
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कुछ समय पहले भिखारियों को लेकर किए गए एक सर्वे के दौरान ऐसे आंकड़े सामने आए थे, जिन्होंने लोगों को हैरान कर दिया था। सर्वे में शहर के हजारों भिखारियों की स्थिति और उनकी आय से जुड़ी जानकारी जुटाई गई थी।
बताया गया था कि सर्वे का उद्देश्य भिक्षावृत्ति करने वाले लोगों की पहचान करना और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के साथ उनकी वास्तविक स्थिति का पता लगाना था। इस दौरान शहर के अलग-अलग इलाकों में बड़ी संख्या में लोगों से जानकारी जुटाई गई थी।
सर्वे में सामने आया था कि भीख मांगने वाले सभी लोग आर्थिक रूप से बेहद कमजोर नहीं थे। कुछ लोग नियमित तौर पर भीख मांगते थे और उनकी रोजाना की कमाई भी अच्छी खासी बताई गई थी। कुछ मामलों में यह रकम नौकरीपेशा लोगों की मासिक आय के बराबर या उससे अधिक होने का दावा किया गया था।
महिलाओं की कमाई को लेकर भी चौंकाने वाली जानकारी सामने आई थी। खास तौर पर छोटे बच्चों के साथ या गर्भवती महिलाओं द्वारा भीख मांगने पर लोगों की ओर से अधिक मदद मिलने की बात कही गई थी। कुछ मामलों में महिलाओं की रोजाना कमाई हजारों रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया था।
सर्वे के दौरान यह भी सामने आया था कि कुछ लोगों के पास मोबाइल फोन और पहचान से जुड़े दस्तावेज मौजूद थे। इससे यह सवाल भी उठा था कि शहर में भीख मांगने का काम कितने लोगों के लिए मजबूरी था और कितने लोग इसे नियमित कमाई के साधन के रूप में कर रहे थे।
लखनऊ के व्यस्त इलाकों में भीख मांगने वालों की संख्या अधिक होने की बात सामने आई थी। खासकर रेलवे स्टेशन और प्रमुख बाजारों के आसपास रोजाना बड़ी संख्या में लोग भीख मांगते दिखाई देते थे। ऐसे स्थानों पर लोगों की आवाजाही अधिक होने के कारण कमाई भी अपेक्षाकृत ज्यादा होने का दावा किया गया था।
हालांकि, इन आंकड़ों को किसी व्यक्ति की वास्तविक और स्थायी आय मानना उचित नहीं होगा। भीख मांगने वालों की आमदनी स्थान, दिन और परिस्थितियों के हिसाब से काफी बदल सकती है। सर्वे में सामने आए आंकड़ों के आधार पर ही उनकी आर्थिक स्थिति का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।



