Women Equality Day: 26 अगस्त को दुनियाभर में महिला समानता दिवस मनाया जाता है। 1920 में 26 अगस्त को ही अमेरिका ने महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया था। लेकिन दीया तले अंधेरा वाली कहावत अमेरिका पर सटीक बैठती है। जिस अमेरिका ने पूरी दुनिया को महिला समानता का पाठ पढ़ाया था, जिस देश ने महिला समानता के अधिकार को ऐतिहासिक उपलब्धि के तौर पर दर्ज किया, उसी अमेरिका में आज तक एक भी महिला राष्ट्रपति नहीं बन सकी।

1920 में वोट का अधिकार, 2026 में भी महिला राष्ट्रपति नहीं
अमेरिका में महिलाओं को वोट देने का संवैधानिक अधिकार 1920 में मिला था। लेकिन वोट देने का अधिकार मिल जाना और देश की सबसे बड़ी राजनीतिक कुर्सी तक पहुंचना..दो अलगअलग बातें हैं। 2024 में कमला हैरिस अमेरिका की प्रमुख पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार बनीं। वह इतिहास रचकर अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति बन सकती थीं, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप से चुनाव हार गईं। इसके साथ ही अमेरिका में पहली महिला राष्ट्रपति का इंतजार एक बार फिर जारी रहा।
यानी महिलाओं को वोट का संवैधानिक अधिकार मिले 106 साल हो चुके हैं, लेकिन 2026 तक अमेरिका के Oval Office में कोई महिला राष्ट्रपति के तौर पर नहीं बैठी है। 2016 में हिलेरी क्लिंटन और 2024 में कमला हैरिस इस ऐतिहासिक मुकाम के बेहद करीब पहुंचीं, लेकिन दोनों चुनाव जीत नहीं सकीं। खास बात यह है कि कमला हैरिस अमेरिका की पहली महिला उपराष्ट्रपति जरूर बनीं, लेकिन राष्ट्रपति पद की सबसे ऊंची राजनीतिक सीमा अब भी नहीं टूट पाई।
कहानी में आता है अफगानिस्तान
इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी विडंबना अमेरिका और अफगानिस्तान के इतिहास की तुलना में दिखाई देती है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, अफगानिस्तान में महिलाओं को 1919 में वोट देने का अधिकार मिला था। यानी अमेरिका से एक साल पहले। आज अफगानिस्तान महिलाओं के अधिकारों पर बेहद कड़े प्रतिबंधों के लिए जाना जाता है। लेकिन उसका इतिहास बताता है कि कभी वहां महिलाओं को अमेरिका से भी पहले मतदान का अधिकार हासिल था।
इस तुलना का मतलब अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति को सही ठहराना बिल्कुल नहीं है। बल्कि यह दिखाता है कि महिलाओं के अधिकारों का इतिहास हमेशा सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ता। कोई देश एक दौर में अधिकारों के मामले में आगे हो सकता है और दूसरे दौर में पीछे चला जा सकता है।
अमेरिका में 19वां संशोधन क्यों था बड़ा कदम?
अमेरिका में महिलाओं के मतदान अधिकार के लिए दशकों तक आंदोलन चला। 1848 का Seneca Falls Convention महिला अधिकार आंदोलन के महत्वपूर्ण पड़ावों में माना जाता है। इसके बाद प्रदर्शन, आंदोलन, लॉबिंग और राजनीतिक संघर्ष जारी रहे। आखिरकार 19th Amendment आया और महिलाओं को मतदान का संवैधानिक अधिकार मिला।
लेकिन यहां भी एक जरूरी बात समझना जरूरी है। 1920 में 19वां संशोधन पास होने के बावजूद हर अमेरिकी महिला के लिए राजनीतिक बराबरी तुरंत हासिल नहीं हुई। नस्लीय भेदभाव और अलगअलग राज्यों की पाबंदियों के कारण कई अश्वेत और अन्य महिलाओं को मतदान के अधिकार का वास्तविक इस्तेमाल करने में लंबे समय तक बाधाओं का सामना करना पड़ा। यानी 1920 की तारीख पूरी बराबरी की मंजिल नहीं थी, बल्कि एक लंबे संघर्ष का महत्वपूर्ण पड़ाव थी।
वोट से सत्ता तक का सफर अभी अधूरा
Women’s Equality Day सिर्फ महिलाओं को वोट का अधिकार मिलने की उपलब्धि को याद करने का दिन नहीं है। यह इस बात पर सोचने का मौका भी है कि क्या मतदान का अधिकार ही राजनीतिक बराबरी की पूरी परिभाषा है? अगर बराबरी का मतलब सत्ता में समान भागीदारी भी है, तो अमेरिका की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है।
दुनिया के सबसे प्रभावशाली लोकतंत्रों में गिने जाने वाले अमेरिका ने अब तक किसी महिला को राष्ट्रपति के पद तक नहीं पहुंचाया है। हिलेरी क्लिंटन और कमला हैरिस जैसी नेता इस मुकाम के बेहद करीब पहुंचीं, लेकिन इतिहास अब भी पुरुष राष्ट्रपति के नाम दर्ज है।
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106 साल बाद भी सवाल कायम
महिलाओं को वोट का संवैधानिक अधिकार मिलने के 106 साल बाद भी अमेरिका में कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बनी है। और इतिहास की विडंबना देखिए अफगानिस्तान में महिलाओं को मतदान का अधिकार अमेरिका से एक साल पहले मिला था, लेकिन आज वहां महिलाओं के अधिकारों पर गंभीर पाबंदियां हैं।
इसलिए Women’s Equality Day सिर्फ एक उपलब्धि का जश्न नहीं है। यह एक सवाल भी है क्या लोकतंत्र में सिर्फ वोट देने का अधिकार ही बराबरी है? कानून बदलने में दशकों लग सकते हैं, लेकिन क्या सत्ता और समाज की सोच बदलने में उससे भी ज्यादा वक्त लगता है?
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