
अगस्त महीना तीज का डबल धमाका लेकर आ रहा है. दरअसल, अगस्त में 2 तीज पड़ रही हैं. ये दोनों तीज हिंदू धर्म में बहुत अहम मानी गई हैं. इसमें एक तीज सावन महीने की है और एक भाद्रपद मास की. इतना ही नहीं सितंबर 2026 में भी एक अन्य तीज व्रत हरितालिका तीज पड़ेगा. ऐसे में उलझन होना सामान्य है कि कब कौन-सा तीज व्रत रखा जाएगा और इसमें निर्जला तीज व्रत कौनसा है?
3 बार रखा जाता है तीज व्रत
तीज व्रत माता पार्वती और भगवान शिव को समर्पित हैं. सावन और भाद्रपद महीने की 3 तृतीया तिथि को यह तीज व्रत रखे जाते हैं.
हरियाली तीज:
यह व्रत हर साल सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है. इसे सिंधारा तीज या श्रावण तीज भी कहते हैं. कुछ जगहों पर इसे छोटी तीज भी कहा जाता है. इस साल
हरियाली तीज व्रत 15 अगस्त 2026, शनिवार को रखा जाएगा. हिन्दू पंचांग के अनुसार, 14 अगस्त को तृतीया तिथि शाम 6 बजकर 46 मिनट पर शुरू होगी और 15 अगस्त 2026 को सुबह 5 बजकर 28 मिनट पर समाप्त होगी. उदया तिथि के आधार पर 15 अगस्त 2026 को यह व्रत रखा जाएगा.
कजरी तीज: भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाने वाला व्रत कजरी तीज कहलाता है, जिसे बड़ी तीज और कजली तीज भी कहा जाता है. इस साल कजरी तीज व्रत 31 अगस्त 2026, सोमवार को रखा जाएगा. हिन्दू पंचांग के अनुसार, 30 अगस्त को तृतीया तिथि सुबह 9 बजकर 36 मिनट पर शुरू होगी और 31 अगस्त 2026 को शाम 8 बजकर 50 मिनट पर समाप्त होगी. उदया तिथि के आधार पर 31 अगस्त 2026 को यह व्रत रखा जाएगा.
हरतालिका तीज: हरतालिका तीज व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है. इस साल हरतालिका तीज 14 सितंबर 2026 को है.
निर्जला व्रत कौन-सा?
इन तीनों तीज में हरतालिका तीज का व्रत पूरी तरह निर्जला रहकर रखा जाता है. इसमें व्रती महिलाएं 24 घंटे बिना अन्न-जल के यानी कि निर्जला रहती हैं.
तीज व्रत का महत्व
ये तीनों तीज व्रत अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और मनचाहे वर के लिए रखे जाते हैं. साथ ही इन सभी में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है. इनमें अंतर यही है कि ये तीज व्रत अलग-अलग जगहों पर प्रचलित हैं. विभिन्न राज्यों में ये तीज पर्व मनाए जाते हैं. जैसे- राजस्थान में हरियाली तीज और कजरी तीज प्रमुख हैं. वहीं बिहार-झारखंड समेत कई राज्यों में हरतालिका तीज व्रत प्रमुख तौर पर रखा जाता है.
(Disclaimer- यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पंचांग और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है. विभिन्न पंचांगों में तिथि या पूजा मुहूर्त में क्षेत्रानुसार अंतर संभव है.)



