उत्तर प्रदेश में किराए के मकान में रहने वाले लाखों किराएदारों के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किराएदारी विनियमन अधिनियम, 2021 की कई अहम धाराओं को रद्द कर दिया है. कोर्ट के मुताबिक, इन प्रावधानों का टकराव केंद्रीय कानूनों से हो रहा था और इन्हें लागू करने से पहले जरूरी संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी भी नहीं ली गई थी.

यह फैसला इंदर भूषण साहनी बनाम कंचन कुमारी जैन और 2 अन्य मामले में आया है. हाई कोर्ट ने इस मामले में रेंट बढ़ाने, किराएदारों की बेदखली और विवादों के निपटारे से जुड़े कई प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं. लेकिन इस फैसले का किराएदारों और मकान मालिकों पर क्या असर पड़ेगा? कोर्ट ने किन धाराओं को रद्द किया है और अब रेंट बढ़ाने या किराएदार को मकान से निकालने के मामलों में कौन से नियम लागू होंगे? आइए आसान भाषा में समझते हैं पूरा मामला क्या है.
किन धाराओं पर लगी रोक
जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस स्वरूपामा चतुर्वेदी की डिवीजन बेंच ने 21 अगस्त को सुनाए फैसले में अधिनियम की धारा 8, 9, 10, 38 और 42 को असंवैधानिक करार दिया. बेंच के मुताबिक धारा 8, 9 और 10, जो रेंट तय करने और उसमें बदलाव से जुड़ी हैं, ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 के प्रावधानों से टकराती हैं. कोर्ट ने कहा कि धारा 8 के तहत रेंट में बदलाव की व्यवस्था किराएदारी एग्रीमेंट से अलग जाकर तय दरों पर रेंट बढ़ाने की छूट देती थी. वहीं धारा 10 में मकान मालिक और किराएदार के बीच विवाद होने पर बदला हुआ रेंट तय करने का अधिकार दिया गया था. कोर्ट ने इसे केंद्रीय कानून की भावना के खिलाफ माना.
इसी तरह धारा 38 और 42 को लेकर कोर्ट ने कहा कि ये प्रावधान प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम और यूपी सिविल कानून अधिनियम के तहत तय प्रक्रिया को हटाकर अलग व्यवस्था बनाने की कोशिश करते थे. इन धाराओं में रेंट अथॉरिटी के जरिए विवाद निपटाने और रेंट ट्रिब्यूनल बनाने का प्रावधान था, जो पहले से लागू कानूनों से टकराता था.
संविधान के अनुच्छेद 254 का मामला
दरअसल, पूरा विवाद संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची से जुड़ा है. इसमें ऐसे विषय शामिल हैं, जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं. लेकिन अगर राज्य का कानून केंद्र के कानून से टकराता है, तो उसे खास संवैधानिक प्रक्रिया से मंजूरी लेनी होती है. किरायाकिराएदारी का विषय भी इसी सूची में आता है और इस पर संसद पहले से कानून बना चुकी है. इसलिए यूपी सरकार को अपने 2021 के कानून को वैध बनाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी लेनी जरूरी थी. कोर्ट ने पाया कि राज्य विधानसभा ने ऐसी मंजूरी नहीं ली थी. इसी वजह से संबंधित धाराओं को असंवैधानिक माना गया.
बेदखली से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल
फैसले में कोर्ट ने यह भी माना कि यूपी के कानून में मकान मालिक को उन आधारों पर भी किराएदार को निकालने की छूट दी गई थी, जो शुरुआत में दोनों पक्षों के बीच हुए एग्रीमेंट का हिस्सा नहीं थे. समय पर रेंट न देना, मरम्मत या दोबारा निर्माण की जरूरत, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव के बाद फिर से निर्माण, नोटिस के बाद भी मकान खाली न करना, मकान मालिक की अनुमति के बिना बदलाव करना या सामान का बड़ा हिस्सा हटा लेना जैसे कई आधारों पर किराएदार को निकालने की कार्रवाई हो सकती थी, भले ही लीज डीड में इनका जिक्र न हो.
इसके अलावा मृत मकान मालिक के कानूनी वारिसों को भी अपनी जरूरत के आधार पर मौजूदा किराएदार को निकालने का अधिकार दिया गया था. मकान खाली न करने पर जुर्माने जैसा बढ़ा हुआ रेंट वसूलने का प्रावधान भी था. कोर्ट ने इन सभी प्रावधानों को ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट के चैप्टर V के तहत तय मकान मालिक और किराएदार के अधिकारों से टकराने वाला माना.
पहले से पूरे मामलों पर नहीं पड़ेगा असर
राहत की बात यह है कि हाई कोर्ट ने इस फैसले को पूरी तरह पिछली तारीख से लागू नहीं किया है. जिन मामलों की कार्रवाई 2021 के कानून के तहत पहले ही पूरी हो चुकी है और जहां इन प्रावधानों की वैधता को चुनौती नहीं दी गई थी, उन्हें सुरक्षित रखा गया है. साथ ही इस कानून के तहत पहले से किए गए रेंट एग्रीमेंट और रेंट में किए गए बदलाव भी बरकरार रहेंगे. यानी फैसला मुख्य रूप से आगे की कार्रवाई पर असर डालेगा, पुराने और पूरी तरह निपट चुके मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा.
किसने रखा पक्ष
इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट शशि नंदन ने दलीलें रखीं, जबकि राज्य सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल राहुल अग्रवाल ने पक्ष रखा. इसके अलावा सीनियर एडवोकेट आशीष कुमार सिंह और एडवोकेट सुदीप हरकौली ने भी मामले में प्रतिनिधित्व किया. कुल मिलाकर, इस फैसले से यूपी के किराएदारों को मनमाने तरीके से रेंट बढ़ाए जाने और बेदखली की कार्रवाई से राहत मिल सकती है. अब इन मामलों में ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट जैसे केंद्रीय कानूनों की भूमिका अहम होगी.



