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दो स्तनों पर सिमटा ये कैसा साहित्य, समाज को क्या सोच देगा?

एक वेबसाइट पर छपी कुशाग्र अद्वैत की इस कविता के बाद बवाल मचा. शोर हुआ. साहित्य के नाम पर कोई कुछ भी लिख देगा, यह नहीं चलेगा. अब ये कविता अश्लील, पार्न और साहित्य के भंवर में फंसी हुई है.

दो दिन में हम कैसे समेटेंगे,

सारा वसंत, सारा आषाढ़,

दो दिन तो तुम्हारे,

दो स्तन ही ले लेंगे.

इस पर तमाम तरफ से तमाम विचार आ रहे हैं लेकिन मेरा विचार ये है

कवि महोदय…

औरत के दो स्तन तुम्हारे सावन के दो दिन नहीं तुम्हारे जीवन के प्राण हैं. तुम्हारी रगों में रक्त की पहली बूंद है. तुम्हारे प्राण की पहली श्वास है. तुम्हारे जीवन में आषाढ़ भी वो दो स्तन लेकर आए हैं. बसंत भी और शीत भी. लेकिन अपने दो कौड़ी के दो दिनों में तुमने उन स्तनों से निचोड़ ली सारी अस्मिता, सारा मातृत्व, सारा प्रेम और परोस दिया उसे बाज़ार में अपनी तुकंबदी के पीछे मनोरंजन के लिए.

तुकबंदी और सोच का मुजाअरा ही करना है तो ऐसा करिए कि समाज छिछियाने ना लगे. बचाव में कुछ भी कहा जाए. हो सकता है आपने पूरी कविता में स्त्री की शान में पूरी कामायनी लिख दी हो. लेकिन शोकेस के लिए आपने स्तन ही चुने. इसके बाद इस कविता में कवि क्या कहना चाहता है? प्रसंग क्या है? संदर्भ क्या है? व्याख्या क्या है? ये सब मायने नहीं रखता.

खुले विचारों का और नंगे विचारों का होने में फर्क हैं. बड़ी मुश्किल से ये समाज स्त्री के कोमल अंगों और उभारों के वर्णन से मुक्त हुआ है. हालांकि हुआ तो पूरी तरह से नहीं हैं लेकिन फिर भी ओटीटी से लेकर सोशल मीडिया तक जब सब तरफ सॉफ्ट पॉर्न की बयार है. साहित्य के नाम पर इस मानसिक प्रदर्शन को नॉर्मलाइज़ तो नहीं किया जाना चाहिए.

सआदत हसन मंटो की ‘नंगी आवाज़े’ भी इससे कम नंगी थी. भारतीय समाज में उपमाओं का बहुत रोल है। दूरदर्शन पर आती पिक्चर में जब दो फूल मिलते दिखाते थे तो संदर्भ समझ में आता था. अब उसी को उघाड़ करके कोई दिखा दे तो बन गया ओटीटी और साफ साफ लिख दें. अब नायक और नायिका संभोग करते हैं, क्या ये साहित्य बना?

अगर साफगोई की ही बात है तो समाज कभी जावेद अख्तर या गुलज़ार को सिर ना चढ़ाता. हमेशा यहां द्विअर्थी गाने राज करते. फुल नंगई की ही बात है तो बताइए कवि महोदय दो दिन दो स्तनों का आप क्या करेंगे. दफ्तर से छुट्टी लेकर प्रेयसी को एक दिन मैमोग्राफी के लिए लेकर जाएंगे और अगले दिन रिपोर्ट कलेक्ट करके डॉक्टर को दिखाने जाएंगे तो बहुत ही केयरिंग और अवेयर प्रेमी हैं आप. माफ कीजिएगा आपके साहित्य में मेडिकल की एंट्री करा दी. लेकिन बीस पच्चीस की उम्र में भी किसी स्थापित साहित्यकार को इतनी चौड़ में गलीच उगलते नहीं देखा.

ख्याल सबके मन में आ सकते हैं, सब तरह के आ सकते हैं. समाज में सज्जनों और दुर्जनों की परिभाषा ऐसे ही बनती हैं. बंद कमरे में सज्जन भी दुर्जन हो सकता है लेकिन बंद कमरे में क्योंकि सज्जन पुरुष जानता है. बंद कमरे में जो वो कर रहा है या तो वो बना ही बंद कमरे में करने के लिए हैं या कभी वो बंद कमरे के बाहर आ गया तो उस से सज्जन की उपाधि छिन जाएगी. साहित्यकार के साथ भी कुछ ऐसा ही है. विचारधारा के विवादों में फंसता है, विवादित लिखकर फंसता है. सच लिखकर फंसता है. झूठ लिखकर फंसता है, लेकिन लिखता वृहद संदर्भ में समाज के लिए है. उसे अवगत कराने के लिए. दो स्तनों के लिए दो दिन अपर्याप्त बताकर आप समाज को अपने किसी महान अविष्कार से अवगत नहीं करा रहें. स्वयं से परिचय करा रहे हैं.

और जैसे किसी म्यूजिकल रियलटी शो में कहते हैं ना मेरी व्यक्तिगत राय फर्स्ट राउंड में यही है “आप मुंबई नहीं आ रहे, अभी आपको बहुत रियाज की और संगीत को समझने की ज़रूरत है”.

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