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Lucknow Heat Risk: लखनऊ में बढ़ रही उमस वाली गर्मी, 2050 तक हर साल हजारों मौतों का अनुमान

लखनऊः उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गर्मी का असर अब सिर्फ बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं रह गया है। तापमान के साथ बढ़ती नमी और उमस ने शहर के लिए नया ‘हीट रिस्क’ पैदा कर दिया है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर के वर्ष 2015 से 2024 के मौसम संबंधी दैनिक आंकड़ों के विश्लेषण में भविष्य को लेकर गंभीर चेतावनी सामने आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यदि अधिक उत्सर्जन वाले हालात बने रहे और उमस भरी गर्मी का प्रभाव इसी तरह बढ़ता रहा तो 2050 तक लखनऊ में गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों का आंकड़ा करीब 4,000 प्रतिवर्ष तक पहुंच सकता है।

10 साल में 289 दिन झेली गर्मी और भीषण उमस

CEEW के विश्लेषण के अनुसार, 2015 से 2024 के बीच लखनऊ में 289 ऐसे दिन दर्ज किए गए, जब अधिकतम तापमान कम से कम 35 डिग्री सेल्सियस और आर्द्रता 60 फीसदी या उससे अधिक रही।

आंकड़ों से पता चलता है कि यह समस्या बढ़ रही है। 2015 से 2019 के बीच लखनऊ में उमस भरी गर्मी के 123 दिन दर्ज किए गए। यानी पांच साल में हर साल औसतन 24.6 दिन ऐसे रहे। 2020 से 2024 के बीच ऐसे दिनों की संख्या बढ़कर 166 हो गई। वर्ष 2020 में सबसे ज्यादा 45 दिन भीषण गर्मी और उमस वाले रहे।

सिंधुगंगा के मैदानों की भौगोलिक स्थिति भी जिम्मेदार

भारतीय मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. के. जे. रमेश के मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान बढ़ा है। इसके साथ ही सिंधुगंगा के मैदानी क्षेत्र में नमी का स्तर भी बढ़ा है। उन्होंने बताया कि लखनऊ इस मैदान के बीचोंबीच स्थित है।

कम ऊंचाई और बेसिन जैसी भौगोलिक संरचना के कारण हवा के ठहरने से वातावरण में नमी बनी रहती है। अधिक नमी के कारण उमस वाली गर्मी का असर और गंभीर हो जाता है, जिससे गर्मी और सांस से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।

पसीना नहीं सूखने से बढ़ता है हीट स्ट्रोक का खतरा

वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिक सीमा जावेद के अनुसार, अधिक उमस में शरीर के पसीने को वाष्पित होने में परेशानी होती है। इससे शरीर की खुद को ठंडा रखने की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित होती है।

ऐसे में अपेक्षाकृत कम तापमान पर भी हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। उमस भरी रातें भी समस्या को गंभीर बनाती हैं, क्योंकि रात में शरीर को दिन की गर्मी से उबरने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता।

इसका असर विशेष रूप से खुले में काम करने वाले श्रमिकों, बुजुर्गों, बच्चों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर अधिक पड़ सकता है।

2050 तक गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों में 50% वृद्धि का अनुमान

रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक अधिक उत्सर्जन वाले परिदृश्य में लखनऊ में सभी आयु वर्गों के बीच गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों में करीब 50 फीसदी की वृद्धि हो सकती है।

प्रति हजार आबादी पर गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों की दर 0.6 तक पहुंच सकती है। नगरीय विस्तार को देखते हुए, इसका मतलब है कि हर साल करीब 4,000 मौतें हो सकती हैं।

35 फीसदी बढ़े गर्मी और उमस वाले दिन

नेशनल रिसर्च डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन इंडिया में जलवायु अनुकूलनशीलता एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख अभियंता तिवारी ने भी बदलते हालात पर चिंता जताई।

उनके मुताबिक 201519 और 202024 के बीच गर्मी तथा उमस वाले दिनों में 35 फीसदी की वृद्धि विशेष चिंता का विषय है। ज्यादा नमी में पसीना जल्दी नहीं सूखता, जिससे शरीर को मिलने वाली प्राकृतिक ठंडक कम हो जाती है। वहीं, गर्म रातों के कारण शरीर को अगले दिन की गर्मी से पहले पूरी तरह उबरने का मौका नहीं मिल पाता।

हरियाली और मजबूत हीट एक्शन प्लान की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते मौसम के प्रभाव से निपटने के लिए सिर्फ तापमान पर निगरानी पर्याप्त नहीं होगी। शहरी क्षेत्रों में अधिक हरियाली, मजबूत हीट एक्शन प्लान और संवेदनशील आबादी के लिए विशेष सुरक्षा उपाय जरूरी होंगे।

उमस से तबीयत खराब महसूस होने पर छायादार और हवादार स्थान पर जाने तथा पर्याप्त पानी पीने की सलाह दी गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक छोटेछोटे सावधानी उपायों के साथसाथ सरकारी स्तर पर दीर्घकालिक नीतिगत बदलाव भी जरूरी हैं।

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