
बस्ती: बस्ती जनपद मुख्यालय से महज 16 किलोमीटर दक्षिण, बहादुरपुर ब्लॉक से करीब दो किलोमीटर दूर महुआ डाबर आज भले ही एक गांव के अवशेष के रूप में दिखाई देता हो, लेकिन इसकी मिट्टी में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐसी रक्तरंजित कहानी दफन है, जिसे भारतीय इतिहास में वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वह हकदार थी। मनोरमा नदी के तट पर बसा यह समृद्ध गांव 3 जुलाई 1857 को ब्रिटिश दमन का शिकार हुआ। हजारों लोग मारे गए और पूरा गांव आग के हवाले कर दिया गया। ब्रिटिश रिकॉर्ड में बाद में इसे ‘गैरचिरागी’ यानी अस्तित्वहीन घोषित कर दिया गया।
महुआ डाबर कभी एक विकसित व्यापारिक केंद्र था। डॉ. फ्रांसिस बुकानन के 1813 के सर्वेक्षण में यहां करीब 200 घरों का उल्लेख मिलता है। कई घर खपरैल की छतों वाले और कुछ दो मंजिला थे। मनोरमा नदी के किनारे बसा यह कस्बा उस समय पुलिस सर्कल का केंद्र भी था। यानी जिस जगह को अंग्रेजों ने मिटा दिया, वह कोई साधारण बस्ती नहीं, बल्कि अपने समय का महत्वपूर्ण केंद्र थी।
पारिवारिक स्मृतियों से इतिहास की तलाश
महुआ डाबर की कहानी हमारे परिवार और आसपास के लोगों की स्मृतियों में पीढ़ीदरपीढ़ी जीवित थी। खेतों में जले हुए अवशेष मिलते थे और बुजुर्गों की जुबान पर गांव के विनाश की कहानियां थीं, लेकिन इन कथाओं में कितना इतिहास था और कितना लोकविश्वास, यह तय करना आसान नहीं था।
वर्ष 1997 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान महुआ डाबर आनाजाना शुरू हुआ। मनोरमा नदी के किनारे खेतों और पगडंडियों से गुजरते हुए ऐसा लगता था जैसे यह उजड़ा हुआ गांव अपनी कहानी खुद सुनाना चाहता हो। इसी दौरान वर्ष 1911 में इलाहाबाद के गवर्नमेंट प्रेस से प्रकाशित सर एडवर्ड आर्थर हेनरी ब्लंट की पुस्तक लिस्ट ऑफ इंस्क्रिप्शन ऑन क्रिश्चियन टॉम्स एंड टैबलेट्स ऑफ हिस्टोरिकल इंटरेस्ट इन द यूनाइटेड प्रोविंस ऑफ आगरा एंड अवध हाथ लगी। इसके पृष्ठ 206 पर विलियम पेप्पे की कब्र के शिलालेख में महुआ डाबर को जलाने का स्पष्ट उल्लेख मिला।
पेप्पे की कब्र पर दर्ज था कि उन्होंने 1857 के विद्रोह के दौरान सरकार को बहुमूल्य सेवाएं दीं और महुआ डाबर को जलाने की कार्रवाई में भूमिका निभाई। बाद में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बस्ती जिले में विशाल भूमि अनुदान दिया। स्कॉटलैंड के एबरडीन में उनकी कब्र आज भी संरक्षित है, लेकिन महुआ डाबर के अपने शहीदों की स्मृतियां उपेक्षित पड़ी थीं। यह विरोधाभास भीतर तक बेचैन करता था।
ब्रिटिश पत्राचार ने खोली दमन की पोल
महुआ डाबर के विनाश की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियां तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों के पत्राचार से सामने आती हैं। 15 जून 1857 को गोरखपुर के कार्यवाहक कमिश्नर डब्ल्यू. विनयार्ड ने डिप्टी कलेक्टर विलियम पेप्पे को मजिस्ट्रेट की शक्तियों के साथ बस्ती जाने का निर्देश दिया। साथ ही महुआ डाबर को पूरी तरह जलाकर नष्ट करने का आदेश दिया गया। पत्र में यहां तक कहा गया कि गांव का एक भी पत्थर साबुत नहीं बचना चाहिए। इसके बाद कई पत्रों में पेप्पे को अतिरिक्त सवार और सैनिक उपलब्ध कराने, महुआ डाबर को जलाने की तैयारी करने और कार्रवाई पूरी होने की सूचना देने के निर्देश दिए गए। 4 जुलाई 1857 को विनयार्ड ने महुआ डाबर के विनाश की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया और कार्रवाई पूरी करने के लिए पेप्पे को धन्यवाद दिया। इन दस्तावेजों से स्पष्ट होता है कि महुआ डाबर का विनाश कोई अचानक हुई भीड़ की हिंसा नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक प्रशासन के स्तर पर संचालित दमनात्मक कार्रवाई थी।
छह अंग्रेज अधिकारियों की हत्या और प्रतिशोध
1857 की बगावत जब जनयुद्ध का रूप ले रही थी, उसी दौरान महुआ डाबर के लोगों ने ब्रिटिश सेना के छह अधिकारियों लेफ्टिनेंट टी.ई. लिंडसे, लेफ्टिनेंट डब्ल्यू.एच. थॉमस, लेफ्टिनेंट जी.एल. कॉटली, सार्जेंट एडवर्ड्स, ए.एफ. इंग्लिश और टी.जे. रिची को मार डाला। इसके बाद अंग्रेजी शासन ने महुआ डाबर पर ऐसा दमनचक्र चलाया, जिसने पूरे गांव का अस्तित्व मिटा दिया। चार्ल्स बॉल की 1860 में प्रकाशित पुस्तक द हिस्ट्री ऑफ द इंडियन म्यूटिनी में सार्जेंट बुशर का बयान इस घटना का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। बुशर के अनुसार, अंग्रेज अधिकारियों का दल महुआ डाबर पहुंचा था, जहां ग्रामीणों ने उन पर हमला कर दिया। कई अधिकारी मारे गए और बुशर किसी तरह भागकर जमींदार बुल्ली सिंह के कब्जे में पहुंचा। वह करीब दस दिन तक कैद में रहा, जिसके बाद पेप्पे ने उसे छुड़ाया। इन घटनाओं ने अंग्रेजी शासन को महुआ डाबर के विरुद्ध और अधिक क्रूर कार्रवाई का बहाना दिया। गांव को घेरकर जलाया गया और उसके घर, बाजार तथा जीवन के सभी निशान मिटाने की कोशिश की गई।
महुआ डाबर संग्रहालय की स्थापना
महुआ डाबर की स्मृतियों को बचाने का काम बिना किसी सरकारी सहायता के शुरू हुआ। खेतों से मिलने वाले जले हुए अवशेष, पुराने दस्तावेज, पत्र, पुस्तकें और अन्य सामग्री धीरेधीरे एकत्र की गई। वर्ष 1999 में पूरा पिरई गांव में महुआ डाबर संग्रहालय की विधिवत स्थापना हुई। शुरुआत में यहां पहुंचना भी आसान नहीं था। मनोरमा नदी के किनारे घने पेड़पौधों और पगडंडियों से गुजरकर संग्रहालय तक पहुंचना पड़ता था। बाद में महुआ डाबर और रानीपुर को जोड़ने वाला पक्का पुल बना, जिससे आवागमन सुगम हुआ।
आज संग्रहालय दो हिस्सों में संचालित है। रिपॉजिटरी सेक्शन पूरा पिरई गांव में है, जबकि प्रदर्शनी केंद्र शहीद स्थल महुआ डाबर में स्थित है। यहां ऐतिहासिक दस्तावेज, पांडुलिपियां, मुकदमों की कार्यवाहियां, पत्र, समाचार पत्र, पुस्तकें, औजार, हथियार, छायाचित्र, पेंटिंग्स, मुद्राएं, डाक टिकट और महुआ डाबर से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री संरक्षित है। देशविदेश से आने वाले शोधार्थियों के लिए यह महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
शहादत की स्मृति को जीवित रखना
महुआ डाबर केवल एक गांव की कहानी नहीं है। यह उस सामूहिक विस्मृति की कहानी भी है, जिसमें हमने अपने ही इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को भुला दिया। ब्रिटिश शासन ने जिस गांव को ‘गैरचिरागी’ घोषित कर उसका नाम मिटाने की कोशिश की, वही महुआ डाबर आज फिर इतिहास और शोध की चर्चा में है। महुआ डाबर के शहीदों की स्मृति को बचाना हमारे लिए कोई निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी थी। ढाई दशक के प्रयासों से बस्ती मंडल का यह महत्वपूर्ण संग्रहालय आकार ले सका। हमने मिट्टी से आती चीखों को सुना, बारूद की गंध को महसूस किया और उन अनाम बलिदानियों की स्मृति को सहेजने का प्रयास किया, जिन्हें कफन तक नसीब नहीं हुआ।
आज सबसे बड़ा संतोष यही है कि जिस महुआ डाबर का नाम अंग्रेजी हुकूमत ने हमेशा के लिए मिटा देने की कोशिश की थी, उसी की राख से उसका इतिहास फिर जीवित हुआ है। महुआ डाबर की शहादत केवल अतीत नहीं, हमारी सामूहिक स्मृति और राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा है। इसे याद रखना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हमारा फर्ज था और हमने वह फर्ज अदा किया।
डॉ. शाह आलम राना, लेखक
लोक दर्पण



