उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर समाजवादी पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी रणनीति को नए सिरे से तैयार करना शुरू कर दिया है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की नजर इस बार सिर्फ जाटमुस्लिम समीकरण पर नहीं, बल्कि मुस्लिमदलितगुर्जर वोटों की नई सोशल इंजीनियरिंग पर है. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी का बीजेपी के साथ जाना माना जा रहा है.

पश्चिमी यूपी में जाट वोट लंबे समय तक आरएलडी के साथ खड़े रहे हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और आरएलडी के गठबंधन ने इसी जाटमुस्लिम समीकरण को साधने की कोशिश की थी और कई इलाकों में इसका असर भी दिखाई दिया. लेकिन अब जयंत चौधरी एनडीए के साथ हैं. ऐसे में सपा के सामने पश्चिमी यूपी में जाट वोटों के पुराने समीकरण को दोहराने की चुनौती है. अखिलेश यादव के पास बड़े जाट नेताओं में सिर्फ एक हर एक मालिक ही है जो सांसद है.
जाट की जगह गुर्जर पर बड़ा दांव
अखिलेश यादव अब जाट वोटों की संभावित कमी की भरपाई के लिए गुर्जर समाज पर फोकस बढ़ा रहे हैं. सपा ने पश्चिमी यूपी में गुर्जर समुदाय तक पहुंच बनाने की रणनीति काम कर रही है. पार्टी 34 जिलों की 132 है. खास तौर पर उन सीटों पर फोकस किया जा रहा है, जहां गुर्जर मतदाताओं की संख्या प्रभावी है. यानी अखिलेश की रणनीति साफ दिखाई देती है जाट का विकल्प जाट नहीं, बल्कि गुर्जर वोट बैंक में तलाशना है.
दलित वोटों को जोड़ने की कोशिश
गुर्जर के साथ अखिलेश यादव की नजर दलित वोटों पर भी है. सपा की 2024 लोकसभा चुनाव में पीडीए रणनीति के तहत गैरयादव ओबीसी और दलित वोटों को जोड़ने की कोशिश कामयाब रही थी. अब इसी प्रयोग को पश्चिमी यूपी में आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है.
पश्चिमी यूपी में दलित और मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी आबादी है. ऐसे में सपा यदि गुर्जर वोटों के साथ इन दोनों सामाजिक समूहों को अपने पक्ष में लामबंद करने में सफल होती है तो पार्टी के लिए कई सीटों पर मुकाबला बदलने की स्थिति बन सकती है. पश्चिमी यूपी में 26 जिलों की 136 विधानसभा सीटों को चुनावी रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है.
मुस्लिमयादव को कोर वोट मानकर आगे बढ़ रहे अखिलेश
सपा की रणनीति का तीसरा महत्वपूर्ण आधार मुस्लिम वोट है. पश्चिमी यूपी में कई जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं. 2022 में भी सपा और उसके सहयोगियों के साथ मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा गया था.
अखिलेश यादव की रणनीति में यादव वोट पार्टी का पारंपरिक आधार माना जाता है, जबकि मुस्लिम वोट को सपा का मजबूत समर्थन आधार माना जाता है. ऐसे में अब पार्टी की कोशिश इस आधार में दलित और गुर्जर वोटों को जोड़कर नया चुनावी गठजोड़ तैयार करने की है.
136 सीटों में 50 का आंकड़ा क्यों अहम?
पश्चिमी यूपी की 136 सीटें सपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहां बेहतर प्रदर्शन पार्टी को पूरे प्रदेश के सत्ता समीकरण में मजबूती दे सकता है. अगर मुस्लिमदलितगुर्जर समीकरण के साथ यादव वोट भी मजबूती से सपा के साथ आता है और पार्टी पश्चिमी यूपी में करीब 50 सीटें जीतने में सफल रहती है, तो यह 2027 की सत्ता की लड़ाई में अखिलेश यादव को मजबूत स्थिति में पहुंचा सकता है.
हालांकि सिर्फ वोटों का जोड़ चुनावी जीत की गारंटी नहीं है. इन समुदायों का वोट किस सीट पर कितना ट्रांसफर होता है, उम्मीदवार कौन होगा, स्थानीय समीकरण क्या होंगे और बीजेपीजाटआरएलडी गठजोड़ कितना प्रभावी रहता है इन सब पर नतीजे निर्भर करेंगे.
अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती
अखिलेश यादव के सामने चुनौती सिर्फ गुर्जरों और दलितों को जोड़ने की नहीं है, बल्कि इन समुदायों को संगठन और टिकट में पर्याप्त राजनीतिक हिस्सेदारी देने की भी है. सपा लंबे समय से पश्चिमी यूपी में किसी बड़े गुर्जर चेहरे की कमी महसूस कर रही है. पार्टी अब इस कमी को पूरा करने की दिशा में भी काम कर सकती है.
सपा ने गुर्जर समाज के बीच पहुंच बढ़ाने के लिए रणनीति भी बनाई है. इससे साफ है कि अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी को सिर्फ गठबंधन के भरोसे नहीं छोड़ना चाहते, बल्कि खुद सामाजिक समीकरण तैयार करने में जुटे हैं.
2027 में पश्चिमी यूपी बनेगा बड़ा रणक्षेत्र
कुल मिलाकर 2027 में पश्चिमी यूपी की लड़ाई सिर्फ बीजेपी बनाम सपा नहीं होगी, बल्कि यह जाट, गुर्जर, दलित, मुस्लिम और गैरयादव ओबीसी वोटों की सोशल इंजीनियरिंग की भी लड़ाई होगी. जयंत चौधरी के बीजेपी के साथ होने से सपा के सामने जाट वोटों का पुराना समीकरण कमजोर हुआ है. ऐसे में अखिलेश यादव अब मुस्लिम + यादव के पुराने आधार में दलित + गुर्जर को जोड़कर नया पीडीए प्लस फॉर्मूला तैयार करने की कोशिश में हैं.
अगर यह प्रयोग जमीन पर सफल रहा और चारों सामाजिक समूहों के वोट एकदूसरे में ट्रांसफर हुए, तो पश्चिमी यूपी की 136 सीटों में सपा का प्रदर्शन 2027 के पूरे यूपी चुनाव की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है. लेकिन अगर जाट वोट बड़े पैमाने पर बीजेपीआरएलडी के साथ मजबूती से बना रहा और दलितगुर्जर वोट सपा के पक्ष में पूरी तरह ट्रांसफर नहीं हुआ, तो अखिलेश की रणनीति को बड़ा झटका भी लग सकता है.



