Bareilly Central Jail 1929 Hunger Strike: उत्तर प्रदेश के बरेली की सेंट्रल जेल सिर्फ एक जेल की इमारत नहीं है. इसकी दीवारों में आजादी की लड़ाई का ऐसा इतिहास दर्ज है, जिसे याद करने पर आज भी क्रांतिकारियों के साहस और बलिदान की तस्वीर सामने आ जाती है. अंग्रेजी हुकूमत के दौर में इसी जेल की सलाखों के पीछे बंद स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई और कई बार अंग्रेज अफसरों को झुकने के लिए मजबूर किया.

आजादी के 79 साल बाद भी बरेली सेंट्रल जेल से जुड़ी क्रांतिकारियों की कहानियां लोगों को उस दौर की याद दिलाती हैं. इनमें सबसे खास है 1929 में हुई 53 दिन की भूख हड़ताल. इस हड़ताल ने अंग्रेजी शासन की नींव तक हिला दी थी.
काकोरी के क्रांतिकारियों ने जेल में शुरू की भूख हड़ताल
सितंबर 1929 में काकोरी कांड के सजायाफ्ता क्रांतिकारियों मन्मथनाथ गुप्त, राजकुमार सिन्हा, मुकुंदीलाल और शचींद्रनाथ बख्शी को बरेली सेंट्रल जेल में लाया गया था. जेल में पहुंचने के बाद उन्होंने राजनीतिक बंदियों के साथ होने वाले व्यवहार और सुविधाओं को लेकर आवाज उठाई. क्रांतिकारियों की मांग थी कि उन्हें अच्छा भोजन दिया जाए, बेवजह मेहनत न कराई जाए और पढ़नेलिखने की सुविधा मिले. उनका कहना था कि राजनीतिक बंदियों के साथ सामान्य अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए.
जेल प्रशासन ने जब उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया तो क्रांतिकारियों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी. अंग्रेज अफसरों ने हड़ताल खत्म कराने के लिए दबाव बनाया, लेकिन क्रांतिकारी अपने फैसले पर अड़े रहे. धीरेधीरे यह हड़ताल 53 दिन तक पहुंच गई.
भगत सिंह तक भेजना पड़ा था टेलीग्राम
बरेली जेल में चल रही भूख हड़ताल की खबर जब बाहर पहुंची तो देशभर में इसकी चर्चा होने लगी. लाहौर सेंट्रल जेल में बंद शहीदएआजम भगत सिंह तक भी इसकी जानकारी पहुंची. उन्होंने क्रांतिकारियों से भूख हड़ताल खत्म करने की अपील की, लेकिन बरेली जेल में बंद क्रांतिकारी अपनी मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए. स्थिति बिगड़ती देखकर अंग्रेजी हुकूमत को भगत सिंह तक टेलीग्राम भिजवाना पड़ा. इसके बावजूद क्रांतिकारियों ने तत्काल हड़ताल खत्म नहीं की.
उनका कहना था कि जब तक उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा. आखिरकार 53वें दिन जेल प्रशासन को क्रांतिकारियों के सामने झुकना पड़ा और भूख हड़ताल खत्म हुई. यह घटना बरेली सेंट्रल जेल के इतिहास में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारियों की बड़ी जीत के रूप में दर्ज हो गई.
दामोदर स्वरूप सेठ ने देश तक पहुंचाई क्रांति की आवाज
स्वाधीनता सेनानी दामोदर स्वरूप सेठ का नाम भी बरेली की इस क्रांतिकारी कहानी से जुड़ा है. वरिष्ठ साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी ने अपनी पुस्तक बरेली एक कोलाज में उनके योगदान का उल्लेख किया है. दामोदर स्वरूप सेठ ने जेल में चल रही भूख हड़ताल की खबरों को अखबारों के जरिए देश के अलगअलग हिस्सों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. इससे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चल रहे आंदोलन को लोगों तक पहुंचाने में मदद मिली.
दामोदर स्वरूप सेठ का जुड़ाव बनारस षड्यंत्र केस और काकोरी कांड समेत उस दौर के कई आंदोलनों से रहा. वह लगातार अंग्रेजी शासन के खिलाफ सक्रिय रहे और क्रांतिकारियों की आवाज को दबने नहीं दिया.
कई बड़े स्वतंत्रता सेनानी रहे सेंट्रल जेल में
बरेली सेंट्रल जेल में देश के कई बड़े स्वतंत्रता सेनानियों को भी बंद रखा गया था. इनमें देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता एमएन राय, साहित्यकार यशपाल, पेशावर कांड के विद्रोही चंद्र सिंह गढ़वाली, बंगाल के क्रांतिकारी गणेश घोष और विष्णुशरण दुबलिश जैसे नाम शामिल हैं. बनारस षड्यंत्र केस में गिरफ्तार प्रताप सिंह बारहट की भी बरेली सेंट्रल जेल से जुड़ी यादें हैं.
जेल की दीवारों ने इन स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष, यातना और हौसले को करीब से देखा है. आज जब देश आजादी की 79वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ रहा है, तब बरेली सेंट्रल जेल का यह इतिहास नई पीढ़ी को याद दिलाता है कि आजादी सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि हजारों क्रांतिकारियों के संघर्ष, त्याग और बलिदान का परिणाम है.



