RTI News Agra: उत्तर प्रदेश सरकार जहां “जीरो टॉलरेंस” की नीति के तहत भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई का दावा करती है, वहीं आगरा का सहकारिता विभाग इन दावों पर सवाल खड़े करता नजर आ रहा है। मामला किसानों की मेहनत की कमाई और सूचना के अधिकार से जुड़ा है, जहां जानकारी मांगने वाले किसान नेता को ही कथित तौर पर “मनोरोगी” घोषित कर दिया गया।

किसान नेता श्याम सिंह चाहर ने “नव भारत” से विशेष बातचीत में आरोप लगाया कि सहकारिता वेतन भोगी समिति और अन्य समितियों में किसानों के करोड़ों रुपये जमा हैं। उन्होंने आरटीआई के माध्यम से 15 बिंदुओं पर धनराशि और वित्तीय लेनदेन से जुड़ी जानकारी मांगी थी। आरोप है कि पारदर्शिता बरतने के बजाय विभागीय अधिकारी एवं जिला सहायक निबंधक आदित्य कुमार ने उन्हें मानसिक रोगी बताकर उनकी छवि धूमिल करने का प्रयास किया।
मुख्य विकास अधिकारी प्रतिभा सिंह से की थी शिकायत
श्याम सिंह चाहर का कहना है कि उन्होंने इस पूरे प्रकरण की शिकायत मुख्य विकास अधिकारी प्रतिभा सिंह से की। उनके अनुसार, CDO ने मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति भी की, लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ। इससे किसानों में विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी और अविश्वास बढ़ा है।
किसान नेता ने बताया कि जब स्थानीय स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने पूरे मामले की शिकायत मंडलायुक्त से की। उनका आरोप है कि सहकारिता विभाग में लंबे समय से वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आती रही हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती। उन्होंने उम्मीद जताई है कि मंडलायुक्त इस मामले में निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कठोर कदम उठाएंगे। साथ ही शासन स्तर पर भी संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की संस्तुति की जाएगी।
किसानों के हितों की रक्षा के लिए कर सकते हैं बड़ा आंदोलन
श्याम सिंह चाहर ने कहा कि यदि किसानों के हितों की रक्षा के लिए उन्हें करना पड़ा तो वह उससे भी पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि न्याय नहीं मिला तो वह विधानसभा के सामने आत्मदाह जैसे कठोर कदम उठाने को भी मजबूर हो सकते हैं।
किसान नेता श्याम सिंह चाहर ने ‘नव भारत’ को कई ऐसे दस्तावेज उपलब्ध कराए हैं, जिनके आधार पर उन्होंने के डिप्टी रजिस्ट्रार आदित्य कुमार पर गंभीर वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। चाहर का दावा है कि ये दस्तावेज विभाग की कार्यप्रणाली और निर्णयों पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ सवाल उठाने वाले को जवाब देने के बजाय उसकी मानसिक स्थिति पर सवाल खड़े करना प्रशासनिक जवाबदेही का हिस्सा है, या फिर यह सूचना मांगने वालों को डराने का नया तरीका? इस पूरे मामले पर अब प्रशासन और शासन की अगली कार्रवाई पर सभी की निगाहें टिकी हैं।



