
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के पहले दिन सोमवार को विधान परिषद में नियम110 के तहत प्रदेश में मानकों के विपरीत हो रहे अवैध निर्माण का मामला उठाते हुए कई गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। विधान परिषद में भाजपा एमएलसी विजय बहादुर पाठक ने सदन में यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि विकास प्राधिकरणों, आवास विकास परिषद तथा औद्योगिक विकास प्राधिकरणों के क्षेत्रों में लगातार अवैध निर्माण की शिकायतें सामने आ रही हैं, जिससे आम लोगों की सुरक्षा के साथसाथ शासन को भी असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
प्रदेश में 4.32 लाख से अधिक अवैध निर्माण चिन्हित
पाठक ने कहा कि राजधानी लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में 22 जून को हुई अग्निकांड की घटना इस समस्या का ज्वलंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर कराई गई जांच में लखनऊ सहित प्रदेशभर में बड़ी संख्या में अवैध भवन निर्माण पाए गए हैं। उनके अनुसार उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 4.32 लाख से अधिक अवैध निर्माण चिन्हित हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकांश निर्माण बिना स्वीकृत मानचित्र के आवासीय भूखंडों पर किए गए हैं और उनका व्यावसायिक परिसरों के रूप में उपयोग किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि कई भवनों के ध्वस्तीकरण के आदेश वर्ष 199293 में ही जारी हो चुके हैं, लेकिन आज भी वे भवन यथावत खड़े हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे भवन कभी भी बड़ी जनहानि का कारण बन सकते हैं। विधायक ने कहा कि अनेक मामलों में न्यायालय भी अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने के आदेश दे चुका है, लेकिन विकास प्राधिकरण और आवास विकास परिषद प्रभावी कार्रवाई तो दूर, समयबद्ध कार्ययोजना तक तैयार नहीं कर सके हैं। उन्होंने इसे विभागीय अधिकारियों की असंवेदनशीलता बताते हुए कहा कि इससे आम नागरिकों का जीवन खतरे में पड़ गया है। उन्होंने कहा कि पुराने अवैध निर्माणों को देखकर नए अवैध व्यावसायिक परिसर भी लगातार खड़े हो रहे हैं।
कई शहरों की स्थिति बताई चिंताजनक
मुख्यमंत्री की शहरी विस्तार योजनाओं से शहरों का विकास तो हो रहा है, लेकिन अनियंत्रित और अवैध निर्माण एक गंभीर चुनौती बनकर उभरे हैं। उन्होंने कहा कि गाजियाबाद, लखनऊ, प्रयागराज, मुरादाबाद, बरेली, आगरा, गोरखपुर और वाराणसी सहित कई बड़े शहरों में स्थिति चिंताजनक है, जहां अवैध निर्माणों से शहरों का सुनियोजित विकास प्रभावित हो रहा है और आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा भी खतरे में है। इन परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए पाठक ने इस लोकमहत्व के अविलंबनीय विषय पर सदन में विस्तृत चर्चा कराने अथवा सरकार की ओर से वक्तव्य दिए जाने की मांग की।



