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इनहेलर आने से पहले अस्थमा के मरीज कैसे लेते थे सांस? धुआं, भाप और दवाओं से शुरू हुआ सफर, फिर ऐसे बदली इलाज की दुनिया​​​​​​

आज अगर किसी अस्थमा मरीज को अचानक सांस लेने में तकलीफ होती है तो इनहेलर कुछ ही पलों में राहत पहुंचाने में मदद कर सकता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब इनहेलर जैसी सुविधा मौजूद नहीं थी, तब अस्थमा के मरीज सांस की तकलीफ से कैसे जूझते थे? उस दौर में इलाज के लिए भाप, मुंह से दी जाने वाली दवाओं, इंजेक्शन और यहां तक कि औषधीय धुएं तक का इस्तेमाल किया जाता था।

अस्थमा का इतिहास चिकित्सा विज्ञान के सबसे दिलचस्प अध्यायों में से एक है। आज जिस छोटे से डिवाइस को मरीज आसानी से जेब में रख लेते हैं, वहां तक पहुंचने में चिकित्सा विज्ञान को कई सदियां लगीं। इनहेलर की तकनीक ने दवा को सीधे सांस की नलियों तक पहुंचाना आसान बनाया और अस्थमा के इलाज में बड़ा बदलाव आया।

इनहेलर से पहले अस्थमा का इलाज कितना मुश्किल था?

अस्थमा के दौरे के दौरान सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं और उनमें सूजन तथा म्यूकस बढ़ सकता है। इससे हवा का आवागमन मुश्किल हो जाता है और मरीज को सांस फूलने, सीने में जकड़न, खांसी और घरघराहट जैसी परेशानियां होने लगती हैं।

आधुनिक इनहेलर उपलब्ध होने से पहले डॉक्टरों के पास ऐसे उपचार सीमित थे जो सीधे फेफड़ों तक दवा पहुंचा सकें। मरीजों को कई बार दवाएं मुंह से दी जाती थीं या इंजेक्शन लगाए जाते थे। कुछ पुराने उपचारों में भाप और अलग-अलग औषधीय पदार्थों के धुएं का इस्तेमाल भी किया जाता था।

इन तरीकों की सबसे बड़ी कमी यह थी कि दवा सीधे उस जगह नहीं पहुंचती थी जहां उसकी जरूरत होती थी। इसके अलावा कुछ पुराने उपचारों के साइड इफेक्ट भी गंभीर हो सकते थे।

1778 में बना शुरुआती इनहेलर

इनहेलर का इतिहास आधुनिक मीटर्ड-डोज इनहेलर से काफी पुराना है। साल 1778 में डॉक्टर जॉन मड्ज ने एक ऐसा उपकरण तैयार किया था, जिसके जरिए भाप को सांस के रास्ते अंदर लिया जाता था।

इस उपकरण का इस्तेमाल मुख्य रूप से अत्यधिक बलगम वाली खांसी जैसी समस्याओं के लिए किया जाता था। इसमें गर्म पानी और कुछ औषधीय पदार्थों की भाप को एक नली के जरिए सांस के साथ अंदर लेने की कोशिश की जाती थी।

हालांकि यह आज के इनहेलर जैसा बिल्कुल नहीं था, लेकिन इसे दवा को सांस के रास्ते शरीर तक पहुंचाने की शुरुआती कोशिशों में शामिल किया जाता है।

कभी अस्थमा के लिए औषधीय सिगरेट भी दी जाती थी

आज के समय में यह बात हैरान करने वाली लग सकती है, लेकिन करीब एक सदी पहले अस्थमा और एलर्जी जैसी समस्याओं के लिए औषधीय सिगरेट का इस्तेमाल भी किया जाता था।

इनमें ऐसे पदार्थ शामिल किए जाते थे जिनका उद्देश्य सांस की नलियों को अस्थायी रूप से फैलाना था। कुछ जगहों पर धतूरे, कैफीन और अन्य पदार्थों से जुड़े पुराने उपचार भी इस्तेमाल किए जाते थे।

बाद में चिकित्सा विज्ञान आगे बढ़ा और इन तरीकों की सीमाएं तथा संभावित नुकसान सामने आए। इसके बाद ज्यादा सुरक्षित और नियंत्रित उपचारों की जरूरत महसूस हुई।

फिर आया मीटर्ड-डोज इनहेलर

अस्थमा के इलाज में सबसे बड़ा बदलाव 1950 के दशक में आया। आधुनिक मीटर्ड-डोज इनहेलर यानी MDI ने दवा को एक निश्चित मात्रा में एरोसोल के रूप में सीधे सांस की नलियों तक पहुंचाना संभव बनाया।

इस तकनीक का विकास 1950 के दशक में हुआ और 1956 के आसपास इसका मेडिकल इस्तेमाल शुरू हुआ। इससे मरीजों के लिए दवा लेना काफी आसान हो गया।

पुराने उपचारों की तुलना में इसकी खासियत यह थी कि दवा को सीधे फेफड़ों तक पहुंचाने की कोशिश की जाती थी। यही वजह है कि इनहेलर अस्थमा के इलाज में एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि बन गया।

बेटी की परेशानी से मिली इनहेलर की प्रेरणा

आधुनिक मीटर्ड-डोज इनहेलर के विकास से जुड़ी एक चर्चित कहानी अमेरिकी वैज्ञानिक जॉर्ज मैसन और उनकी बेटी सूजी से जुड़ी है।

कहा जाता है कि उनकी बेटी गंभीर अस्थमा से परेशान रहती थीं और उन्होंने अपने पिता से पूछा कि अस्थमा की दवा को हेयर स्प्रे की तरह एक छोटे कैन में क्यों नहीं रखा जा सकता, ताकि जरूरत पड़ने पर आसानी से इस्तेमाल किया जा सके।

इस विचार ने एरोसोल कैन तकनीक के इस्तेमाल की दिशा में प्रेरणा दी। इसके बाद एक ऐसा उपकरण विकसित हुआ जिसमें बटन दबाने पर दवा की मापी हुई मात्रा बाहर निकलती थी और मरीज उसे सांस के जरिए अंदर ले सकता था।

अस्थमा में इनहेलर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

अस्थमा में समस्या मुख्य रूप से सांस की नलियों में सूजन, सिकुड़न और म्यूकस से जुड़ी होती है। इनहेलर के जरिए दी जाने वाली दवाएं इन्हीं एयरवेज पर सीधे काम करने के लिए बनाई जाती हैं।

कुछ इनहेलर अचानक होने वाली सांस की तकलीफ में राहत देने के लिए इस्तेमाल होते हैं, जबकि कुछ कंट्रोलर इनहेलर बीमारी को लंबे समय तक नियंत्रित रखने में मदद करते हैं।

इसलिए हर इनहेलर का काम एक जैसा नहीं होता। डॉक्टर द्वारा बताए गए इनहेलर और उसकी निर्धारित खुराक का ही इस्तेमाल करना चाहिए।

अस्थमा आखिर होता क्या है?

अस्थमा फेफड़ों की एक क्रॉनिक बीमारी है, जिसमें सांस की नलियों में सूजन और संवेदनशीलता बढ़ जाती है। धूल, धुआं, परागकण, प्रदूषण, ठंडी हवा, कुछ एलर्जी या अन्य ट्रिगर के संपर्क में आने पर एयरवेज सिकुड़ सकती हैं।

इसकी वजह से मरीज को सांस लेने में परेशानी, घरघराहट, सीने में जकड़न और बार-बार खांसी जैसी समस्या हो सकती है।

कुछ लोगों में रात के समय या सुबह खांसी और सांस की परेशानी ज्यादा महसूस होती है। कुछ मरीजों में मुख्य लक्षण लगातार सूखी खांसी भी हो सकता है।

अस्थमा के मरीज किन चीजों से बचें?

अस्थमा को नियंत्रित रखने के लिए सिर्फ दवा ही नहीं बल्कि ट्रिगर से बचना भी जरूरी है।

  • घर में धूल और सीलन जमा न होने दें।
  • धुएं और प्रदूषण से जितना संभव हो बचें।
  • अगर किसी खास चीज से एलर्जी है तो उससे दूरी रखें।
  • पालतू जानवरों, धूल या परागकण से परेशानी होने पर सावधानी बरतें।
  • मौसम बदलने के दौरान विशेष सतर्क रहें।
  • डॉक्टर द्वारा बताए गए कंट्रोलर इनहेलर का नियमित इस्तेमाल करें।
  • बिना डॉक्टर की सलाह के इनहेलर या दूसरी दवाएं बंद न करें।

इनहेलर का सही इस्तेमाल भी जरूरी

इनहेलर होना ही काफी नहीं है, उसका सही तरीके से इस्तेमाल करना भी उतना ही जरूरी है। गलत तकनीक से दवा का पर्याप्त हिस्सा फेफड़ों तक नहीं पहुंच पाता।

अगर आपको बार-बार इनहेलर की जरूरत पड़ रही है, रात में सांस फूलती है, सीने में लगातार जकड़न रहती है या सामान्य गतिविधियों में भी सांस लेने में परेशानी होती है तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

निष्कर्ष

अस्थमा के इलाज ने भाप और पुराने घरेलू-औषधीय तरीकों से लेकर आधुनिक इनहेलर तक लंबा सफर तय किया है। आज उपलब्ध इनहेलर तकनीक ने अस्थमा की दवा को सांस की नलियों तक पहुंचाना आसान बनाया है। हालांकि अस्थमा को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और हर मरीज का उपचार उसकी स्थिति के अनुसार अलग हो सकता है।

डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता और चिकित्सा इतिहास की जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसे व्यक्तिगत चिकित्सीय सलाह न मानें। अस्थमा के लक्षण होने पर योग्य डॉक्टर या पल्मोनोलॉजिस्ट से सलाह लें। डॉक्टर की सलाह के बिना अपनी नियमित दवाएं या इनहेलर बंद न करें।

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