राजनीति से हटकर भी उन्हें याद करने की वजहें हैं. महज 40 वर्ष की उम्र में वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे. 20वीं सदी के आखिरी दौर में उन्होंने 21वीं सदी के भारत के विषय में सोचा. उसके लिए देश को तकनीक से सम्पन्नसमृद्ध करने के फैसले लिए और कदम बढ़ाए. ये उस सफर की शुरुआत थी जिसने आज की GenZ पीढ़ी को अपना वर्तमान संवारने का अवसर दिया. देश के चुनावी इतिहास में लोकसभा की सबसे ज्यादा 414 सीटें जीतने का रिकॉर्ड बनाने वाले राजीव गांधी के कार्यकाल के आखिरी वर्ष आरोपोंविवादों के धुंध के बीच गुजरे. लेकिन उनके कई फैसलों ने देश को नई दिशा भी दी.
उन्होंने ऐसे दौर में देश का नेतृत्व किया जिसमें परंपरागत राजनीतिक ढांचा और प्रशासनिक सुस्ती की जड़ता थी. दूसरी तरफ बदलती हुई दुनिया की चुनौतियां थीं. कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार और नई तकनीक उस समय के भारत की जिंदगी का हिस्सा नहीं थे. नौकरियां जाने का जो डर आज ए आई को लेकर है, वही तब कम्प्यूटर को लेकर था. पर इस आशंका में राजीव रुके नहीं थे. जन्मदिन के मौके पर पढ़िए राजीव गांधी के योगदान से जुड़े कुछ प्रसंग.
18 वर्ष की उम्र में दिया मताधिकार
राजीव गांधी ने जिस विकसित भारत का सपना देखा उसमें युवाओं की निर्णायक भूमिका स्वीकार की. इसके लिए युवा शक्ति को अवसर दिया जाना जरूरी था. राजीव ने खुद को भाषणों और वायदों तक सीमित नहीं रखा. लोकतंत्र में किसी नागरिक की सबसे बड़ी शक्ति उसके मताधिकार में निहित होती है. यह अधिकार नागरिक को ऐसी सरकार चुनने के लिए सक्षम बनाता है जो उसकी आकांक्षाओं को सच में बदल सके.
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को बॉम्बे में हुआ था. फोटो: Getty Images
भारत और पासपड़ोस के देशों में इन दिनों जेनजेड पीढ़ी सरकारों को अपनी जायज मांगों के लिए नतमस्तक होने के लिए विवश कर रही है. उसे यह शक्ति प्रदान करने में राजीव गांधी की बड़ी भूमिका थी. यह राजीव गांधी थे, जिन्होंने मतदान की उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष करने का संवैधानिक परिवर्तन कराया और उसके जरिए देश की बड़ी युवा आबादी को बालिग होते ही औपचारिक तौर से लोकतांत्रिक भागीदारी का अधिकार प्राप्त हुआ.
बदलती दुनिया की चुनौतियों को किया स्वीकार
देश के शिखर राजनीतिक परिवार में जन्मे राजीव गांधी के जीवन की प्राथमिकताओं में राजनीति नहीं थी. हवाई दुर्घटना में छोटे भाई संजय गांधी की दुःखद मृत्यु के बाद की परिस्थितियों ने राजनीति में उन्हें सक्रिय किया. मां इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा निर्मम हत्या बाद प्रधानमंत्री पद उनके हिस्से में आया. लेकिन 1984 के बड़े जनादेश के साथ देश का नेतृत्व कर रहे राजीव गांधी ने इस सच को बखूबी समझा कि बदलती दुनिया के साथ चलने और देश को विकसित करने के लिए सूचनासंचार तकनीक की दौड़ में शामिल होना जरूरी है.
अस्सी के दशक के भारत में कम्प्यूटर दुर्लभ और महंगे थे. उनकी उपलब्धता और उसके विषय में जानकारी आमतौर पर महानगरों में निवास करने वाले मुट्ठी भर लोगों तक सीमित थी. लैंडलाइन फोन के कनेक्शन के लिए मंत्रियोंसांसदों की सिफारिशें भी काम नहीं आती थीं. सूचना की गति आज की तुलना में बेहद धीमी थी. राजीव गांधी ने इसी परिस्थिति में इलेक्ट्रॉनिक्स और कंप्यूटर को भविष्य के भारत की जरूरत के रूप में देखा.
1984 में Centre for Development of Telematics यानी CDOT की स्थापना हुई. इसका उद्देश्य स्वदेशी दूरसंचार तकनीक विकसित करना था और बाद में इसी संस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए डिजिटल टेलीफोन एक्सचेंज विकसित किए.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
आज एआई को लेकर आशंकाएं, तब कम्प्यूटर पर थे सवाल
आज जब सूचनासंचार के क्षेत्र में भारत दुनिया के देशों की अगली कतार में है, तब आठवें दशक में राजीव गांधी की सरकार के फैसले तत्कालीन परिस्थितियों में यह क्रांतिकारी प्रयास थे. किसी विकासशील देश के लिए यह तय करना कि वह केवल विकसित देशों की तकनीक खरीदेगा या अपनी तकनीकी क्षमता भी विकसित करेगा, यह मूलभूत नीति का प्रश्न था.
राजीव गांधी के दौर में तकनीक को केवल मशीन नहीं, राष्ट्रीय क्षमता के रूप में देखने की शुरुआत हुई. राजीव गांधी के समय कंप्यूटर को लेकर जबरदस्त आशंकाएं थीं. नौकरियों की आज भी किल्लत है. हालात तब भी ऐसे ही खराब थे. सरकारीसार्वजनिक और निजी उपक्रमों में कंप्यूटर की आमद के साथ एक ही चिंता थी, यह नौकरियां खा जायेगा. आज जो आशंकाएं AI को लेकर है, वैसी ही कंप्यूटर से थीं. इनके प्रवेश के साथ ही ट्रेड यूनियनें आंदोलित हुईं. अनेक स्तरों पर विरोध हुआ. लेकिन राजीव रुके नहीं.
बतौर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कंप्यूटर शिक्षा को महत्व दिया गया.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कंप्यूटर शिक्षा को दिया महत्व
राजीव गांधी ने इस मसले में आशंकाओं को खारिज किया और विरोध की परवाह किए बिना आगे बढ़े. उन्होंने तकनीक के प्रसार से डरने और रोकने की जगह देश की नई पीढ़ी को उसमें दक्ष करने की कोशिश की. 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कंप्यूटर शिक्षा को महत्व दिया गया. उसमें साफ कहा गया कि कंप्यूटर साक्षरता बच्चों को बदलती तकनीकी दुनिया के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण होगी और कंप्यूटर शिक्षा को धीरेधीरे स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए.
आज Gen Z के लिए डिजिटल साक्षरता कोई अलग विषय नहीं है. उस पीढ़ी का जीवन ही डिजिटल है.राजीव गांधी के समय कंप्यूटर एक उपकरण था. आज की नई पीढ़ी के लिए तकनीक साधन नहीं बल्कि वातावरण है. एक स्मार्टफोन में बैंक, बाजार, पुस्तकालय, कैमरा, टेलीविजन, अखबार, डाकघर, टिकटघर और दुनिया भर से संवाद करने की सुविधा मौजूद है. इस परिवर्तन को केवल तकनीकी क्रांति कहना पर्याप्त नहीं होगा. यह परिवर्तन जीवनपद्धति में क्रांति लाया है. इस मुकाम पर राजीव गांधी की स्मृति वर्तमान से जुड़ती है.
सोनिया गांधी और राजीव गांधी. फोटो: Getty Images
रुपए में पच्चासी पैसे की लूट को किया बेपर्दा
राजीव गांधी के 1985 के कालाहांडी के उस भाषण को जबतब दोहराया जाता है कि दिल्ली से गरीब के लिए भेजे गए एक रुपये में केवल 15 पैसे ही उसके पास पहुंचते हैं. असलियत में राजीव गांधी भ्रष्टाचार को लेकर चिंता जाहिर करने के साथ ही सरकारी व्यवस्था और लाभार्थी के मध्य बिचौलियों की लंबी चेन की आवश्यकता पर सवाल कर रहे थे. हर रुपए पीछे पच्चासी पैसे की लूट को राजीव राजनीतिक और प्रशासनिक विमर्श के केंद्र में लाए. यह सोच अगली सरकारों को इस दिशा में समाधान के रास्ते खोजने के लिए प्रेरित करती रही.
जनवरी 2013 में यूपीए शासन में पायलट के तौर पर डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर की शुरुआत हुई. मोदी सरकार ने जनधन खातों के माध्यम से इसे व्यापक विस्तार दिया. राजीव की एक रुपए में पंद्रह पैसे गरीब के पास पहुंचने की स्वीकारोक्ति को विपक्षी भले राजनीतिक नजरिए से भ्रष्टाचार रोकने की उनकी विफलता के तौर पर परिभाषित कर सकते हैं लेकिन असलियत में उन्होंने उस नासूर को बेपर्दा करने का साहस किया था जो लंबे समय में पनपा था और जिसके निपटने की कोशिशें आज भी हर सरकार के एजेंडे में शामिल रहती है.
ग्राम पंचायतों के सशक्तिकरण के प्रयास
राजीव गांधी ने एक दूसरा बड़ा प्रयोग ग्राम पंचायतों के सशक्तिकरण का किया. संविधान निर्माताओं की उस सोच के अनुरूप उनका विचार था कि सिर्फ संसद और विधानसभाओं तक सत्ता केंद्रित नहीं होनी चाहिए. लोकतंत्र की जड़ें गांव तक मजबूत होनी चाहिए. 1989 में उन्होंने संविधान के 64वें संशोधन विधेयक के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने की कोशिश की. लोकसभा में अपने भाषण में उन्होंने इसे लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुंचाने का प्रयास बताया. यह विधेयक लोकसभा से पारित हुआ, लेकिन राज्यसभा में आवश्यक बहुमत नहीं जुट सका. बाद में नरसिंह राव सरकार के समय यही विचार संशोधित रूप में 73वें संविधान संशोधन के रूप में आया और 1992 में पारित होकर 1993 में लागू हुआ. इसके जरिए पंचायतों को संवैधानिक आधार मिला. ग्राम सभा की भूमिका बनी. हर पांच वर्ष पर चुनाव की व्यवस्था हुई. राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य वित्त आयोग जैसे संस्थागत प्रावधान आए तथा पंचायतों के लिए 29 विषयों का ढांचा तैयार हुआ.
बेशक राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते यह कानून नहीं बन पाया था, लेकिन उसकी वैचारिक और विधायी जमीन राजीव गांधी ने तैयार की थी. हालांकि इसका श्रेय अकेले कांग्रेस या राजीव गांधी को देना उचित नहीं होगा. पंचायती राज पर अशोक मेहता समिति, जी.के.वी. राव समिति, पी.के. थुंगन समिति आदि की सिफारिशों पर मंथन की लंबी प्रक्रिया अरसे से विचाराधीन थी. लेकिन राजीव गांधी ने इसे संविधान के केंद्र में लाने का निर्णायक राजनीतिक प्रयास किया.
महिलाओं की भागीदारी का रखा ख़्याल
ग्राम पंचायतों को शक्तिशाली करने के प्रयासों के समय उसमें महिलाओं की भागीदारी का उन्हें पूरा ख्याल था. राजीव गांधी सरकार के 1989 के 64वें संशोधन विधेयक में पंचायतों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव था. संसद में अपने भाषण में राजीव ने इसके तीन कारण गिनाए, महिलाओं की बड़ी जनसंख्या और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका, घरेलू वित्तीय अनुशासन का अनुभव और सामाजिकसांस्कृतिक जिम्मेदारियों में उनकी केंद्रीय भूमिका.
उनका तर्क था कि पंचायतों में महिलाओं की बड़ी भागीदारी उन्हें अधिक प्रतिनिधिक, जिम्मेदार और उत्तरदायी बना सकती है. राव सरकार के समय 73वें संशोधन में यह व्यवस्था कमसेकम एकतिहाई सीटों और अध्यक्ष पद पर महिलाओं के आरक्षण के रूप में संविधान का हिस्सा बनी. आज 21 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों में पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है.
अप्रैल 2026 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश की पंचायती राज संस्थाओं में लगभग 24.04 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों में 49.75 प्रतिशत महिलाएं हैं. बेशक आज का डिजिटल भारत राजीव गांधी के समय से बहुत आगे निकल चुका है, लेकिन इसकी उपलब्धियों के जिक्र के समय इस दिशा में उनकी पहल जरूर याद की जाती है. वे इसलिए भी याद किए जाते हैं कि पिछली सदी के आठवें दशक में उन्होंने सवाल किए थे, सरकारी पैसा आखिरी आदमी तक क्यों नहीं पहुंचता और लोकतंत्र की ताकत आखिरी गांव तक क्यों नहीं पहुंचती? निदान की उन्होंने कोशिशें कीं और उनके जाने के साढ़े चार दशकों बाद की सरकारों के समय में भी माकूल नतीजों के प्रयत्न जारी हैं.



