तुम लोगों का सेलेक्शन कभी नहीं होगा, भागो यहां से… 15 साल पहले एक प्रखंड विकास पदाधिकारी द्वारा कहे गए इन कड़वे शब्दों ने सिवान जिले के एक साधारण युवक के दिल पर ऐसी छाप छोड़ी कि उसने अपनी किस्मत बदलने का फैसला कर लिया. जिस अफसर ने अपमानित कर भगाया था, उसी की कुर्सी तक पहुंचने की जिद में युवक ने 15 सालों तक असफलता, गरीबी और मानसिक दबाव से लड़ाई लड़ी.

ये कहानी है सिवान जिले के भगवानपुर प्रखंड स्थित शंकरपुर गांव के रहने वाले दीपक कुमार की, जिन्होंने BPSC परीक्षा में शानदार सफलता हासिल कर अपने सपने को हकीकत में बदल दिया है. गुरुवार को पटना के बापू सभागार में आयोजित समारोह में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दीपक को औपचारिक रूप से नियुक्ति पत्र सौंपा. दीपक की यह जीत महज एक परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है, बल्कि तीन पीढ़ियों के इंतजार और एक परिवार के अभूतपूर्व त्याग की दास्तान है.
2011 में पटना की धरती पर कदम, 15 साल और 6 नाकामी का दर्द
दीपक कुमार ने बताया कि सिविल सेवा में जाने का सपना लेकर वह वर्ष 2011 में पटना आए थे. इसके बाद से वह लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गए. BPSC 64वीं परीक्षा से उन्होंने सिविल सर्विसेज के लिए लगातार प्रयास शुरू किए, लेकिन हर बार सफलता उनके हाथ से फिसल जाती थी. कभी पीटी निकलती तो मेन्स में बात अटक जाती, कभी मेन्स पास होता तो इंटरव्यू की बाधा पार नहीं हो पाती.
दीपक ने दरोगा, BSSC और रेलवे जैसी कई परीक्षाओं में भी असफलता झेली. यह उनका सातवां प्रयास था. दीपक बताते हैं कि अगर इस बार भी चयन न होता तो उनका हौसला पूरी तरह टूट जाता, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि शायद कमी उन्हीं में है.
जब आया रिजल्ट: 15 साल का संघर्ष एक पल में हुआ सफल
परिणाम आने की शाम को याद करते हुए दीपक बताते हैं कि जब उन्होंने सफल अभ्यर्थियों की सूची में अपना नाम देखा, तो कुछ पलों के लिए उन्हें अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ. 15 साल की रातदिन की मेहनत, असफलताएं और वह कड़वा ताना सब एक साथ उनकी आंखों के सामने घूम गया. जिस ताने ने कभी उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था, वह आज उनकी ऐतिहासिक सफलता के सामने बौना साबित हो चुका था.
मां ने बेचे जेवर, पिता ने खेत रखे गिरवी
दीपक के परिवार में बीते तीन पीढ़ियों से किसी की भी सरकारी नौकरी नहीं लगी थी. इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे उनके परिवार की अनगिनत कुर्बानियां दर्ज हैं. दीपक अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने बड़े भाई को देते हैं और कहते हैं, ‘मेरा भाई मेरे लिए भगवान है.’ पिछले 15 सालों से बड़े भाई ने ही बिना कोई सवाल पूछे दीपक का आर्थिक खर्च उठाया और हर असफलता के बाद उनका ढांढस बंधाया.
पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए पिता को अपने खेत गिरवी रखने पड़े और मां सुचिता देवी ने अपने सोने के जेवर तक बेच दिए. नियुक्ति पत्र मिलने के बाद मां की आंखों से आंसू छलक पड़े. मां ने भोजपुरी में भावुक होते हुए कहा “हमनी के गरीब बानी, दीपक आवत त घर से दाल, चावल, आटा पटना ले जा तअ.” वहीं पिता ने कहा “हम कभी पटना नहीं देखे थे, बेटा अफसर बना तो पहली बार पटना आए और मुख्यमंत्री जी के हाथों नौकरी मिली, बहुत खुश हैं.”
रात 11 बजे गांव में फूटे पटाखे, ग्रामीणों ने मनाया जश्न
रिजल्ट आने के बाद जब दीपक पहली बार रात 11 बजे अपने गांव शंकरपुर पहुंचे, तो पूरा गांव सो चुका था. लेकिन जैसे ही यह खबर फैली कि ‘दीपक अफसर बन गया है’, पूरा गांव जग गया. ग्रामीणों ने घरों से बाहर निकलकर ढोलनगाड़ों और पटाखों के साथ दीपक का भव्य स्वागत किया. गांव वालों के लिए यह जीत केवल दीपक की नहीं, बल्कि उनके पूरे इलाके के मान की जीत थी.
अब जनता के लिए दरवाजे रहेंगे हमेशा खुले
अधिकारी बनने के बाद दीपक उस पुराने वाकये को याद करते हुए कहते हैं कि किसी भी प्रशासनिक अधिकारी को आम जनता के साथ हमेशा नम्र और संवेदनशील होना चाहिए. दीपक ने संकल्प लिया कि उनके दफ्तर का दरवाजा हर पीड़ित और जरूरतमंद के लिए हमेशा खुला रहेगा और सरकार की हर योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक पहुंचाना उनकी सबसे पहली प्राथमिकता होगी.



