क्वालिटी, लग्जरी, क्लास प्रोडक्ट्स के बाद आजकल बाजार में ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स का जोर है. कोशिश ग्राहक को यकीन दिलाने की है कि गेहूं है तो सीधा खेत से आया है, आटा सीधे चक्की से और गुड़ सीधे कोल्हू से. कस्टमर के सामने बस गल्ले की कसम खाने की कसर रह गई है. दरअलस, सुबह के ब्रश से लेकर रात के रूम फ्रेशनर तक, हमारी जिंदगी की हर चीज के साथ एक सवाल जुड़ा है असली क्या है, सुरक्षित क्या है और दावा कितना सही है? क्योंकि मिलावट सिर्फ चीजों में नहीं होती. कभीकभी मिलावट हमारे भरोसे में भी होती है. मिलावट का ये मकड़जाल सिर्फ एक घर या एक बाजार की कहानी नहीं, पूरे देश की चिंता है.

प्रोडक्ट्स की ब्रांडिंग और उन्हें अलगअलग तरीकों से लोगों के सामने पेश किया जाता है. भरोसा जताकर ऐसा सामान थोप दिया जाता है जिसकी क्वालिटी बेहद खराब तक होती है. बेंगलुरु हो या मुंबई.. एफडीए की छापेमारी भी इसका सबूत है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर देश में चल क्या रहा है?
और ये सब हुआ क्यों?
क्योंकि आपके टूथपेस्ट में नमकचीनीकोयला है पूछकर और ग्राहक को अपनी बगल झांकने पर मजबूर करने वाली कंपनियों के बीच कब टूथपेस्ट में कैल्शियम कार्बोनेट, फ्लोराइड और दूसरे इनग्रीडिएंट्स की लंबीचौड़ी लिस्ट आम हो गई, आपको पता ही नहीं चला. नहाने के लिए साबुन उठाया तो सवाल सिर्फ ये नहीं कि खुशबू कैसी है या झाग कितना है सवाल ये भी है कि उसमें इस्तेमाल इनग्रीडिएंट्स क्या हैं और क्या वे तय मानकों के मुताबिक हैं?
यानी सुबह से शाम तक एक आम आदमी का दिन बिना मिलावट, गलत लेबलिंग, घटिया क्वालिटी या खाद्य सुरक्षा के सवालों से गुजरे ये आसान नहीं. यही वजह है कि मिलावट सिर्फ खबर नहीं, मिलावट के खिलाफ कार्रवाई भी खबर बनती है. शबरी ने तो श्रीराम को बेर खिलाने की मंशा में बेर चखे थे. लेकिन कलयुग ऐसा कि खबरें ऐसी भी आती हैं, जहां मिठाई बनाने वाला ही अपनी मिठाई खाने से इनकार कर देता है. देखिए, कितना गहरा फंसे हैं हम मिलावट के इस मकड़जाल में.
टूथपेस्ट के बाद साबुन और शैम्पू की बारी इनमें सिंथेटिक डिटर्जेंट, फ्रेगरेंस, सल्फेट्स, प्रिजर्वेटिव्स और दूसरे केमिकल्स हो सकते हैं. कुछ प्रोडक्ट्स में जानवरों से प्राप्त इनग्रीडिएंट्स भी होते हैं. यहां भी सवाल इनग्रीडिएंट के होने से ज्यादा उसकी सही जानकारी, मात्रा और मानकों के पालन का है.
अब किचन की ओर बढ़िए
आटे में चोकर होना स्वाभाविक है, लेकिन सस्ता पदार्थ मिलाकर वजन बढ़ाना या गलत लेबलिंग करना मिलावट की श्रेणी में आ सकता है. अब दूध की बारी. पानी, स्टार्च, डिटर्जेंट या यूरिया जैसी चीजों से दूध में मिलावट के मामले सामने आते रहे हैं. पनीर और खोया भी जांच के दायरे में रहते हैं. पैक्ड ड्रिंक उठाते समय भी सिर्फ 100 प्रतिशत नेचुरल या फ्रूट देखकर भरोसा मत कीजिए. लेबल पढ़िए—फ्रूट कंटेंट कितना है, एडेड शुगर है या नहीं और कौनकौन से एडिटिव्स इस्तेमाल हुए हैं.
मसालों की दुनिया
अब रसोई के उस हिस्से में पहुंचिए, जहां रंग और स्वाद का खेल है. हल्दी, लाल मिर्च और दूसरे मसालों में रंग या सस्ते पदार्थ मिलाने के मामले सामने आते रहे हैं. पिसे हुए मसालों में मिलावट पहचानना मुश्किल भी है, क्योंकि पैकेट खोलकर उनकी असलियत हर बार आंख से नहीं पकड़ी जा सकती. काली मिर्च में पपीते के सूखे बीज जैसी मिलावट भी जांच में पकड़ी जाती है.
और कुकिंग ऑयल?
महंगे एडिबल ऑयल में सस्ता ऑयल मिलाना गंभीर खाद्य सुरक्षा का मामला है. खासकर आर्गेमोन ऑयल जैसी मिलावट स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकती है. शहद में शुगर सिरप जैसी मिलावट और चायपत्ती में आर्टिफिशियल कलरिंग की शिकायतें भी सामने आती रही हैं. यानी जिस खाने को हम सेहत के लिए खरीद रहे हैं, वहां सवाल सिर्फ स्वाद का नहीं सोर्स और क्वालिटी का भी है.
ऑनलाइन खाना भी मिलावटी?
आपने सोचा ओह माय गॉड! सब इतना संदिग्ध है तो चलो खाना ऑनलाइन ऑर्डर कर लेते हैं. लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है. फूड डिलीवरी में खराब हाइजीन, गलत स्टोरेज, बासी खाना, गलत लेबलिंग और फूडसेफ्टी के उल्लंघन की शिकायतें सामने आती रही हैं. कुछ मामलों में बिना जरूरी लाइसेंस या नियमों के खिलाफ चल रहे फूड बिजनेस पर कार्रवाई भी होती है. यानी ऐप पर रेस्टोरेंट दिख रहा है, इसका मतलब अपनेआप फूड सेफ्टी की गारंटी नहीं है.
दिनभर की भागदौड़ के बाद आपने सोचा कमरे में थोड़ी खुशबू कर लेते हैं.
रूम फ्रेशनर, डिफ्यूजर या फ्रेगरेंस ऑयल इस्तेमाल किया. कई फ्रेगरेंस प्रोडक्ट्स में सिंथेटिक कंपाउंड्स और वीओसी यानी वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स हो सकते हैं. तेज फ्रेगरेंस कुछ लोगों में इरिटेशन, सिरदर्द या सांस संबंधी परेशानी पैदा कर सकती है. इसलिए हर केमिकल को जहर कहना सही नहीं, लेकिन प्रोडक्ट लेबल और वेंटिलेशन को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं.
महाराष्ट्र के तुकाराम की कार्रवाई
महाराष्ट्र में तुकाराम मुंढे जैसे अफसर जब मिलावट के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, तो सवाल सिर्फ एक दुकानदार का नहीं, पूरे सिस्टम का उठता है. क्योंकि मिलावट रोकना सिर्फ छापेमारी या जुर्माने की बात नहीं, लोगों के भरोसे और सेहत की हिफाजत का सवाल है. पूरे देश में जरूरत ऐसे सिस्टम की है जो मिलावट के खिलाफ कार्रवाई करें और ऐसे ग्राहकों की भी, जो सवाल पूछें. क्योंकि मिलावट तभी खत्म होगी, जब मुनाफे से ऊपर ईमानदारी और चुप्पी से ऊपर सवाल होंगे.



