
हिंदू धर्म में गणेश जी की पूजा सबसे पहले की जाती है. कोई भी शुभ काम हो, बप्पा का नाम लिए बिना शुरू ही नहीं होता है. भादों महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को दूर्वा गणपति चतुर्थी के तौर पर मनाया जाता है.
इस दिन गणेश जी को दूर्वा यानी हरी घास चढ़ाने का बहुत बड़ा महत्व है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बप्पा को दूर्वा इतनी पसंद क्यों है? और इस दिन को दूर्वा चतुर्थी क्यों कहते हैं? इसके पीछे एक बड़ी पुरानी और दिलचस्प पौराणिक कहानी है. जिसके बारे में आज हम डिटेल से जानेंगे.
जब अनलासुर नाम के राक्षस का खौफ फैल गया
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, बहुत पहले अनलासुर नाम का एक बेहद खूंखार राक्षस हुआ करता था. उसकी आंखों से हर वक्त आग की भयंकर लपटें निकलती रहती थीं.
वो अपनी इसी आग से साधु-संतों और आम लोगों को जिंदा निगल जाता था. उसकी इस दहशत से तीनों लोकों में डर का माहौल बन गया था.
जब उसका अत्याचार हद से ज्यादा बढ़ गया, तो परेशान होकर सारे देवी-देवता और ऋषि-मुनि अपनी जान बचाने के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे.
गणेश जी ने ऐसे किया राक्षस का खात्मा
भगवान शिव ने सब देवताओं की बातें सुनीं और उन्हें बताया कि इस राक्षस का खात्मा सिर्फ गणेश जी ही कर सकते हैं. इसके बाद सबने गणेश जी से प्रार्थना की. देवताओं की बात सुनकर बाल गणेश अनलासुर से मुकाबला करने पहुंच गए.
लड़ाई के दौरान जब अनलासुर ने गणेश जी पर आग बरसाना शुरू किया, तो बप्पा ने एक पल भी गंवाए बिना उस पूरे राक्षस को उठाकर सीधा निगल लिया. राक्षस तो खत्म हो गया, पर असली परेशानी इसके बाद शुरू हुई.
जब बप्पा के पेट में उठने लगी भयंकर जलन
राक्षस को निगलने के बाद उसके शरीर की आग की वजह से गणेश जी के पेट में बहुत तेज जलन होने लगी. उनका पूरा शरीर तपने लगा. बप्पा की जलन शांत करने के लिए इंद्र देव ने उन पर चंद्रमा की ठंडी किरणें डालीं.
भगवान शिव ने अपने गले का ठंडा नाग बप्पा के पेट पर लपेट दिया. लेकिन किसी भी चीज से बप्पा के पेट की वो जलन कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी. बप्पा को तकलीफ में देखकर सारे देवी-देवता घबरा गए.
कश्यप ऋषि का वो एक साधारण सा नुस्खा
गणेश जी की यह हालत देखकर महर्षि कश्यप आगे आए. उन्होंने एक आसान सा नुस्खा आजमाया. कश्यप ऋषि ने दूर्वा यानी दूब घास की 21 गांठें बनाईं और गणेश जी को खाने के लिए दे दीं.
जैसे ही गणेश जी ने वो दूर्वा खाई, उनके पेट की जलन चुटकियों में गायब हो गई और उन्हें बहुत राहत मिली. बप्पा का शरीर एकदम ठंडा हो गया. बस उसी दिन से गणेश जी को दूर्वा चढ़ाने और दूर्वा चतुर्थी मनाने का रिवाज बन गया.
दूर्वा चढ़ाने का असली महत्व और फायदा
दूर्वा तासीर में ठंडी होती है और इसमें कई तरह की बीमारियों को ठीक करने के गुण होते हैं. इसी वजह से गणेश जी की पूजा में दूर्वा का होना सबसे जरूरी माना जाता है. दूर्वा चतुर्थी के दिन बप्पा को दूर्वा की 21 गांठें चढ़ाने से हर इच्छा पूरी होती है.
मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे दिल से बप्पा को दूर्वा चढ़ाता है, उसके जीवन की सारी दिक्कतें खत्म हो जाती हैं. घर में सुख-शांति आती है और काम-धंधे में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होती है.
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं पौराणिक कथाओं, धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं पर आधारित हैं. इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार का अंधविश्वास फैलाना नहीं है. पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल धार्मिक और सांस्कृतिक जानकारी के रूप में लें. किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या पूजा विधि के लिए विशेषज्ञ या पंडित से सलाह ले सकते हैं.



