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हंसते-हंसते फांसी चूमने वाले क्रांतिकारी की कहानी, जिनकी सोच आज भी युवाओं में जोश भरती है

सरदार भगत सिंह आजादी के संघर्ष की क्रांतिकारी धारा का अकारण सबसे लोकप्रिय चेहरा नहीं हैं. उनकी लोकप्रियता का कारण केवल उनका साहस या उनका बलिदान नहीं था. असलियत में चौबीस वर्ष की छोटीसी उम्र में उन्होंने जितना पढ़ा, सोचा और लिखा, वह असाधारण था. उनका सपना केवल अंग्रेजी सत्ता को भारत से बाहर करने का नहीं था. वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जिसमें राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक मुक्ति भी हो. जहां शोषण और असमानता के लिए जगह न हो और जहां मनुष्य की गरिमा जाति, धर्म, संपत्ति या सत्ता के आधार पर तय न हो. इसीलिए भगत सिंह की विरासत को केवल उनकी कुर्बानी तक सीमित कर देना उनके विचारों को छोटा कर देना है.

हंसते-हंसते फांसी चूमने वाले क्रांतिकारी की कहानी, जिनकी सोच आज भी युवाओं में जोश भरती है

वे कहते थे कि क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है. उनकी असली विरासत उन सवालों में है, जिन्हें उन्होंने अपने समय में उठाया था और जिनमें से अनेक सवाल आज भी हमारे सामने खड़े हैं. वे समझते थे कि अंग्रेज चले जाएं लेकिन अगर शोषण की व्यवस्था बनी रहे. अमीर और अमीर जबकि गरीब और गरीब होता जाए तो स्वतंत्रता अधूरी ही रहेगी.

छोटी उम्र से अंग्रेजी गुलामी से लड़ने का संकल्प

28 सितंबर 1907 को जन्मे भगत सिंह तब सिर्फ 12 साल के थे. वे स्कूल से सीधे घर वापस नहीं आए. संतरियों की नजर बचाकर मैदान में दाखिल हुए. थोड़ी सी मिट्टी घर लाए. उसे पूजा स्थल पर रखा. लहू से रंगी है ये जलियांवाला बाग की मिट्टी थी, जहां 13 अप्रैल, 1919 को ब्रिगेडियर रेजिनाल्ड डायर ने गोलियों की बरसात करके तमाम निर्दोष भारतीयों के खून से होली खेली थी. 16 साल के भगत सिंह पर जब शादी का दबाव बढ़ा तो घर पिता के नाम पत्र छोड़कर महान स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार प्रताप में काम करने लिए कानपुर रवाना हो गए.

भगत सिंह.

पत्र में लिखा, मेरी जिंदगी मकसदे आला यानी आजादीएहिंद के असूल के लिए वक्फ हो चुकी है. इसलिए मेरी जिंदगी में आराम और बुनियादी खाहशात बायसे कशिश नहीं है. आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था तो बापू ने मेरी धागा बंधनी के वक्त एलान किया था कि मुझे खिदमते वतन के लिए वक्फ कर दिया गया.” भगत सिंह ने याद किया था कि उनके दो चाचा आजादी की लड़ाई के रास्ते चले. अपने पीछे दो विधवाएं छोड़ गए. तो क्या मैं भी किसी का सुहाग उजाड़ के जाऊं?

विद्यार्थी कानपुर से प्रताप नामक साप्ताहिक अखबार निकालते थे. 192324 में साल भर भगतसिंह उन्हीं के अधीन बलवंत नाम से काम करते रहे. वहीं उनकी बटुकेश्वर दत्त, शिव वर्मा और बी.के. शर्मा से मुलाकात हुई. आगे वे सब उनके हमसफर रहे. इन्हीं दिनों उन्हें क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन अॅसोसिएशन के बारे में जानकारी मिली. शचींद्र नाथ सान्याल ने इसकी स्थापना की थी. चंद्रशेखर आजाद इसके महत्त्वपूर्ण सदस्य थे. भगत सिंह की जल्दी ही उनसे निकटता बनी. अॅसोसिएशन से जुड़ने के बाद उन्होंने साथियों को संस्था के नाम में सोशलिस्ट शब्द जोड़ने के लिए राजी किया.

सिर्फ पुलिस से बचना मकसद नहीं

1925 में पिता के एक पत्र के बाद भगत सिंह लाहौर वापस आए. नौजवान सभा का गठन किया. अप्रैल, 1926 में वे सोहन सिंह जोश के जरिए उनकी पीजेंट्स एण्ड वर्कर्स पार्टी से जुड़े जो पंजाबी में कीर्ति पत्रिका प्रकाशित करती थी. भगत सिंह इस पत्रिका के संपादकीय बोर्ड में थे. इस पत्रिका में विद्रोही छद्म नाम से काकोरी मामले में एक लेख छपा था. भगत सिंह की 1927 में पहली गिरफ्तारी क्रांतिकारियों से संपर्क के संदेह में हुई. लाहौर में दशहरे के मेले में हुए बम विस्फोट में शरीक होने का भी उन पर आरोप था. साठ हजार की लंबी जमानत राशि पर उनकी रिहाई हुई थी. साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन की अगुवाई करते समय निर्मम लाठी चार्ज में घायल लाला लाजपत राय की मौत से क्षुब्ध क्रांतिकारियों ने प्रतिशोध में 17 दिसंबर 1928 को असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट जे.पी. साण्डर्स की गोली मारकर हत्या की थी. इस एक्शन में भगत सिंह की अग्रणी भूमिका थी. पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाई. पर सिर्फ पुलिस से बचना, उनका मकसद नहीं था.

जनता से जुड़ने के लिए गिरफ्तारी देने का फैसला

भगत सिंह गजब के पढ़ाकू थे. नियमित लाइब्रेरी जाते थे. वे समाजवादी विचारकों से प्रभावित थे. लेकिन उनकी वैचारिक यात्रा को किसी एक पुस्तक तक सीमित नहीं किया जा सकता. वे इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र और दर्शन सहित सबकुछ पढ़ते थे. वे पढ़ते थे और प्रश्न करते थे. दूसरों से संवाद करते थे. अपनी समझ को निरंतर विकसित करते थे. उनका कहना था, हमें साफ करना होगा कि क्रांति का मतलब सिर्फ उथलपुथल नहीं है. क्रांति में एक नए और बेहतर आधार पर समाज की पुनर्रचना जरूरी है. इसके लिए मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त करना होता है.

भगत सिंह और उनके साथी सोच रहे थे कि क्या उनके तौरतरीके से इच्छित परिणाम हासिल हो रहे हैं? लोगों का ध्यान खींचने के लिए कभीकभार हिंसक वारदातें उपयोगी हो सकती हैं. लेकिन केवल वही पर्याप्त नहीं हो सकता. उसके लिए जनमानस से जुड़ना होगा. पर कैसे? इसके लिए असेंबली का मंच चुना. तय किया कि वहां कुछ ऐसा किया जाए, जिसे जनता सुने और सरकार सुनने को मजबूर हो जाए. ऐक्शन के बाद वहीं रुकने और गिरफ्तारी देने का फैसला किया गया, ताकि सरकारी दावे कि क्रांतिकारी हत्यारों की टोली है, को गलत साबित किया जा सके.

क्रांतिकारी धारा का सबसे प्रभावी एक्शन

आठ अप्रैल, 1929 की तारीख तय की गई. इस एक्शन के लिए शुरुआत में बटुकेश्वर दत्त के साथ राम शरण दास के नाम था. फिर सुखदेव ने कहा कि भगत सिंह असेंबली और अदालत दोनों मंचों का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं. चंद्रशेखर आजाद उनके नाम पर राजी नहीं थे. लेकिन फिर भगत सिंह ने जिद पकड़ ली. सेंट्रल असेंबली में फेंके गए उन बमों का मकसद किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था. लेकिन उन बमों की गूंज दूर तक गई. साथ फेंके गए पर्चों का संदेश दूर तक फैला. उन पर्चों में लिखा था फ्रांस के मशहूर क्रांतिकारी शहीद वैलां का कथन कि बहरों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज की जरूरत होती है.

आगे लिखा था, पिछले दस बरसों के सुधारों के शर्मनाक इतिहास के जरिए भारतीय राष्ट्र का बारबार अपमान किया गया है. हम देख रहे हैं कि लोग साइमन कमीशन के सुधारों के कुछ टुकड़ों के लिए आपस में लड़ रहे हैं. सरकार हमारे ऊपर पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स जैसे दमनकारी कानून थोप रही है. अगले सेशन में प्रेस सीडिशन बिल लाने की तैयारी है. मजदूर नेताओं की अंधाधुंध गिरफ्तारियां की जा रही हैं. ऐसे भड़काने वाले हालात में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने पूरी संजीदगी से यह खास कार्रवाई का आदेश दिया है, ताकि अपमानजनक तमाशा बंद हो सके.

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने तय फैसले के तहत भागने की जगह अपनी गिरफ्तारियां दीं. आजादी की लड़ाई की क्रांतिकारी धारा का संभवतः यह सबसे प्रभावी एक्शन था, जिसने भारत की जनता में लड़ने का जोश भरा और उसकी ब्रिटेन सहित तमाम देशों में खूब चर्चा हुई.

अदालत प्रचार मंच, जेल विचारों की प्रयोगशाला

भगत सिंह जानते थे कि अदालत उनके लिए केवल मुकदमे की जगह नहीं, बल्कि विचारों के प्रचार का मंच बन सकती है. उन्होंने उस मंच का भरपूर इस्तेमाल किया. बचाव की कोशिश की जगह विदेशी सत्ता के अन्याय और शोषण के खिलाफ़ आवाज बुलंद की. जेल उनके लिए कैदखाना नहीं, विचारों की प्रयोगशाला बन गई. वहां लगातार पढ़ते और लिखते रहे. लंबी भूख हड़ताल के जरिए जुल्मज्यादती के खिलाफ लड़ते रहे. जेल में बंद भगत सिंह की छवि एक हथियारबंद नौजवान से आगे बढ़कर एक गंभीर राजनीतिक चिंतक और वैचारिक क्रांतिकारी के रूप में सामने आती है. उन्होंने कहा कि क्रांति का अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन नहीं और क्रांति हिंसा का पर्याय नहीं है. क्रांति का अर्थ अन्यायपूर्ण व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन है. भगत सिंह आजादी के संघर्ष की क्रांतिकारी धारा का अकारण सबसे लोकप्रिय चेहरा नहीं हैं. उनकी लोकप्रियता का कारण केवल उनका साहस या उनका बलिदान नहीं था. असलियत में चौबीस वर्ष की छोटीसी उम्र में उन्होंने जितना पढ़ा, सोचा और लिखा, वह असाधारण था.

फिर इसी देश में जन्म लेना चाहूंगा

भगत सिंह ने जेल जाने का रास्ता शहादत की पूरी तैयारी के साथ चुना था. इसलिए उन्होंने मुकदमे में बचाव की हर पेशकश को ठुकराया. इसकी कोशिश कर रहे पिता सरदार किशन सिंह से नाराज हुए. फांसी के एलान के बाद भी हौसले नहीं डिगे. उन्होंने उसी जेल में बंद कांग्रेस नेता भीमसेन सच्चर से कहा था, इंकलाबियों को मरना पड़ता है. उनके बलिदान से उनके मकसद को मंजूरी मिलती है, न कि अदालत में अपील से.

अपने क्रांतिकारी साथी विजय कुमार सिन्हा से कहा, अगर मुझे छोड़ दिया गया तो यह त्रासदी होगी. अगर मैं हंसतेहंसते मर गया तो भारत की माएं यह कामना करेंगी कि उनके बच्चे भगत सिंह के रास्ते पर चलें.” 23 मार्च 1931 को फांसी के सिर्फ दो घंटे पहले उनकी आखिरी इच्छा जानने के लिए वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिले थे. भगत सिंह कोठरी में चहलकदमी कर रहे थे. मुस्कुराते हुए भगत सिंह ने किताब द रेवोल्यूशनरी लेनिन के बारे में जानकारी मांगी. मेहता ने किताब उनकी ओर बढ़ाई. भगत सिंह की निगाहें किताब पर थीं. मेहता ने पूछा था कोई संदेश ? किताब पलटते हुए भगत सिंह का उत्तर था, साम्राज्यवाद मुर्दाबादइंकलाब जिंदाबाद. मेहता ने पूछा कैसा महसूस कर रहे हैं? हमेशा की तरह खुश. आखिरी इच्छा? हां, मैं इसी देश में फिर जन्म लेना चाहूंगा, ताकि मैं फिर उसकी सेवा कर सकूं.

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