
तिरुवनंतपुरम। पार्किंसंस और एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों की शुरुआती पहचान आज भी चिकित्सा जगत के सामने बड़ी चुनौती है। कई बार बीमारी से जुड़े जैवचिह्नक यानी बायोमार्कर शरीर में बेहद कम मात्रा में मौजूद होते हैं, जिससे शुरुआती चरण में उनकी पहचान करना मुश्किल हो जाता है। अब भारत के वैज्ञानिकों ने इस चुनौती से निपटने की दिशा में एक नई तकनीक विकसित की है।
बीआरआईसीराजीव गांधी जैवप्रौद्योगिकी केंद्र के शोधकर्ताओं ने एक नए प्रकार का नैनोपोरआधारित सेंसर विकसित किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक बेहद कम मात्रा में मौजूद बायोमार्करों की पहचान और निगरानी में मदद कर सकती है। इससे भविष्य में न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों की शुरुआती जांच के लिए अधिक संवेदनशील तकनीक विकसित करने का रास्ता खुल सकता है।
आखिर नैनोपोर सेंसर क्या करता है?
सरल भाषा में समझें तो बायोमार्कर शरीर में होने वाली किसी बीमारी से जुड़े जैविक संकेत होते हैं। शुरुआती बीमारी में इनकी मात्रा इतनी कम हो सकती है कि पारंपरिक जांच तकनीकों के लिए इन्हें पकड़ना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
डॉ. महेंद्रन के. आर. के नेतृत्व वाली शोध टीम ने इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए ‘स्वसंयोजित द्विव्यास’ नैनोपोर सेंसर तैयार किए हैं। इस सेंसर में छोटे पेप्टाइड्स खुदबखुद जुड़कर अलगअलग आकार के छिद्र यानी नैनोपोर बनाते हैं।
इन अलगअलग आकार के पोर्स की मदद से विभिन्न आकार और प्रकार के बायोमॉलिक्यूल्स को पहचानने के लिए एक बहुउपयोगी प्लेटफॉर्म तैयार होता है।
मरीजों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध?
पार्किंसंस और ALS जैसी बीमारियों में समय पर और सही पहचान बेहद महत्वपूर्ण चुनौती है। किसी बीमारी से जुड़े संकेतों को जितनी जल्दी और संवेदनशीलता के साथ पहचाना जा सके, उतना ही चिकित्सा क्षेत्र के लिए बीमारी की निगरानी और प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ना आसान हो सकता है।
इस शोध की खास बात यह है कि सेंसर ने बायोमार्कर के रोगसंबंधी रूपों को गैररोगसंबंधी रूपों से अलग पहचानने की क्षमता दिखाई। वह भी ऐसे जटिल प्रोटीन मिश्रणों में, जहां संबंधित बायोमार्कर की मात्रा बेहद कम थी।
हालांकि, यह तकनीक अभी शोध के स्तर पर है। इसे मरीजों की नियमित जांच के लिए उपलब्ध नैदानिक परीक्षण मानना उचित नहीं होगा।
भविष्य में घर के पास हो सकती है ऐसी जांच
शोधकर्ताओं के मुताबिक इस तकनीक का आगे व्यापक इस्तेमाल संभव है। भविष्य में इससे ऐसे पॉइंटऑफकेयर डायग्नोस्टिक उपकरण विकसित किए जा सकते हैं, जिनसे रक्त समेत अन्य जैविक द्रवों में मौजूद बीमारी से जुड़े बायोमार्करों की सीधे पहचान की जा सके।
यानी लंबे समय में ऐसी तकनीक विकसित होने की संभावना है, जिससे अत्याधुनिक बायोमार्कर जांच को बड़े और जटिल लैब सेटअप से बाहर लाकर मरीजों के ज्यादा करीब पहुंचाया जा सके।
इसका संभावित उपयोग केवल न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों तक सीमित नहीं है। शोधकर्ताओं ने संकेत दिया है कि भविष्य में इसी तरह के सेंसर का इस्तेमाल कैंसर जैसी अन्य बीमारियों से जुड़े बायोमार्करों की पहचान के लिए भी किया जा सकता है।
प्रकृति से प्रेरित है सेंसर का डिजाइन
शोध में तैयार नैनोपोर आर्किटेक्चर प्रकृति में मौजूद संरचनाओं से प्रेरित है। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह दृष्टिकोण नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर डेविड बेकर द्वारा शुरू किए गए कंप्यूटेशनल नैनोपोर डिजाइन दृष्टिकोण से अलग है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि प्रकृति से प्रेरित नैनोपोर तकनीक और कंप्यूटेशनल डिजाइन को एक साथ इस्तेमाल करने से भविष्य में और अधिक संवेदनशील सेंसिंग प्लेटफॉर्म विकसित किए जा सकते हैं।
किन वैज्ञानिकों ने किया शोध?
डॉ. महेंद्रन के. आर. के नेतृत्व वाली टीम में पीएचडी छात्रा वर्षा शाजी और पोस्टडॉक्टोरल शोधकर्ता डॉ. नीथू पुथुमदथिल ने भी योगदान दिया।
यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल ‘नेचर नैनोटेक्नोलॉजी’ में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में जर्मनी की कंस्ट्रक्टर यूनिवर्सिटी में डॉ. उलरिच क्लेनकैथोफर के समूह और कोलकाता स्थित सीएसआईआरइंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी में डॉ. कृष्णानंद चट्टोपाध्याय के समूह का भी सहयोग रहा।
सरकारी संस्थानों से मिला शोध को सहयोग
इस शोध को केंद्र सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद से मिले अनुदान का सहयोग प्राप्त हुआ।
BRICRGCB की निदेशक डॉ. बीना पिल्लई ने कहा कि पार्किंसंस और ALS जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के प्रबंधन में शुरुआती और सटीक पहचान अब भी बड़ी चुनौती है।
आम लोगों के लिए इसका मतलब क्या है?
इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वैज्ञानिक बीमारी के संकेतों को शुरुआती स्तर पर पकड़ने वाली अधिक संवेदनशील तकनीक विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। यदि आगे चलकर यह तकनीक नैदानिक इस्तेमाल के लिए सफलतापूर्वक विकसित होती है, तो रक्त जैसे जैविक नमूनों से कम मात्रा में मौजूद बायोमार्करों की पहचान आसान और तेज हो सकती है।
फिलहाल इसे भविष्य की संभावित जांच तकनीक के रूप में देखना चाहिए, न कि पार्किंसंस या ALS की मौजूदा चिकित्सा जांच का विकल्प।



