भारत सरकार ने देश में निवेश का माहौल मजबूत करने, विनिर्माण को नई रफ्तार देने और विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के उद्देश्य से टैक्स कानूनों को रीकॉन्फ़िगर करने का एक बड़ा नीतिगत कदम उठाया है.

इस नीतिगत बदलाव का मुख्य मकसद कर व्यवस्था को सरल बनाना, कर विवादों और मुकदमेबाजी को कम करना तथा भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन के नए सेंटर के रूप में स्थापित करना है. नए डायरेक्ट टैक्स रिफॉर्म्स और एफटीए के साथ इंटीग्रेटिड टैक्स स्ट्रक्चर के जरिए सरकार का लक्ष्य घरेलू व विदेशी निवेशकों का भरोसा और मजबूत करना है.
आखिर सरकार के इस कदम के पीछे की मुख्य रणनीति क्या है? इससे भारतीय अर्थव्यवस्था, ‘मेक इन इंडिया’ कैपेंन और विदेशी निवेशकों पर क्या दूरगामी प्रभाव पड़ेगा? आइए इसे विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं…
संसद में आएंगे टैक्स से जुड़े बिल
सरकार ‘टैक्सेशन एंड अदर लॉज बिल, 2026’ के जरिए टैक्स पॉलिसी में बड़े बदलाव करने जा रही है. इसमें मैन्युफैक्चरिंग के लिए इंसेंटिव बढ़ाना और विदेशी इन्वेस्टमेंट फंड के लिए नियमों में ढील देना शामिल है. इस बिल में “खास इलेक्ट्रॉनिक सामान” की कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग पर छूट को 204041 तक बढ़ाए जाने की संभावना है. इस मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि इस लिस्ट में मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट, सर्वर, पहनने योग्य डिवाइस और उनसे जुड़े पार्ट्स शामिल हो सकते हैं.
कस्टम्स बॉन्डेड वेयरहाउस में इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स रखने वाली विदेशी कंपनियों को भी वित्त वर्ष 204041 तक टैक्स में राहत मिल सकती है. इस कदम का मकसद सप्लाई चेन को मजबूत करना और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की भारत की महत्वाकांक्षाओं को सपोर्ट करना है. यह बिल जून के इनकम टैक्स ऑर्डिनेंस की जगह लेने की कोशिश करेगा. साथ ही, यह ग्लोबल फंड मैनेजर्स के लिए रुकावट माने जाने वाले कई नियमों में ढील देगा, जैसे कि इन्वेस्टर की संख्या, मिनिमम कॉर्पस, इन्वेस्टमेंट डाइवर्सिफिकेशन और सहयोगी कंपनियों में इन्वेस्टमेंट पर पाबंदियां आदि हैं.
सरकारी कर्ज को आकर्षक बनाना
- इसमें विदेशी इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स और ‘बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स’ के पास मौजूद सरकारी सिक्योरिटीज से होने वाली ब्याज की कमाई और कैपिटल गेन पर टैक्स छूट देने का भी प्रस्ताव है. उम्मीद है कि इस छूट से इंटरनेशनल इन्वेस्टर्स के लिए भारतीय सरकारी डेट इंस्ट्रूमेंट्स का आकर्षण बढ़ेगा.
- बिल में रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट की डिविडेंड इनकम पर टैक्स छूट को फिर से लागू करने का प्रस्ताव है.
- प्रस्तावित बदलावों में भारतीय कंपनियों द्वारा चलाए जा रहे लीज्ड डेटा सेंटर के लिए टैक्स नियमों में ढील देकर भारत के बढ़ते डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को राहत देने की भी कोशिश की गई है. बिल में खास डेटा सेंटर्स से डेटा सेंटर सर्विस लेने वाली विदेशी कंपनियों से जुड़ी छूट में बदलाव का प्रस्ताव है.
- विदेशी कंपनी को केंद्र सरकार द्वारा नोटिफाई किए जाने की शर्त हटा दी गई है. ‘खास डेटा सेंटर’ की परिभाषा में भी बदलाव किया गया है ताकि इसमें भारतीय कंपनी द्वारा चलाया जा रहा डेटा सेंटर शामिल हो सके, बशर्ते तय शर्तें पूरी हों.
- इस बिल में नोटिफाइड स्पेशल जोन के ज़रिए बिना तराशे हीरों की सेल में शामिल विदेशी कंपनियों के लिए लंबे समय तक छूट का प्रस्ताव है. इसमें हीरा खनन कंपनियों, साइटहोल्डर्स, ब्रोकर्स, एग्रीगेटर्स और नीलामी करने वाली संस्थाओं को शामिल किया गया है.
- इसमें नई कॉर्पोरेट टैक्स व्यवस्था चुनने वाली स्पेशल पर्पस व्हीकल्स के लिए 25 फीसदी का ज्यादा सरचार्ज लगाने का प्रस्ताव है, जबकि दूसरी घरेलू कंपनियों के लिए यह 10 फीसदी है. इस बिल को आज यानी मंगलवार को लोकसभा में पेश किया जा सकता है.
यूपीआई से रिलेटिड बिल
इसमें जीरोचार्ज इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट को इनकम टैक्स एक्ट के एक खास प्रावधान से अलग करने का प्रस्ताव है. इसके बजाय, केंद्र सरकार के पास ‘पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट’ के तहत सीधे तौर पर योग्य इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट तरीकों को नोटिफाई करने का अधिकार होगा, जिससे पॉलिसी में तेजी से बदलाव किए जा सकेंगे. जानकारों का कहना है कि इस छूट से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए भारतीय सॉवरेन डेट इंस्ट्रूमेंट्स ज्यादा आकर्षक बनेंगे.
ग्रांट थॉर्नटन में टैक्स पार्टनर रिचा साहनी ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि कुल मिलाकर, ये बदलाव आर्थिक स्थिरता और निवेश को आसान बनाने की कोशिश को दिखाते हैं. इन उपायों का मकसद न सिर्फ ग्लोबल अनिश्चितताओं से पैदा होने वाली तुरंत की चुनौतियों से निपटना है, बल्कि रणनीतिक सेक्टर में काम करने वाले बिजनेस और निवेशकों के लिए टैक्स का एक ऐसा ढांचा भी देना है जिसके बारे में पहले से अंदाजा लगाया जा सके.


