
Internet Safety Tips: भारत में हर साल 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य बेटियों को सशक्त बनाना और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना है। लेकिन साल 2026 के इस दौर में सशक्तिकरण का मतलब केवल शिक्षा और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रह गया है। आज के युग में डिजिटल सशक्तिकरण और सुरक्षा सबसे अनिवार्य जरूरत बन गई है। जिस तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग बढ़ा है उसने माता-पिता की चिंता को दोगुना कर दिया है।
डीपफेक: एक अदृश्य खतरा
डीपफेक एक ऐसी तकनीक है जिसमें AI का उपयोग करके किसी व्यक्ति के चेहरे या आवाज को किसी दूसरे वीडियो या फोटो में बड़ी सफाई से बदल दिया जाता है। बेटियों के मामले में उनकी सोशल मीडिया फोटो का दुरुपयोग करके आपत्तिजनक सामग्री बनाने के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रीय बालिका दिवस पर यह जरूरी है कि हम अपनी बेटियों को इस अदृश्य खतरे से लड़ना सिखाएं।
फोटो शेयरिंग और प्राइवेसी का गोल्डन रूल
बेटियों को सिखाएं कि सोशल मीडिया पर पब्लिक प्रोफाइल रखना खतरनाक हो सकता है। उन्हें समझाएं कि अपनी फोटो केवल उन्हीं लोगों के साथ शेयर करें जिन्हें वे व्यक्तिगत रूप से जानती हैं। प्राइवेसी सेटिंग्स में जाकर फ्रेंड्स ऑफ फ्रेंड्स या पब्लिक व्यू को बंद करना सबसे पहला कदम होना चाहिए।
डिजिटल फुटप्रिंट के प्रति जागरूकता
इंटरनेट पर एक बार अपलोड की गई कोई भी चीज कभी पूरी तरह से खत्म नहीं होती। बेटियों को समझाएं कि वे जो भी पोस्ट कर रही हैं वह उनका डिजिटल फुटप्रिंट है। किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करना और अपनी निजी जानकारी जैसे स्कूल का नाम, घर का पता या फोन नंबर ऑनलाइन साझा न करना बहुत जरूरी है।
प्रतीकात्मक तस्वीर (सौ. फ्रीपिक)
टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA) है अनिवार्य
सुरक्षा की पहली परत पासवर्ड है लेकिन दूसरी परत 2FA है। अपनी बेटी के सभी सोशल मीडिया और ईमेल अकाउंट्स पर टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन सक्रिय करें। इससे यदि किसी के पास पासवर्ड चला भी जाए तो भी वह बिना ओटीपी (OTP) के अकाउंट लॉगिन नहीं कर पाएगा।
एआई अवेयरनेस और डीपफेक की पहचान
बेटियों को बताएं कि इंटरनेट पर दिखने वाली हर चीज सच नहीं होती। उन्हें डीपफेक वीडियो की पहचान करना सिखाएं जैसे चेहरे की बनावट में हल्का धुंधलापन या आंखों के झपकने का असामान्य तरीका। उन्हें यह भरोसा दें कि यदि उनके साथ कोई साइबर छेड़खानी होती है तो वे बिना डरे आपसे बात करें।
स्क्रीन टाइम और ओपन कम्युनिकेशन
माता-पिता और बेटी के बीच बातचीत का रास्ता हमेशा खुला होना चाहिए। उसे यह महसूस कराएं कि इंटरनेट एक उपयोगी साधन है लेकिन इसके खतरे भी हैं। सप्ताह में कम से कम एक बार अपनी बेटी के साथ बैठकर उसके डिजिटल अनुभवों पर चर्चा करें।
राष्ट्रीय बालिका दिवस पर हमारी सबसे बड़ी भेंट अपनी बेटी को सुरक्षित भविष्य देना है। डिजिटल दुनिया के इन 5 नियमों को अपनाकर हम अपनी लाडली को न केवल सशक्त बना सकते हैं बल्कि उसे तकनीक के बुरे साये से भी बचा सकते हैं।



