
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने आत्महत्या से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए मृतक द्वारा मौत से पहले अपने पिता को भेजे गए व्हाट्सऐप संदेशों को प्रथम दृष्टया ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ (मृत्यु पूर्व बयान) की श्रेणी में माना है। अदालत ने इन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और अन्य उपलब्ध सबूतों के आधार पर तीन आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
जमीन विवाद के बाद आत्महत्या का मामला
यह मामला धार जिले का है, जहां 25 वर्षीय संतोष उर्फ लखन औसारी ने कथित तौर पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, कृषि भूमि से जुड़े विवाद को लेकर करण जाट, धर्मेंद्र जाट और उमेश जाट लगातार मृतक पर दबाव बना रहे थे। उन पर गाली-गलौज, अपमानित करने और जान से मारने की धमकी देने के आरोप हैं। आरोप है कि लगातार मानसिक प्रताड़ना के कारण संतोष ने यह कदम उठाया।
मौत से पहले पिता को भेजे तीन WhatsApp संदेश
सुनवाई के दौरान अभियोजन ने अदालत को बताया कि मृतक के मोबाइल फोन की जांच में महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मिले हैं। रिकॉर्ड के मुताबिक, आत्महत्या से पहले संतोष ने अपने पिता के मोबाइल नंबर पर तीन व्हाट्सऐप संदेश भेजे थे। इन संदेशों में उसने कथित रूप से अपनी परेशानी का जिक्र करते हुए तीनों आरोपियों के नाम लिखे थे।
हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि ये संदेश मृत्यु से ठीक पहले दिए गए बयान की श्रेणी में आते हैं और मुकदमे की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में देखे जा सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि मृतक के पिता और भाई के पुलिस के समक्ष दर्ज बयान भी अभियोजन के पक्ष का समर्थन करते हैं।
बचाव पक्ष की दलील नहीं हुई स्वीकार
आरोपियों की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उन्हें पुरानी रंजिश के चलते झूठा फंसाया गया है और उनका आत्महत्या से कोई संबंध नहीं है। हालांकि, अदालत ने केस डायरी और उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद कहा कि आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री मौजूद है। ऐसे में इस चरण पर उन्हें जमानत देने का आधार नहीं बनता।
निचली अदालत का फैसला बरकरार
जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकलपीठ ने धार के विशेष न्यायाधीश (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम) द्वारा जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के आदेश को बरकरार रखा। साथ ही तीनों आरोपियों की अपील भी निरस्त कर दी।
अदालत के इस फैसले से यह संकेत मिलता है कि परिस्थितियों के अनुरूप डिजिटल माध्यम से भेजे गए संदेश भी न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जा सकते हैं।



