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यूपी में ब्राह्मण वोट बैंक क्यों है जरूरी? कभी मायावती ने इसे साधकर बनाई थी सरकार, अब वही है अखिलेश का प्लान

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव आते ही कुछ जातियां अचानक सबसे ज्यादा चर्चा में आ जाती हैं. इनमें सबसे प्रमुख नाम है ब्राह्मण समाज. दिलचस्प बात यह है कि प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी करीब 12 फीसदी मानी जाती है, लेकिन चुनाव आते ही लगभग हर राजनीतिक दल सबसे पहले इसी वर्ग को साधने की कोशिश में जुट जाता है. ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित होते हैं, बड़े ब्राह्मण नेताओं को आगे किया जाता है और अलगअलग राजनीतिक संदेश दिए जाते हैं.

यूपी में ब्राह्मण वोट बैंक क्यों है जरूरी? कभी मायावती ने इसे साधकर बनाई थी सरकार, अब वही है अखिलेश का प्लान

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों? जब प्रदेश में कई अन्य जातियों की आबादी ब्राह्मणों से अधिक है, तब भी हर दल उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए इतनी मेहनत क्यों करता है? इसका जवाब केवल उनकी संख्या में नहीं, बल्कि उनके भौगोलिक फैलाव, सामाजिक प्रभाव और चुनावी निर्णायक भूमिका में छिपा है.

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है. पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य यूपी के लगभग हर इलाके में उनकी उल्लेखनीय मौजूदगी है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि करीब 60 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता सीधे तौर पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं. जबकि 100 से अधिक सीटों पर प्रभाव डालता है. यही कारण है कि कोई भी दल इस वर्ग को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता.

कांग्रेस से बीजेपी तक का सफर

आजादी के बाद लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का मजबूत सामाजिक आधार ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम समुदाय माना जाता था. कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी और श्रीपति मिश्र जैसे कई बड़े ब्राह्मण नेता कांग्रेस की पहचान थे, लेकिन 1990 के दशक में मंडल और कमंडल की राजनीति ने प्रदेश की तस्वीर बदल दी. राम मंदिर आंदोलन के बाद बड़ी संख्या में ब्राह्मण मतदाता बीजेपी के साथ आए. अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी और कलराज मिश्र जैसे नेताओं ने इस वर्ग में पार्टी की मजबूत पकड़ बनाई.

2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने गैरयादव ओबीसी, गैरजाटव दलित और सवर्ण मतदाताओं का बड़ा गठबंधन तैयार किया. इसमें ब्राह्मण समाज सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा. 2017 विधानसभा चुनाव में लगभग 83 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाताओं ने बीजेपी गठबंधन का समर्थन किया. 2022 में यह आंकड़ा बढ़कर करीब 89 प्रतिशत तक पहुंच गया. यह किसी भी बड़े सामाजिक वर्ग का किसी एक दल के प्रति सबसे मजबूत समर्थन माना जाता है.

फिर अचानक ब्राह्मणों की चर्चा क्यों?

अगर बीजेपी को इतना बड़ा समर्थन मिला, तो फिर आज ब्राह्मण वोट बैंक सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा क्यों बन गया है? दरअसल, पिछले कुछ समय से विपक्ष लगातार यह नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा है कि ब्राह्मण समाज का एक हिस्सा बीजेपी से नाराज है. इसकी कई वजहें बताई जा रही हैं. पहली वजह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जुड़ा विवाद माना जा रहा है. विपक्ष का दावा है कि इस मुद्दे ने शिक्षित सवर्ण वर्ग में असंतोष पैदा किया. हालांकि बीजेपी ने इस दावे को खारिज किया है, लेकिन विपक्ष इसे लगातार राजनीतिक मुद्दा बना रहा है.

दूसरी वजह प्रशासनिक स्तर पर कथित उपेक्षा को बताया जा रहा है. विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि थानापोस्टिंग, प्रशासनिक निर्णयों और स्थानीय सत्ता संरचना में ब्राह्मण समाज की पहले जैसी भागीदारी नहीं रही. खुशी दुबे का मामला और ब्राह्मण समाज के लोगों के निर्मम हत्या ने भी लोगों को नाराज किया. इसके अलावा शंकराचार्य का अपमान, बटुकों की चोटी खींचकर पिटाई के साथ ही प्रश्नपत्रों में ब्राह्मणों को लेकर पूछे गए विवादित सवाल ने भी नाराजगी बढ़ाई. घूसखोर पंडित फिल्म को भी ब्राह्मण समाज का एक तबका नाराज रहा.

हमेशा राम मंदिर और अयोध्या के मुद्दे पर बचने वाली समाजवादी पार्टी इस बार इसे ही मुद्दा बना रही है. कारण है राम मंदिर का चढ़ावा चोरी कांड. इस चोरी का खुलासा भी अखिलेश यादव ने ही एक ट्वीट के जरिए किया था. धीरेधीरे मामला खुला तो राम मंदिर चढ़ावा चोरी ने पूरे देश का हलकान कर दिया. बीजेपी के लिए राम मंदिर, उसके अस्तित्व से जुड़ा मसला है और उस राम मंदिर के चढ़ावा में चोरी ने उसे बैकफुट पर खड़ा कर दिया. अखिलेश यही भांप गए.

इसी आधार पर समाजवादी पार्टी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि बीजेपी का पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक कमजोर हो रहा है. बीजेपी के कुछ ब्राह्मण विधायकों की अलग बैठक भी चर्चा का विषय बनी थी. इसके बाद पार्टी नेतृत्व ने नाराजगी दूर करने के लिए लगातार संवाद बढ़ाया और फीडबैक लिया.

अखिलेश यादव की नई रणनीति

समाजवादी पार्टी ने 2027 चुनाव को देखते हुए अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. पहले पार्टी की राजनीति यादवमुस्लिम समीकरण के इर्दगिर्द मानी जाती थी. लेकिन अब अखिलेश यादव PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के साथसाथ सवर्ण समाज, खासकर ब्राह्मणों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. इसी रणनीति के तहत उन्होंने विधानसभा में माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष बनाया. परशुराम जयंती के कार्यक्रम आयोजित किए. ब्राह्मण सम्मेलनों में हिस्सा लिया.

गोरखपुर के वरिष्ठ ब्राह्मण नेता हरिशंकर तिवारी के परिवार के साथ सार्वजनिक रूप से खड़े नजर आए और अखिलेश हमेशा कहते रहते हैं कि ‘किसी को हाता नहीं भाता है.’ हाल के दिनों में ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित कर पार्टी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि समाजवादी पार्टी अब केवल एक जाति की पार्टी नहीं रह गई है. अखिलेश ने आज ब्राह्मण सम्मेलन में PDA का नया मतलब बताया, जिसमें PD को पंडित बताया. साथ ही श्रीकृष्ण और सुदामा की दोस्ती का जिक्र किया. साथ ही अयोध्या सीट से पवन पांडेय का अपना प्रत्याशी भी घोषित कर दिया.

क्या मायावती का फॉर्मूला दोहराया जा सकता है?

ब्राह्मण वोट बैंक की अहमियत सबसे पहले 2007 विधानसभा चुनाव में देखने को मिली थी. तब बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने दलितब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग किया. सतीश चंद्र मिश्रा को ब्राह्मण चेहरा बनाया गया. पूरे प्रदेश में सैकड़ों ब्राह्मण सम्मेलन हुए. नारा दिया गया ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा. इस रणनीति का परिणाम यह हुआ कि बसपा को पूर्ण बहुमत मिला और मायावती मुख्यमंत्री बनीं. उस समय की सरकार में बड़ी संख्या में ब्राह्मण मंत्रियों को जगह मिली. 1952 के बाद पहली बार बड़ी संख्या में ब्राह्मण मंत्री बने.

मायावती ने रामवीर उपाध्याय, राकेशधर त्रिपाठी, जनार्दन द्विवेदी, नकुल दुबे, रंगनाथ मिश्र, सुभाष पांडेय, अनंत कुमार मिश्र, राजेश त्रिपाठी, सुधीर मिश्रा, दद्दन मिश्रा को मंत्री बनाया था. साथ ही सतीश प्रसाद मिश्र और ब्रजेश पाठक को राज्यसभा भेजा था. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग का सबसे सफल प्रयोग था. यही वजह है कि आज समाजवादी पार्टी भी उसी मॉडल को अपने तरीके से दोहराने की कोशिश करती दिखाई देती है.

अखिलेश सरकार में बने थे इतने मंत्री

हालांकि, जब 2012 में अखिलेश यादव की अगुवाई में सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी तो 6 ब्राह्मण नेताओं को मंत्री बनाया गया था. साथ ही माता प्रसाद पांडेय को स्पीकर बनाया गया था. बाद में शिवाकांत ओझा और विजय मिश्रा को कैबिनेट में शामिल किया गया था. 2017 आतेआते ब्राह्मणों का सपा से मोहभंग हो गया था.

योगी सरकार के पहले कार्यकाल में कई मंत्री बने

फिर ब्राह्मण, बीजेपी में चले गए. योगी सरकार के पहले कार्यकाल में कई ब्राह्मण मंत्री बनाए गए थे. दिनेश शर्मा को डिप्टी सीएम बनाया गया था, जबकि बृजेश पाठक, श्रीकांत शर्मा, रामनरेश अग्निहोत्री, नीलकंठ तिवारी, सतीश चंद्र द्विवेदी, अनिल शर्मा, आनंद स्वरूप शुक्ला, रीता बहुगुणा जोशी, सत्यदेव पचौरी, अर्चना पांडेय और चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय को मंत्री बनाया गया था. साथ ही ब्राह्मण समुदाय के हृदय नारायण दीक्षित को विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी है. इसमें से रीता हुगुणा जोशी और सत्यदेव पचौरी ने 2024 का लोकसभा चुनाव जीतने पर इस्तीफा दे दिया था, जबकि अर्चना पांडेय का इस्तीफा ले लिया गया था.

दूसरे कार्यकाल में घट गई संख्या

योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल में ब्रजेश पाठक को डिप्टी सीएम बनाने के साथ ही जितिन प्रसाद, योगेंद्र उपाध्याय, दयाशंकर मिश्र, प्रतिभा शुक्ला, रजनी तिवारी और सतीश चंद्र शर्मा को मंत्री बनाया गया था. बाद में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद जितिन प्रसाद ने इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद सुनील शर्मा और मनोज पांडेय को मंत्री बनाया गया.

क्या कांग्रेस भी वापसी कर सकती है?

ब्राह्मण समाज कभी कांग्रेस का सबसे मजबूत वोट बैंक माना जाता था. अगर बीजेपी और ब्राह्मणों के बीच दूरी बढ़ती है, तो कांग्रेस भी खुद को एक विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकती है. हालांकि फिलहाल प्रदेश की राजनीति मुख्य रूप से बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच केंद्रित है, लेकिन कांग्रेस भी लगातार ब्राह्मण नेताओं को आगे लाने की रणनीति पर काम कर रही है.

2027 का सबसे बड़ा सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सचमुच ब्राह्मण वोट बैंक बीजेपी से दूर जा रहा है? या फिर यह केवल विपक्ष की राजनीतिक रणनीति है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ब्राह्मण मतदाता पूरी तरह किसी एक दल से अलग होते नहीं दिख रहे, लेकिन अगर इस वर्ग के सिर्फ 8 से 10 प्रतिशत वोट भी इधरउधर होते हैं तो उसका असर दर्जनों विधानसभा सीटों पर पड़ सकता है. यही वजह है कि बीजेपी इस वर्ग को किसी भी कीमत पर अपने साथ बनाए रखना चाहती है, जबकि समाजवादी पार्टी पहली बार पूरे जोरशोर से इस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है.

सपा के साथ नहीं जाएगा ब्राह्मण

योगी सरकार में मंत्री दया शंकर मिश्र दयालु ने कहा हतप्रभ हूं, हमारे जैसे लोग तो हतप्रभ हैं कि समाजवादी पार्टी का अचानक से ब्राह्मण प्रेम कहां से उमड़ आया. उनके दौर में भी मौका मिला था जब उत्तर प्रदेश की जनता ने उन्हें चुन कर भेजा था तो किस कदर ब्राह्मणों का अपमान किया. मुझे लगता है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण एक बड़ी जागरूक कौम है और वो उत्तर प्रदेश के विकास की इस सरकार के साथ है. वो बदलते हुए उत्तर प्रदेश के साथ है. देश के ग्रोथ इंजन वाले उत्तर प्रदेश के साथ है. वो वन डिस्ट्रिक्ट वन मेडिकल कॉलेज वाले उत्तर प्रदेश के साथ है. किसी के बहकावे में उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण नहीं आने वाला है. चाहे समाजवादी पार्टी कितने भी सम्मेलन करा ले.

सपा का सर्वसमाज से कोई लेना देना नहीं

उत्तर प्रदेश डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने कहा कि आज पूज्य जनेश्वर मिश्र की जयंती है. ऐसे अवसर पर मैं उनकी स्मृतियों को नमन करता हूं, श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं. ⁠समाजवादी पार्टी का, ब्राह्मण समाज का और सर्वसमाज से कोई लेना देना नहीं है. ये हमेशा तुष्टिकरण की पॉलिटिक्स करते रहे हैं और कभी अगड़ा कभी पिछड़ा कभी PDA… ये मुस्लिम वोट बैंक के लिए काम करते हैं. इनका आम जनता से कोई लेना देना नहीं है. ⁠आपको पता है कभी ये अगड़ा बोलते हैं PDA है. कभी पिछड़ा बोलते हैं, कभी अल्पसंख्यक बोलते हैं. इनका सर्वसमाज से कोई लेना देना नहीं है.

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