनुरूप आनंद की अनुभूति होती है।
दार्जिलिंग शहर में सड़क के साथसाथ हिमालयन रेलवे की स्टीम इंजन से चलने वाली दोचार बोगी की टॉय ट्रेन की सवारी आपको रोमांचित करती है। यह ट्रेन दार्जिलिंग के आर्थिक स्रोत का बड़ा जरिया भी है। इस ट्रेन से मनोहारी और हरेभरे पहाड़ों का दर्शन आपकी यात्रा को मनमोहक बनाता है। इसका किराया प्रति व्यक्ति 1200 रुपये तक है। इतने में ही टॉय ट्रेन आपको पूरे दार्जिलिंग की सैर कराती है। इस ट्रेन से यात्रा का आनंद लेने के लिए होड़ लगी रहती है, टिकट के लिए इंतजार भी करना पड़ता है। यह टॉय ट्रेन छुकछुक करते सिलीगुड़ी तक भी जाती है, जो पूरे आठ घंटे में वहां पहुंचती है।
दार्जिलिंग के आसपास स्थित कुछ मनोरम स्थल आपको अपनी ओर खींचे बिना नहीं रहती। यहां आप जितने दिन भी प्रवास पर रहें, एक एक दिन एकएक लम्हा यादगार और अनुभूतियों का भंडार होता है। इस शहर को हिल स्टेशनों की रानी भी कहा जाता है। माउंट एवरेस्ट और कंचन जंगा पर्वत माला, लहलहाते चाय बागान, हरेभरे वृक्ष और फूलों से लदे हर घर मकान आपको सदैव खुशनुमा माहौल में बांधे रहते हैं।
गोरखा वार मेमोरियल
दार्जिलिंग शहर से करीब पांच किमी दूर ‘घूम’ नामक स्थान पर एक जगह है बतीसिया लूप। इस स्थल को दार्जिलिंग गोरखा वार मेमोरियल के रूप में जाना जाता है। इस स्मृति स्थल का निर्माण स्वतंत्रता के बाद 22 मार्च 1995 को राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा के लिए विभिन्न युद्धों और सैन्य अभियान में दार्जिलिंग क्षेत्र के शहीद गोरखा सैनिकों की याद में कराया गया है। दार्जिलिंग घूमने आने वाले लोग इस स्थल पर आकर वीर शहीदों को नमन करना नहीं भूलते।
इन स्थलों की है अपनी खास शिनाख्त
दार्जिलिंग से 49,51 और 36 किमी की दूरी पर स्थित शहर क्रमशः मिरिक, कर्सियांग, कलिम्पांग अपनी अपनी विशेषता के लिए पहचाने जाते हैं। मिरिक जिसकी शिनाख्त चाय बागान और संतरे के लिए है, यहां के क्रिप्टोमीरिया के घने जंगल भी आपको लुभाते हैं। मिरिक झील में बोटिंग करिए और जब आराम करने का मूड बने, तो यहां हाजिर है आपके लिए एक दम शांत और आरामदेह टूरिस्ट हास्टल और छोटेछोटे खूबसूरत कॉटेज भी। कर्सियांग की पहचान दार्जिलिंग आते और जाते समय थोड़ा ठहरकर विश्राम स्थल की है। यहां बार युक्त रेस्टोरेंट की भरमार है, जहां थकान मिटाने के लिए टूरिस्ट कुछ देर के लिए रुकते हैं। यहां स्थित डाऊ हिल, बौद्ध मठ तथा ईगल क्रेग को लोग देखना पसंद करते हैं। कालिम्पोंग ऐसा स्थान है, जहां वर्ष भर ठंडी जैसा मौसम बना रहता है। कलकल करती तीस्ता नदी, हिमालय के दुर्लभ दृश्य देखने के लिए लोग दरबिंदरा प्वाइंट तक चढ़ाई कर जाते हैं।
दार्जिलिंग को है पृथक गोरखालैंड की आस
दार्जिलिंग मौजूदा समय में प्रस्तावित राज्य गोरखालैंड का हिस्सा है। गोरखालैंड के अधीन प्रस्तावित क्षेत्रों की आबादी करीबकरीब सवा करोड़ के आसपास है। यहां के लोगों की मूल भाषा नेपाली है। यहां गोरखा समुदाय के लोगों की बाहुल्यता है और ये लोग भारतीय सेना गोरखा रेजीमेंट से जुड़े होने के नाते स्वयं को भारतीय कहने में गौरवान्वित महसूस करते हैं। भूटान, चीन, नेपाल और बांग्लादेश की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से घिरे होने के नाते गोरखालैंड के नाम से अलग राज्य का दर्जा संभव नहीं है, लेकिन यहां के लोगों को पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार से काफी उम्मीदें हैं। हाल ही मुख्यमंत्री शुबेंदु अधिकारी के दार्जिलिंग दौरे पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के अगुआ विमल गुरुंग ने अपनी मांगों को उनके समक्ष रखा। गोरखालैंड की मांग नई नहीं है। सुभाष घिसिंग के नेतृत्व में गोरखा राष्ट्रीय मुक्त मोर्चा द्वारा पृथक गोरखालैंड की मांग बहुत पुरानी है। इस मांग को लेकर 1986 और 1988 के आंदोलन इतिहास में दर्ज है। इसमें हजारों लोगों की जान गई थी। विमल गुरुंग की अगुवाई वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का आंदोलन 2007 से जारी है। 2017 में करीब 105 दिन लंबी दार्जिलिंग बंद का भी एक इतिहास है। इसी बीच 2012 में पश्चिम बंगाल विधानसभा में पारित एक प्रस्ताव के जरिए गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, केंद्र सरकार तथा पश्चिम बंगाल सरकार के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ, जिसके तहत गोरखा हिल काउंसिल की जगह गोरखा लैंड प्रादेशिक प्रशासन का गठन किया गया है। यह संस्था दार्जिलिंग और कालिमपोंग के पहाड़ी इलाकों का प्रशासन संभालती है। इसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि सहित 59 विभागों के संचालन की जिम्मेदारी प्राप्त है, लेकिन इसे कोई विधायी अधिकार प्राप्त नहीं है। फिलहाल गोरखालैंड की मांग करने वालों के लिए यह आशा किरण है।
1954 में दार्जिलिंग बना पश्चिम बंगाल का हिस्सा
दार्जिलिंग और इसके आसपास का इलाका पूर्व में किरात राज्य का हिस्सा था, जिसे विजयपुर के नाम से जाना जाता था। विजयपुर के विघटन के बाद इस क्षेत्र पर सिक्किम और भूटान का कब्जा हुआ। भारत की आजादी के पूर्व सिक्किम और दार्जिलिंग कभी इनके कभी उनके शासन के अधीन रहा, लेकिन भारत के आजाद होने के उपरांत जब पूर्वोत्तर के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्र भारत में विलय हुए, तब 1954 में पारित कानून द अब्जाबर्ड एक्ट 1954 के तहत दार्जिलिंग और सिलीगुड़ी को पश्चिम बंगाल का हिस्सा घोषित किया गया।
ः



