देश की आजादी में भारत छोड़ो आंदोलन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही. आज से ठीक 84 साल पहले इसकी शुरुआत आज के ही दिन यानी 8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में बंबई में शुरू हुआ. अगले ही दिन यह पूरे देश में फैल गया. महात्मा गांधी ने देश को नारा दिया थाकरो या मरो.अंग्रेज सरकार भारी जनसमर्थन से घबरा गई. उसने आंदोलन को शुरू होने से पहले ही दबाने की योजना बनाई.

9 अगस्त 1942 की सुबह महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया. जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और कांग्रेस के अन्य बड़े नेता भी बंदी बना लिए गए. इस आंदोलन की याद में देश अगस्त क्रांति दिवस मनाता आ रहा है. आइए, समझते हैं कि सारे बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए तो भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?
अरुणा आसफ अली ने जगाई आंदोलन की मशाल
भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे प्रमुख महिला नेताओं में अरुणा आसफ अली का नाम लिया जाता है. 9 अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान में उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज फहराया. आज इसी मैदान को अगस्त क्रांति मैदान कहा जाता है. उस समय कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेता गिरफ्तार हो चुके थे. ऐसे में अरुणा आसफ अली का ध्वजारोहण प्रतीकात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था. इससे जनता को संदेश मिला कि आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है. अरुणा आसफ अली भूमिगत हो गईं. उन्होंने गुप्त रूप से आंदोलनकारियों से संपर्क बनाए रखा.
अरुणा आसफ अली.
वे पर्चे छपवाती थीं. लोगों को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने के लिए प्रेरित करती थीं. उनका साहस युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया. अंग्रेज सरकार उन्हें पकड़ना चाहती थी. इसके बावजूद वे लंबे समय तक भूमिगत रहकर सक्रिय रहीं. देखते ही देखते आंदोलन की कमान देश की युवा पीढ़ी के हाथ में आ गया. महिलाओं के हाथ में आ गया. आम लोगों ने अगुवाई करना शुरू किया.
जयप्रकाश नारायण और भूमिगत संघर्ष
जयप्रकाश नारायण भारत छोड़ो आंदोलन के सबसे सक्रिय भूमिगत नेताओं में से थे. उन्हें हजारीबाग जेल में बंद किया गया था. नवंबर 1942 में वे जेल से भाग निकले. इसके बाद उन्होंने भूमिगत आंदोलन को मजबूत करने का प्रयास किया. जयप्रकाश नारायण ने देश के कई हिस्सों में गुप्त नेटवर्क बनाया.
जय प्रकाश नारायण.
वे आंदोलनकारियों को संगठित करते थे. उनका उद्देश्य अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक ढांचे को कमजोर करना था. उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि संघर्ष केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. जनता को अंग्रेजी शासन के साथ सहयोग बंद करना चाहिए. सरकारी कार्यालयों, डाक व्यवस्था और संचार तंत्र का बहिष्कार किया जाना चाहिए. जयप्रकाश नारायण का संघर्ष समाजवादी विचारधारा से भी जुड़ा था. वे स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक समानता की भी कल्पना करते थे.
डॉ. राम मनोहर लोहिया की महत्वपूर्ण भूमिका
डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भी भूमिगत आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया. वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे. महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने गुप्त रेडियो और संदेश व्यवस्था के माध्यम से आंदोलन को जीवित रखा. लोहिया ने देश के विभिन्न भागों में आंदोलनकारियों से संपर्क किया. वे गुप्त बैठकों में शामिल होते थे. उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनता को लगातार सक्रिय रहने का संदेश दिया. लोहिया का मानना था कि आंदोलन को शहरों के साथसाथ गांवों तक भी पहुंचना चाहिए.
डॉ. राम मनोहर लोहिया.
वे किसानों और मजदूरों को संघर्ष से जोड़ना चाहते थे. बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. जेल में उन्हें कठोर यातनाएं दी गईं. फिर भी उन्होंने अपने विचारों से समझौता नहीं किया.
उषा मेहता और गुप्त कांग्रेस रेडियो
भारत छोड़ो आंदोलन में उषा मेहता का योगदान बहुत विशेष था. उन्होंने भूमिगत कांग्रेस रेडियो चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. यह रेडियो 1942 में गुप्त रूप से प्रसारित किया जाता था. इस रेडियो से देशवासियों को आंदोलन से जुड़ी खबरें मिलती थीं. अंग्रेज सरकार की दमनकारी कार्रवाइयों की जानकारी भी जनता तक पहुंचाई जाती थी. कांग्रेस नेताओं के संदेश प्रसारित किए जाते थे. उस समय अंग्रेज सरकार ने समाचार पत्रों और सार्वजनिक सभाओं पर कड़ी पाबंदी लगा दी थी. ऐसे माहौल में कांग्रेस रेडियो जनता के लिए आशा का माध्यम बन गया.
उषा मेहता.
उषा मेहता और उनके साथियों ने रेडियो स्टेशन को बारबार स्थान बदलकर चलाया. अंग्रेज पुलिस उनकी तलाश कर रही थी. अंततः उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया.
सुचेता कृपलानी और महिला शक्ति
सुचेता कृपलानी ने भी भूमिगत गतिविधियों में योगदान दिया. उन्होंने महिला कार्यकर्ताओं को संगठित किया. गुप्त संदेश पहुंचाने और आंदोलनकारियों के बीच संपर्क बनाए रखने में उनकी भूमिका रही. इस आंदोलन में महिलाओं ने केवल सभाओं में भाग नहीं लिया. उन्होंने गिरफ्तारी दी. जुलूस निकाले. घायल आंदोलनकारियों की सहायता की.
सुचेता कृपलानी.
कई महिलाओं ने भूमिगत रहकर काम किया. कनकलता बरुआ, मातंगिनी हाजरा और अन्य अनेक महिलाओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया. बंगाल, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में महिलाओं ने आंदोलन को मजबूत बनाया.
विद्यार्थियों और युवाओं की भागीदारी
भारत छोड़ो आंदोलन में विद्यार्थियों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया. उन्होंने स्कूल और कॉलेज छोड़कर आंदोलन का साथ दिया. कई युवाओं ने सरकारी संस्थानों का बहिष्कार किया. युवाओं ने गुप्त पर्चे बांटे. टेलीफोन और तार व्यवस्था को बाधित किया. सरकारी कार्यालयों के बाहर प्रदर्शन किए. वे संदेशवाहक के रूप में भी काम करते थे. कई स्थानों पर युवाओं ने समानांतर प्रशासन बनाने की कोशिश की. सतारा में प्रति सरकार का गठन हुआ. इसका नेतृत्व क्रांति सिंह नाना पाटिल जैसे नेताओं ने किया. यह व्यवस्था कई वर्षों तक अंग्रेजी शासन को चुनौती देती रही. बंगाल के तामलुक क्षेत्र में भी समानांतर प्रशासन का प्रयास हुआ. इसे तम्रलिप्त राष्ट्रीय सरकार कहा गया. स्थानीय लोगों ने प्रशासन, राहत और सुरक्षा से जुड़े काम संभाले.
किसानों और आम जनता का नेतृत्व
महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन का असली आधार आम जनता बनी. किसानों ने सरकारी कर देने से इनकार किया. कई गांवों में अंग्रेजी अधिकारियों का बहिष्कार किया गया. रेल की पटरियां उखाड़ने और तार काटने जैसी घटनाएं भी हुईं. इन गतिविधियों का उद्देश्य अंग्रेजी शासन के संचार तंत्र को रोकना था. हालांकि कई स्थानों पर हिंसा भी हुई. महात्मा गांधी अहिंसा के पक्षधर थे. वे हिंसक घटनाओं से दुखी थे. इसके बावजूद यह स्पष्ट था कि जनता अब स्वतंत्रता के लिए निर्णायक संघर्ष करने को तैयार थी. आंदोलन का नेतृत्व स्थानीय स्तर पर बदलता रहा. कहीं विद्यार्थी आगे थे. कहीं किसान. कहीं महिलाएं. कई जगह स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने नेतृत्व किया.
अंग्रेजी सरकार का दमन भी चलता रहा
अंग्रेज सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए. हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने लाठीचार्ज किया. कई स्थानों पर गोली चलाई गई. प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई. सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगा दी गई. कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया गया. सरकार ने यह प्रचार किया कि आंदोलन अव्यवस्थित और हिंसक है. लेकिन दमन के बावजूद जनता का असंतोष समाप्त नहीं हुआ. आंदोलन कुछ समय बाद धीमा जरूर पड़ा, पर इसकी भावना देश में बनी रही.
क्या महात्मा गांधी के बिना आंदोलन कमजोर पड़ गया?
संगठनात्मक रूप से महात्मा गांधी की गिरफ्तारी का बड़ा प्रभाव पड़ा. कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व जेल में था. कोई खुला राष्ट्रीय नेतृत्व जनता के सामने नहीं था. फिर भी आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ. यह भूमिगत रूप में चलता रहा. अलगअलग क्षेत्रों में स्थानीय नेतृत्व उभरता रहा. यही भारत छोड़ो आंदोलन की विशेषता थी. यह किसी एक नेता पर निर्भर नहीं रहा. महात्मा गांधी ने आंदोलन की शुरुआत की थी. लेकिन उनकी गिरफ्तारी के बाद जनता ने इसे अपने संघर्ष में बदल दिया.



