अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को रामसर साइट का दर्जा मिला है. यह राज्य के लिए बड़ी पर्यावरणीय उपलब्धि है. ग्लॉ झील अरुणाचल प्रदेश की पहली रामसर साइट बनी है. यह झील अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है. अब अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने के बाद इसका महत्व और बढ़ गया है. यह दर्जा झील के संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के लिए बहुत अहम माना जा रहा है. ताजे फैसले के बाद अब भारत में रामसर साइट्स की संख्या बढ़कर 101 हो गई है.
आइए, ताजे संदर्भों के बहाने समझते हैं कि आखिर क्या होती है रामसर साइट? अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को इसका दर्जा मिलन कितना महत्वपूर्ण? यह भी जानेंगे कि झील कितनी पुरानी और कितनी खास है?
रामसर साइट के क्या हैं मायने?
रामसर साइट ऐसी आर्द्रभूमि होती है, जिसका पर्यावरणीय महत्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माना जाता है. आर्द्रभूमि में झील, तालाब, दलदल, नदी का क्षेत्र, मैंग्रोव, बाढ़ का मैदान और कुछ तटीय इलाके शामिल हो सकते हैं. रामसर कन्वेंशन की शुरुआत 2 फरवरी 1971 को ईरान के रामसर शहर में हुई थी. इसी शहर के नाम पर इस समझौते को रामसर कन्वेंशन कहा गया. इसका उद्देश्य दुनिया की महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों का संरक्षण करना है. किसी क्षेत्र को रामसर साइट घोषित करने से पहले उसकी पारिस्थितिक स्थिति का अध्ययन किया जाता है. देखा जाता है कि वह क्षेत्र दुर्लभ जीवजंतुओं और पौधों के लिए कितना महत्वपूर्ण है?
ग्लॉ झील कमलांग टाइगर रिजर्व और वन्यजीव अभयारण्य के क्षेत्र में आती है. फोटो: X/@byadavbjp
यह भी देखा जाता है कि वहां पानी का प्राकृतिक चक्र, जैव विविधता और स्थानीय जीवन किस तरह जुड़ा हुआ है? रामसर साइट बनने का अर्थ यह नहीं है कि वहां किसी भी तरह की गतिविधि पूरी तरह बंद हो जाती है. इसका उद्देश्य उस क्षेत्र का समझदारी से और टिकाऊ तरीके से उपयोग करना है. साथ ही, विकास कार्यों और पर्यटन को इस तरह नियंत्रित करना होता है कि प्राकृतिक पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे.
ग्लॉ झील कहां स्थित है?
ग्लॉ झील अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में स्थित है. यह झील कमलांग टाइगर रिजर्व और वन्यजीव अभयारण्य के क्षेत्र में आती है. यह इलाका पूर्वी हिमालय का हिस्सा है. झील घने जंगलों और पहाड़ी जलधाराओं से घिरी हुई है. इसे बारहमासी पहाड़ी धाराओं से पानी मिलता है. इसका अर्थ है कि झील को साल भर प्राकृतिक जलस्रोतों से पानी मिलता रहता है.
ग्लॉ झील तक पहुंचना आसान नहीं है. यहां पहुंचने के लिए जंगल के बीच करीब 20 किलोमीटर तक पैदल यात्रा करनी पड़ती है. इसी कारण यह झील आज भी अपेक्षाकृत शांत और प्राकृतिक रूप में बची हुई है. यहां पहुंचने वाले यात्रियों को घने जंगल, पहाड़ी रास्ते, हरियाली और साफ वातावरण देखने को मिलता है.
ग्लॉ झील को भारत की 101वीं रामसर साइट घोषित किया गया है.
ग्लॉ झील को रामसर दर्जा कब मिला?
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने इसी महीने ग्लॉ झील को भारत की 101वीं रामसर साइट घोषित किए जाने की जानकारी दी. यह अरुणाचल प्रदेश की पहली रामसर साइट है. इस घोषणा को राज्य की पर्यावरणीय विरासत के लिए महत्वपूर्ण कदम माना गया है. इससे ग्लॉ झील को देश और दुनिया में नई पहचान मिली है. राज्य के लिए यह दर्जा इसलिए भी खास है, क्योंकि अरुणाचल प्रदेश पूर्वी हिमालय का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यहां जंगल, नदियां, पहाड़ और आर्द्रभूमियां एकदूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं.
जैव विविधता के लिए क्यों खास है झील?
ग्लॉ झील और इसके जलग्रहण क्षेत्र में पौधों और पेड़ों की 150 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं. इस क्षेत्र में ऑर्किड की करीब 49 प्रजातियां भी पाई जाती हैं. ऑर्किड हिमालयी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों की खास वनस्पतियों में शामिल है. इनकी मौजूदगी इस क्षेत्र की जलवायु और वन पारिस्थितिकी के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देती है. झील का आसपास का जंगल कई वन्यजीवों का घर भी है. कमलांग क्षेत्र में हाथी, हिरण, जंगली सूअर, सिवेट, तेंदुआ बिल्ली, विशाल गिलहरी और उड़ने वाली गिलहरी जैसे जीव पाए जाते हैं. झील स्वयं और इसके आसपास का वन्य क्षेत्र मिलकर एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं. इसमें पानी, मिट्टी, पौधे, कीड़े, पक्षी और वन्यजीव एकदूसरे पर निर्भर रहते हैं.
झील जल सुरक्षा में कैसे मदद करती है?
आर्द्रभूमियां पानी को जमा करने का काम करती हैं. यह बारिश और पहाड़ी जलधाराओं के पानी को धीरेधीरे आगे बढ़ाती हैं. इससे नीचे के क्षेत्रों में अचानक बाढ़ का खतरा कम हो सकता है. ग्लॉ झील जैसी ऊंचाई वाली मीठे पानी की झीलें स्थानीय जलचक्र के लिए महत्वपूर्ण होती हैं. वे आसपास की धाराओं और नीचे बहने वाली नदियों को पानी देने में मदद करती हैं. आर्द्रभूमियां भूजल को रीचार्ज करने में भी योगदान देती हैं. वे मिट्टी में पानी के रिसाव को बढ़ाती हैं. इसके अलावा, इनके आसपास की वनस्पतियां मिट्टी के कटाव को रोकती हैं. जंगल और झील मिलकर कार्बन को भी अपने भीतर संचित करते हैं. इस कारण ऐसे क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं.
मिश्मी समुदाय की आस्था से जुड़ी है यह झील
ग्लॉ झील स्थानीय मिश्मी समुदायों की सांस्कृतिक आस्थाओं से भी जुड़ी हुई है. स्थानीय लोगों के लिए यह केवल पानी का स्रोत नहीं है. यह उनके इतिहास, परंपरा और प्रकृति से जुड़े विश्वासों का हिस्सा है. स्थानीय मान्यताओं में झील को पवित्र माना जाता है. लोक कथाओं के अनुसार, झील में चार संरक्षक देवताओं का निवास है. इन्हें दो लड़कों और दो लड़कियों के रूप में बताया जाता है. यह भी मान्यता है कि झील में कोई डूबता नहीं है. झील से जुड़ी ऐसी कथाएं स्थानीय संस्कृति का हिस्सा हैं. इनका वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. फिर भी, ये कहानियां झील को लोगों की भावनाओं से जोड़ती हैं. स्थानीय समुदाय लंबे समय से इस क्षेत्र के जंगल और जलस्रोतों के साथ रहते आए हैं. उनके पारंपरिक ज्ञान और संरक्षण की आदतों ने झील की प्राकृतिक स्थिति बनाए रखने में भूमिका निभाई है.
रामसर दर्जे से क्या लाभ होंगे?
रामसर दर्जे के बाद ग्लॉ झील के संरक्षण पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है. इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन, नियमित निगरानी और बेहतर प्रबंधन योजना तैयार की जा सकती है. झील के पानी, वनस्पतियों और वन्यजीवों पर लगातार नजर रखी जा सकेगी. इससे प्रदूषण, अवैध गतिविधियों और पर्यावरणीय बदलावों की पहचान समय पर हो सकती है. इस दर्जे से जिम्मेदार इकोटूरिज्म को भी बढ़ावा मिल सकता है. स्थानीय लोगों के लिए गाइड, होमस्टे, परिवहन और हस्तशिल्प से जुड़े रोजगार के अवसर बन सकते हैं.
ग्लॉ झील कितनी पुरानी है?
ग्लॉ झील को बहुत पुरानी झील कहा जाता है. इसका कारण इसका प्राकृतिक और लंबे समय से सुरक्षित हिमालयी वातावरण है. लेकिन, झील की भूगर्भीय उम्र का कोई निश्चित आंकड़ा नहीं मिलता है. इसकी सही उम्र जानने के लिए वैज्ञानिक भूगर्भीय अध्ययन, तलछट की जांच और जलविज्ञान से जुड़े शोध की जरूरत होगी. रामसर साइट का दर्जा झील की उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि उसके पर्यावरणीय और जैव विविधता संबंधी महत्व के आधार पर मिला है.



