पूरी दुनिया में वर्ल्ड कोकोनट डे आज मनाया जा रहा है. इसकी शुरुआत साल 2009 में एशियन एंड पेसिफिक कम्युनिटी ने की थी. इसके पीछे नारियल के प्रति लोगों में जागरूकता लाना और किसानों को प्रोत्साहित करना है. हम सब जानते हैं कि नारियल का बहुआयामी उपयोग होता है. इसका तेल दवा की तरह इस्तेमाल होता आ रहा है. नारियल पूजा में उपयोग किया जाता है. नारियल का पानी लोग बड़े ही चाव से पीते हैं. इसकी भी मेडिसिनल वैल्यू है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही नारियल युद्ध में हथियार के रूप में भी इस्तेमाल हो चुका है?वर्ल्ड कोकोनट डे के बहाने आइए जानते हैं कि नारियल का इस्तेमाल हथियार के रूप में कब हुआ था? किस युद्ध में और किस देश की सेना ने इस्तेमाल किया था?

द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहास में कई अनोखे और चौंकाने वाले हथियार देखने को मिलते हैं. जंग के मैदान में जब नियमित आपूर्ति खत्म होने लगी, तब सैनिकों ने जीवित रहने और दुश्मन को मात देने के लिए प्रकृति की चीजों का सहारा लिया. ऐसा ही एक अनोखा और घातक प्रयोग प्रशांत महासागर के द्वीपों पर सेना ने किया था. इस हथियार को इतिहास में कोकोनट ग्रेनेड या नारियल बम के नाम से जाना जाता है. जापानी सेना ने इस अचूक हथियार का इस्तेमाल अमेरिकी सेना के खिलाफ किया था.
प्रशांत युद्ध की पृष्ठभूमि और संसाधनों की कमी
साल 1944 के आसपास प्रशांत महासागर में युद्ध का रुख पूरी तरह बदल चुका था. अमेरिकी सेना तेजी से आगे बढ़ रही थी. फिलीपींस, पापुआ न्यू गिनी और लेयटे जैसे द्वीपों पर जापानी सेना अलगथलग पड़ गई थी. अमेरिकी नौसेना और वायुसेना ने जापानी आपूर्ति जहाजों को समुद्र में ही डुबो दिया था. जापानी सैनिकों के पास राशन, दवाइयां और पारंपरिक गोलाबारूद खत्म होने लगे थे. जापानी युद्ध नीति में आत्मसमर्पण का कोई स्थान नहीं था. हर सैनिक से अंतिम सांस तक लड़ने की उम्मीद की जाती थी. ऐसी स्थिति में स्थानीय संसाधनों से ही काम चलाऊ हथियार यानी इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेस तैयार करना उनकी मजबूरी और रणनीति दोनों बन गया.
नारियल को बनाया हथियार. फोटो: Pexels
नारियल को हथियार बनाने का विचार कैसे आया?
प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय द्वीपों पर नारियल के पेड़ बहुतायत में थे. नारियल हर जगह आसानी से और मुफ्त में उपलब्ध था. नारियल का बाहरी छिलका और भीतरी खोल बहुत सख्त होता है. यह धातु के खोल जैसा काम कर सकता था. इसके अलावा घने जंगलों में नारियल स्वाभाविक रूप से जमीन पर बिखरे रहते थे. दुश्मन सेना के लिए यह पहचानना मुश्किल था कि कौन सा नारियल प्राकृतिक है और कौन सा घातक बम. इसी वजह से जापानी सैनिकों ने नारियल को एक गुप्त और जानलेवा हथियार में बदल दिया.
कैसे तैयार होता था कोकोनट ग्रेनेड?
कोकोनट ग्रेनेड को तैयार करने की प्रक्रिया बहुत सरल लेकिन बेहद खतरनाक थी. सैनिक सबसे पहले नारियल का पानी और अंदर की मलाई निकाल लेते थे. इसके लिए नारियल के ऊपरी हिस्से में एक छोटा सा छेद किया जाता था. अंदर की जगह खाली होने के बाद, उसमें बारूद और पिक्रिक एसिड जैसा उच्च विस्फोटक भरा जाता था.
सिर्फ बारूद भरने से घातक प्रभाव कम रहता था, इसलिए धमाके को जानलेवा बनाने के लिए जापानी सैनिक उसमें लोहे की कीलें, कांच के बारीक टुकड़े, कटी हुई धातु की पत्तियां और नुकीले पत्थर भर देते थे. ऊपरी छेद में एक साधारण डेटोनेटर या फ्यूज लगाया जाता था. बारूद को सील करने के लिए मोम, लकड़ी की डाट या गम का इस्तेमाल होता था. यह सील बारूद को उष्णकटिबंधीय नमी और बारिश से सुरक्षित रखती थी.
कोकोनट ग्रेनेड. फोटो: AI Generated
युद्ध के मैदान में इस्तेमाल के तरीके क्या थे?
जापानी सैनिक कोकोनट ग्रेनेड का इस्तेमाल कई अलगअलग तरीकों से करते थे. सबसे आम तरीका इसे हाथ से फेंकने वाले ग्रेनेड की तरह इस्तेमाल करना था. फ्यूज को सुलगाकर या उसके प्राइमर को पत्थर पर ठोककर अमेरिकी सैनिकों की ओर फेंक दिया जाता था. दूसरा घातक तरीका इसे लैंडमाइन की तरह लगाना था. जापानी सैनिक पगडंडियों, जंगलों के रास्तों और अमेरिकी गश्ती दलों के गुजरने की जगहों पर इन नारियलों को रख देते थे. इन्हें पतले तारों से जोड़ दिया जाता था. जैसे ही किसी अमेरिकी सैनिक का पैर तार से टकराता, नारियल में जोरदार धमाका हो जाता था. तीसरा तरीका आत्मघाती हमलों का था. कई बार जापानी सैनिक अपने शरीर पर इन नारियल बमों को बांधकर अमेरिकी बंकरों या टैंकों के पास दौड़ पड़ते थे.
अमेरिकी सैनिकों पर हुआ मनोवैज्ञानिक असर
कोकोनट ग्रेनेड का असर सिर्फ शारीरिक नुकसान तक सीमित नहीं था. इसका सबसे बड़ा असर अमेरिकी सैनिकों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा. घने जंगलों में जमीन पर पड़ा एक साधारण फल भी मौत का कारण बन सकता था. अमेरिकी सैनिकों में हर पेड़, गिरे हुए नारियल और झाड़ी को लेकर भारी खौफ पैदा हो गया था. आगे बढ़ने की रफ्तार धीमी हो गई क्योंकि हर कदम पर बूबी ट्रैप का खतरा था. अमेरिकी सेना के तकनीकी खुफिया विभागों ने तुरंत अपने सैनिकों के लिए चेतावनी बुलेटिन जारी किए. सैनिकों को सख्त निर्देश दिए गए कि वे जंगलों में पड़े किसी भी नारियल को बिना जांचे लात न मारें और न ही हाथ लगाएं.
हथियार की ताकत और कमजोरियां क्या थीं?
कोकोनट ग्रेनेड की सबसे बड़ी ताकत इसका गुप्त रूप और निर्माण में शून्य लागत थी. यह जंगलों में आसानी से छिप जाता था और इसकी आपूर्ति कभी खत्म नहीं हो सकती थी. हालांकि, इसकी कई तकनीकी कमजोरियां भी थीं. फैक्ट्री में बने मेटल ग्रेनेड के मुकाबले इसका खोल असमान रूप से फटता था. कभीकभी नारियल का खोल बारूद के दबाव को पूरी तरह रोक नहीं पाता था, जिससे धमाका कमजोर रह जाता था. उष्णकटिबंधीय मौसम की भारी नमी के कारण कई बार बारूद गीला हो जाता था और ग्रेनेड फटता ही नहीं था. इसके बावजूद, नजदीकी मुठभेड़ में यह किसी भी इंसान को गंभीर रूप से घायल करने या जान लेने के लिए पर्याप्त था.
इतिहास के पन्नों की यह अनोखी सीख
द्वितीय विश्व युद्ध में जापानी सेना का कोकोनट ग्रेनेड यह साबित करता है कि युद्ध के दौरान इंसान की रचनात्मकता किस कदर विनाशकारी रूप ले सकती है. यह घटना दर्शाती है कि जब कोई सेना पूरी तरह घिर जाती है, तो वह प्रकृति के सबसे शांत और जीवनदायी तत्वों को भी मौत के औजार में बदल सकती है. आज द्वितीय विश्व युद्ध के संग्रहालयों और सैन्य दस्तावेजों में कोकोनट ग्रेनेड का जिक्र गुरिल्ला युद्ध और तात्कालिक हथियारों के एक दुर्लभ उदाहरण के रूप में दर्ज है. यह इतिहास का वह पन्ना है जो युद्ध की भयावहता और परिस्थितियों की क्रूरता को साफ बयां करता है.


