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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मुस्लिम विवाह और तलाक से जुड़े एक बेहद अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी धार्मिक संस्था या सेमिनरी द्वारा जारी फतवे के आधार पर फैमिली कोर्ट से तलाक की डिक्री हासिल नहीं की जा सकती. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पत्नी की अर्जी स्वीकार करते हुए पति द्वारा दाखिल की गई सिविल याचिका को खारिज कर दिया.
दरअसल, यह पूरा मामला डॉ. शाजिया नवाज खान और सैयद सामी अली के बीच का है. पति-पत्नी करीब दो साल से अलग रह रहे हैं. इस दौरान पति ने अपनी पत्नी के खिलाफ कई शिकायतों का जिक्र करते हुए भोपाल की दारुल इफ्ता मस्जिद कमेटी को पत्र लिखा और तलाक के संबंध में राय मांगी थी. दारुल इफ्ता मस्जिद कमेटी ने पति के आवेदन पर अपना जवाबी पत्र जारी किया. इसी पत्र को आधार बनाकर सैयद सामी अली ने भोपाल की फैमिली कोर्ट में तलाक के लिए याचिका दायर की. उनका दावा था कि कमेटी की राय के आधार पर तलाक को मान्यता दी जानी चाहिए.
पति सैयद सामी अली ने दारुल-इफ्ता मस्जिद कमेटी भोपाल द्वारा 29 अक्टूबर 2024 को जारी एक फतवे का हवाला देते हुए फैमिली कोर्ट में तलाक की घोषणा की डिक्री मांगी थी, जबकि पत्नी ने फैमिली कोर्ट में ऑर्डर 7 रूल 11 CPC’ के तहत आवेदन देकर इस केस को खारिज करने की मांग की थी. फैमिली कोर्ट से आवेदन खारिज होने के बाद पत्नी ने हाईकोर्ट में सिविल रिवीजन याचिका दायर की.
जबलपुर हाईकोर्ट के जज ने क्या कहा?
इस पूरे मामले में जबलपुर हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक जैन की एकल पीठ ने इस पूरे मामले पर सुनवाई की. हाईकोर्ट ने कहा कोई भी धार्मिक संस्था या दारुल-इफ्ता किसी मुस्लिम पुरुष को तलाक देने का अधिकार नहीं रखती. इसके साथ ही भोपाल मस्जिद कमेटी का फतवा केवल इस्लामिक ग्रंथों के आधार पर मार्गदर्शन देता है, यह खुद में तलाक का कोई आदेश या फैसला नहीं है. कोर्ट ने कहा कि फतवे के आधार पर तलाक की घोषणा चाहने वाले इस केस में कोई वैध कानूनी आधार नहीं बनता है.
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक बड़ी कानूनी भ्रांति को भी दूर किया. अमूमन यह माना जाता है कि मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939 के तहत केवल महिलाओं को ही तलाक के लिए कोर्ट जाने का अधिकार है. हाईकोर्ट ने अपने पिछले फैसलों और फैमिली कोर्ट्स एक्ट 1984 की धारा 7(d) का हवाला देते हुए कहा कि मुस्लिम पुरुष भी सीधे फैमिली कोर्ट जाकर तलाक की याचिका दायर कर सकते हैं.
फतवे के आधार पर दाखिल मुकदमा खारिज
अदालत ने माना कि पति ने गलतफहमी के कारण तलाक याचिका के बजाय फतवे के आधार पर तलाक की घोषणा का मुकदमा दायर किया था, इसलिए हाईकोर्ट ने उस केस को खारिज कर दिया. हालांकि कोर्ट ने पति को यह छूट दी है कि वह कानून के मुताबिक फैमिली कोर्ट में नए सिरे से तलाक की याचिका दाखिल कर सकता है.


