
भारत की स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, समानता, न्याय और राष्ट्रहित के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रतीक है। आजादी के 79 वर्षों में देश ने विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और बुनियादी ढांचे में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिकराजनीतिक विभाजन, अवैध घुसपैठ, जातीयसांप्रदायिक राजनीति और लोकतांत्रिक मर्यादाओं में गिरावट जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब हर नागरिक को समान अवसर, न्याय और सम्मान मिले। स्वतंत्रता दिवस हमें उपलब्धियों के साथ कमियों पर आत्ममंथन का अवसर देता है। राष्ट्र की एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता बनाए रखना प्रत्येक भारतीय का साझा दायित्व है।
भारत को ब्रिटिश दास्ता से मुक्त हुए उन्यासी वर्ष बीत चुके हैं। इन उन्यासी सालों में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था लोकतंत्र के मूल मूल्यों पर कितनी खरी उतर रही है तथा स्वतंत्रता, समानता और न्याय के बुनियादी सिद्धांत क्या आम आदमी के प्रति निष्पक्ष रूप से लागू है अथवा उस पर भी अवसरवादी व अलगाववादी जातीय राजनीति का कुत्सित चेहरा प्रभावी है। यह गंभीर चिंतन का विषय है। कौन नहीं जानता कि किसी भी राष्ट्र के समग्र एवं चहुंमुखी विकास के लिए वहां के सभी नागरिकों का राष्ट्र के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण होना पहली अनिवार्यता होती है।
यह भी आवश्यक होता है कि प्रत्येक नागरिक जाति, धर्म, संप्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पित रहे तथा व्यक्तिगत स्वार्थ को नकार कर राष्ट्र को सर्वोपरि माने। बहरहाल स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने भले ही भौतिक संसाधनों में चाहे जितनी वृद्धि की हो, मगर कुछ समस्याएं दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ी हैं, जिन पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया। कहींकहीं राजनीतिक कारणों से समस्याओं को नजरअंदाज किया गया, जिस कारण समस्याएं विकराल होती गईं। कौन नहीं जानता कि देश में अधिकांश समस्याओं की जड़ बढ़ती जनसंख्या है, जिस पर अंकुश न लगाए जाने से स्थिति विस्फोटक हो चुकी है। महंगाई और बेरोजगारी इसी के चलते बढ़ रही है। वस्तुस्थिति यह है कि सीमित संसाधनों के चलते हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी जैसी मूलभूत सुविधाओं को व्यवस्थित करना कठिन हो गया है। यही नहीं, सीमांत प्रदेशों में विदेशी घुसपैठियों की सटीक पहचान न होने से घुसपैठिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ बने हुए हैं, तिस पर सत्ता सुख के लिए राजनीतिक दलों द्वारा मालएमुफ्त दिलएबेरहम जैसी नीतियां अपनाकर मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने से देश में ऐसी जमात खड़ी हो गई है, जो मुफ्त का माल खाकर भी देश की सगी नहीं है। देश का उत्तरोत्तर विकास जिनका दायित्व है, उनके कार्य में बाधा डालने के लिए अपने पैरों तले से सियासी धरती खो चुके राजनीतिक दल एकजुट होकर विरोध का कोई अवसर नहीं चूकना चाहते। यूं तो सत्ता पर नकेल कसकर निरंकुश सत्ता को सचेत करना स्वस्थ विपक्ष का दायित्व होता है, लेकिन सिर्फ विरोध के लिए विरोध करके कल्याणकारी योजनाओं में अवरोध उत्पन्न करना किसी भी स्थिति में सही नहीं ठहराया जा सकता। देश का दुर्भाग्य है कि किसी भी समस्या के निपटने के बाद भी समस्या को मुद्दा बनाकर अराजकता उत्पन्न करना ही कुछ लोगों का एकमात्र उद्देश्य रह गया है। ऐसे में सही को सही कहने का साहस भी कोई नहीं जुटा पा रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अश्लील गालियां और अभद्र भाषा का प्रयोग देश की स्वाधीनता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। ताज्जुब तब होता है, जब विपक्ष की राजनीति करने वाले तथाकथित नेता गाली बाजों के समर्थन में खड़े होकर अश्लील कृत्यों की पीठ थपथपाने में शर्म महसूस नहीं करते।
राष्ट्रहित में सुधारों की चुनौती
देश में बरसों से राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने और सभी के साथ समान न्याय हेतु समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की बात की जा रही है, किंतु समान नागरिक संहिता का नाम सुनते ही कथित सांप्रदायिक शक्तियां विरोध करने पर उतारू हो जाती हैं। जैसे उन्हें औरों से अधिक सुविधाएं व अधिकार मिलें, कुछ राजनीतिक दलों को लगता है कि यदि समान नागरिक संहिता लागू हो गई, तो उनका अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है। इसी प्रकार जनसंख्या नियंत्रण की चर्चा करते ही कुछ धर्मगुरुओं की धार्मिक आस्थाएं आहत होने लगती हैं, जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को वह प्रकृति के विरुद्ध सिद्ध करने लगते हैं। जिस कारण राष्ट्र के कर्णधार कठोर निर्णय लेने की अपेक्षा अपने कदम पीछे हटाने के लिए विवश होते हैं तथा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार योजनाबद्ध ढंग से नहीं हो पाता। पुरानी कहावत है कि विदेशी या प्रत्यक्ष दुश्मन से लड़ना आसान होता है, किंतु अपने ही घर में यदि दुश्मनों के प्रतिनिधि बैठे हों, तो उनसे लड़ना सरल नहीं होता। आज देश ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है। देश को अस्थिर करने हेतु षड्यंत्रकारी शक्तियां अपनेअपने मोहरों के साथ सड़कों पर हैं, जो नाम बदलबदल कर देश की युवा पीढ़ी को भ्रमित करने और उकसाकर राष्ट्र को क्षति पहुंचाने में जुटी हैं। समृद्धि की राह पर अग्रसर भारत इन्हें रास नहीं आ रहा है। सड़क से लेकर संसद तक नकारात्मक दृष्टिकोण राष्ट्र को पीछे धकेलने का प्रयास कर रहा है। जनता द्वारा नकारे गए राजनीतिक दल अपनी खोई हुई धरती तलाशने के लिए लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तारतार कर रहे हैं। ऐसे में आवश्यक है कि स्वाधीनता दिवस को मंथन दिवस मानकर विश्लेषण किया जाए कि भारत ने विगत उन्यासी सालों में कितनी प्रगति की तथा किन मोर्चों पर भारत फेल हुआ। केवल पक्ष और विपक्ष की लड़ाई में भारत किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं होना चाहिए। सरकारें आएंगी जाएंगी, लेकिन राष्ट्र सुधारों में कोई विलंब नहीं होना चाहिए। समान नागरिक संहिता, आरक्षण विहीन सामाजिक व शैक्षिक व्यवस्था, कठोर जनसंख्या नियंत्रण नीति आज की प्राथमिकताओं में सर्वोपरि होनी चाहिए, ताकि स्वतंत्र भारत वास्तव में स्वस्थ लोकतंत्र का प्रहरी बना रहे। देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप राष्ट्र निर्माण को चुनौती के रूप में स्वीकार करके आगे बढ़ना प्रत्येक भारतीय का दायित्व है।
सुधाकर आशावादी, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, मेरठ



