
एक बार एक गणिका (वेश्या) के मन में विचार आया कि मेरा कल्याण कैसे हो सकता है? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए वह अलग-अलग संतों, ब्राह्मणों, संन्यासियों और विभिन्न संप्रदायों के गुरुओं के पास गई।
हर किसी ने उसे अपने-अपने मार्ग को श्रेष्ठ बताया। किसी ने कहा, “साधुओं की सेवा करो।” किसी ने कहा, “ब्राह्मणों की सेवा करो।” किसी ने अपने संप्रदाय को सबसे ऊंचा बताया और बाकी सबको गलत ठहराया।
यह देखकर वह सोच में पड़ गई कि यदि हर कोई केवल अपने समूह को ही श्रेष्ठ बता रहा है, तो फिर सत्य क्या है?
इसी उलझन में उसने एक दिन वेश्याओं के लिए भोज का आयोजन किया। उसी समय गांव के बाहर रहने वाले एक विरक्त संत वहां पहुंचे। उन्होंने रसोई से निकले चावल के मांड (पानी) से हाथ धोना शुरू कर दिया।
गणिका ने आश्चर्य से कहा, “बाबा, इससे तो हाथ और गंदे हो जाएंगे। साफ पानी से हाथ धोइए।”
संत मुस्कुराए और बोले, “यदि गंदे पानी से हाथ साफ नहीं हो सकते, तो केवल किसी व्यक्ति, जाति, वेश या संप्रदाय के कारण उसका संग कैसे कल्याणकारी हो सकता है?”
फिर उन्होंने समझाया—
“सच्चा संत वह है, जिसमें किसी भी मत, पंथ, जाति या संप्रदाय का अहंकार और पक्षपात न हो। जिसका आचरण पवित्र हो, जिसका जीवन निस्वार्थ हो और जिसका एकमात्र उद्देश्य जीवों का कल्याण हो। ऐसे संत का संग, चाहे वह किसी भी वर्ण, आश्रम, स्त्री या पुरुष रूप में हो, मनुष्य के जीवन को सही दिशा देता है।”
कथा का संदेश
- बाहरी पहचान से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का चरित्र और आचरण है।
- सच्चा मार्गदर्शक वही है जो स्वार्थ, अहंकार और पक्षपात से मुक्त हो।
- विवेक, सदाचार और निस्वार्थ भाव ही आध्यात्मिक उन्नति का आधार हैं।
- धर्म का सार दूसरों को छोटा दिखाना नहीं, बल्कि स्वयं को श्रेष्ठ आचरण से बेहतर बनाना है।
हर हर महादेव।



