India

भारत में सिर्फ ढाई लोगों को अंग्रेजी का ज्ञान…फिराक गोरखपुरी ने यह किसके लिए कहा था? पढ़ें किस्से

उर्दू शायरी में फिराक गोरखपुरी का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है. उनका असली नाम रघुपति सहाय था. वे शायर थे. शिक्षक थे. स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे. वे अपनी बेबाकी, गहरी संवेदना और अलग अंदाज की ग़ज़लों के लिए मशहूर हुए. फिराक की शायरी में प्रेम है. विरह है. अकेलापन है. भारतीय जीवन की खुशबू है. उनकी निजी जिंदगी में भी बहुत दुख थे. शायद यही दुख उनकी रचनाओं में गहराई बनकर उतर आया.

उनका एक चर्चित शेर है ‘मौत का भी इलाज हो शायद, ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं’. आइए, इस मशहूर शायर की जन्म जयंती पर उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ किस्से और कुछ शेर जानते हैं.

भारत में अंग्रेजी जानने वाले ढाई लोग कौन थे?

फिराक गोरखपुरी अंग्रेजी के बहुत बड़े जानकार माने जाते थे. वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाते थे. अंग्रेजी भाषा और कविता पर उनकी पकड़ असाधारण थी. उनसे जुड़ा एक मशहूर कथन है. उन्होंने कहा था कि भारत में केवल ढाई लोग सही अंग्रेजी जानते हैं. उनमें पहला नाम उन्होंने अपना लिया. दूसरा नाम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का बताया. आधा नाम जवाहरलाल नेहरू का लिया. यह कथन उनके आत्मविश्वास और बेबाक स्वभाव को दिखाता है. वह खुद को कम करके बोलने वाले व्यक्ति नहीं थे. उनकी बातों में अक्सर व्यंग्य भी होता था. इस चर्चित कथन का उल्लेख उनसे जुड़े कई लेखों में मिलता है.

फिराक गोरखपुरी का मूल नाम रघुपति सहाय था.

रघुपति सहाय कैसे बने फिराक गोरखपुरी?

फिराक गोरखपुरी का जन्म गोरखपुर में हुआ था. उनका जन्म 28 अगस्त 1896 को माना जाता है. उनका परिवार पढ़ालिखा था. घर में साहित्य का माहौल था. उनके पिता गोरख प्रसाद भी कविता से जुड़े थे. इस कारण भाषा और साहित्य से उनका रिश्ता बचपन से बन गया. उनका मूल नाम रघुपति सहाय था. बाद में उन्होंने शायरी के लिए फिराक तखल्लुस चुना. उर्दूफारसी में फिराक का अर्थ होता है जुदाई, वियोग या बिछोह. यह नाम उनकी शायरी की दुनिया के बिल्कुल अनुकूल था. उनकी ग़ज़लों में प्रेम के साथ जुदाई और इंतजार का दर्द बहुत गहराई से मिलता है. गोरखपुरी उनके जन्मस्थान गोरखपुर से जुड़ा उपनाम था. इस तरह रघुपति सहाय, साहित्य की दुनिया में फिराक गोरखपुरी बन गए.

निजी जीवन की त्रासदी भी कम न थी

फिराक का निजी जीवन सरल नहीं था. उनकी शादी बहुत कम उम्र में हुई थी. यह विवाह उनके लिए सुखद नहीं रहा. दांपत्य जीवन में तनाव था. भावनात्मक दूरी थी. इस अनुभव ने उन्हें भीतर तक चोट पहुंचाई. उनकी जिंदगी में अकेलापन लंबे समय तक बना रहा. वे अपने रिश्तों और पारिवारिक परिस्थितियों से परेशान रहते थे. कई लेखों और संस्मरणों में उनके वैवाहिक जीवन को दुखद बताया गया है. हालांकि, उनकी पहचान केवल निजी दुखों से नहीं बनती. उन्होंने अपने दर्द को साहित्य की ताकत में बदला. उनकी शायरी में स्त्री केवल एक प्रेमिका नहीं है. वह जीवन का अनुभव है. वह स्मृति है. वह भारतीय घरआंगन की उपस्थिति है. यही वजह है कि उनकी प्रेमकविताएं सिर्फ रोमांस तक सीमित नहीं रहतीं. उनमें जीवन का बड़ा सच दिखाई देता है.

आजादी के आंदोलन में निभाई भूमिका

फिराक केवल शायर और प्रोफेसर नहीं थे. वे स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े थे. अंग्रेजी शासन के खिलाफ उनका स्पष्ट रुख था. उन्होंने सरकारी सेवा का रास्ता छोड़ दिया था. कहा जाता है कि उनका चयन सिविल सेवा के लिए हुआ था. वे डिप्टी कलेक्टर बन सकते थे, लेकिन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान ने उन्हें प्रभावित किया. उन्होंने सरकारी नौकरी स्वीकार नहीं की. वे जेल भी गए. बाद में वे कांग्रेस से जुड़े. इलाहाबाद में उनका संपर्क जवाहरलाल नेहरू सहित कई नेताओं से रहा. मगर राजनीति उनकी स्थायी मंजिल नहीं बनी. अंततः साहित्य और अध्यापन ही उनकी असली दुनिया बने.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लोकप्रिय शिक्षक

फिराक ने लंबे समय तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाई. वे केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं थे. वे भाषा का रस समझाते थे. कविता की बारीकियां बताते थे. उनके व्यक्तित्व में विद्वत्ता थी. साथ ही एक अजीब सी अक्खड़ता भी. छात्र उनकी बातों से प्रभावित होते थे. कई लोग उनसे डरते भी थे. वे गलत बात बर्दाश्त नहीं करते थे. किसी की समझ कम लगी तो वह तंज कर देते थे. लेकिन उनके ज्ञान पर बहुत कम लोगों को संदेह था.

फिराक के जीवन से जुड़े पांच दिलचस्प किस्से भी जानिए

यूं तो फिराक का जीवन किस्सों से भरा हुआ है. आज ये किससे कहीं न कहीं साहित्य के पन्नों में दर्ज मिलते हैं. उन्हीं में से कुछ चुनिंदा किस्से यहां पेश हैं.

हिंदी के प्रोफेसर को फिराक का जवाब

हिंदी के विद्वान विश्वनाथ त्रिपाठी ने फिराक से मुलाकात का एक प्रसंग साहित्य के पन्नों में अलगअलग मिलता है. किस्सा कुछ यूं हैफिराक ने हिंदी और हिंदी वालों पर तीखी बातें कीं. त्रिपाठी को यह अच्छा नहीं लगा. उन्होंने कहा कि आप मेरे गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के बारे में गलत न बोलें. फिराक नहीं माने. तब त्रिपाठी ने गुस्से में कहा कि वह उन्हें ढेला मारकर भाग जाएंगे और फिराक पकड़ नहीं पाएंगे. यह सुनकर फिराक हंस पड़े. उन्होंने कहापंडित जी, तुम तो असली हिंदी वाले मालूम पड़ते हो. यह प्रसंग उनके तीखे, मगर हंसमुख स्वभाव को दिखाता है.

अब कहां सहाय, अब तो बस हाय

फिराक ने एक बार चुनाव भी लड़ा. यह आजादी के बाद पहले आम चुनावों का दौर था. वे गोरखपुर से मैदान में उतरे. उन्हें सफलता नहीं मिली. उनकी जमानत तक जब्त हो गई. हार के बाद उनकी नेहरू से मुलाकात हुई. नेहरू ने पूछाकैसे हैं सहाय साहब? फिराक ने तुरंत जवाब दिया अब कहां सहाय, अब तो बस हाय रह गया है. यह जवाब उनकी हाजिरजवाबी का शानदार उदाहरण है.

अपनी अंग्रेजी पर बेइंतहा भरोसा

ग़ालिबओमीरओमुसहफ़ी,

हम भी फ़िराक़ कम नहीं

यह शेर फिराक गोरखपुरी के आत्मविश्वास और अपनी विद्वता पर भरोसे को दिखाता है. इसे अंग्रेजी भाषा पर उनके बेइंतहा भरोसे वाले प्रसंग के साथ जोड़ा जा सकता है. वह अंग्रेजी साहित्य के अध्यापक थे. अंग्रेजी कविता, भाषा और उच्चारण पर उनकी गहरी पकड़ थी. किस्सा यूं है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने उन्हें बंगला खाली करने का नोटिस दिया. उन्होंने अंग्रेजी भाषा की उस नोटिस में अनेक गलतियाँ निकालकर लौटा दिया. प्रशासन ने ठीक करके नोटिस फिर से भेजा. उसमें भी फिराक ने गलतियां निकाल दी.

उर्दू के शायर, अंग्रेजी के प्रोफेसर

सरज़मीने हिंद पर अक़वामेआलम के फ़िराक़,

क़ाफ़िले बसते गए हिंदोस्तां बनता गया

यह शेर फिराक गोरखपुरी की व्यापक दृष्टि दिखाता है. वे उर्दू के शायर थे, लेकिन अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर भी रहे. अलगअलग भाषाओं और संस्कृतियों का यह मेल उनकी सोच में साफ दिखाई देता है. यह फिराक की सबसे खास पहचान थी. वे उर्दू के बड़े शायर थे. लेकिन उनका पेशा अंग्रेजी साहित्य पढ़ाना था. वे भारतीय भाषाओं की आत्मा को समझते थे. उनकी रचनाओं में उर्दू की नजाकत है. साथ ही भारतीय मिट्टी का रंग भी है.

हार को भी शेर बना देने वाला स्वभाव

फिराक के पास दुख को भी शब्दों में बदल देने की कला थी. निजी जीवन की पीड़ा हो या चुनाव की हार, वह उसे केवल शिकायत नहीं बनाते थे. उनकी बातों में दर्द भी आता था और विनोद भी. यही गुण उन्हें अलग बनाता है. फिराक गोरखपुरी का यह प्रसिद्ध शेर जीवन की मुश्किलों के बीच उनकी जिजीविषा को दिखाता है.

ये माना ज़िंदगी है चार दिन की, बहुत होते हैं यारों चार दिन भी

इसे हार के बाद भी जीवन को स्वीकार करने और आगे बढ़ने की भावना से जोड़ा जा सकता है.

ज्ञानपीठ से लेकर पद्मभूषण तक

फिराक गोरखपुरी की रचनाओं में ग़ज़ल, नज़्म और रुबाई का बड़ा संसार मिलता है. उनका प्रसिद्ध संग्रह गुलएनग़्मा है. इस कृति के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला. उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार और पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया. उनकी भाषा में बनावट कम है. अनुभूति अधिक है. वे प्रेम को भारतीय जीवन से जोड़ते हैं. उनकी शायरी में शाम है. घर है. चूल्हे की आंच है. स्त्री की उपस्थिति है. बिछड़ने का दर्द है. इसी कारण फिराक की कविता आम पाठक के दिल तक पहुंचती है.

फिराक की साहित्यिक विरासत

फिराक गोरखपुरी को आधुनिक उर्दू ग़ज़ल के महत्वपूर्ण शायरों में गिना जाता है. उन्होंने उर्दू शायरी को नया भावबोध दिया. उन्होंने प्रेम को केवल महबूब के चेहरे तक सीमित नहीं रखा. उसे जीवन, समाज और भारतीय संस्कृति के अनुभव से जोड़ा. उनकी जिंदगी संघर्षों से भरी थी. उनका स्वभाव कई बार कठोर दिखता था. लेकिन भीतर एक बेहद संवेदनशील कवि था. वही कवि आज भी अपने शेरों के जरिए लोगों से बात करता है.

फिराक की शायरी हमें बताती है कि दर्द इंसान को तोड़ भी सकता है और रच भी सकता है. फिराक ने अपने दर्द को शब्द दिए. इसलिए उनका नाम हिंदीउर्दू साहित्य की दुनिया में हमेशा जिंदा रहेगा. जोश मलिहाबादी ने उन्हें मीर तकी मीर और गालिब के बाद उर्दू का सबसे बड़ा शायर तक कहा और माना.

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply