
अजय देवगन को बॉलीवुड में तीन दशक से ज्यादा हो चुके हैं और इतने लंबे सफर में उन्होंने खुद को एक ऐसे अभिनेता के तौर पर स्थापित किया है,जिसे किसी एक इमेज में बांधना मुश्किल है। कभी एक्शन हीरो, कभी गंभीर किरदार, कभी कॉमेडी और कभी बिल्कुल शांत लेकिन असरदार कैरेक्टर—अजय ने हर रंग आजमाया है। लेकिन उनके मौजूदा दौर को देखते हुए एक सवाल जरूर उठता है: क्या अजय देवगन का स्टारडम अब ऐसीकहानियों पर ज्यादा निर्भर हो गया है, जिन्हें पहले कहीं और आजमाया जा चुका है?
दृश्यम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हिंदी दर्शकों के बीच अजय देवगन और फिल्म की कहानी दोनों को खूब पसंद किया गया, लेकिन इसकीबुनियाद मलयालम की उसी नाम की फिल्म पर थी। अजय ने विजय सालगांवकर के किरदार में अपनी गंभीरता और सहज अभिनय जरूर जोड़ा, लेकिन कहानी का मूल आइडिया नया नहीं था। इसके बाद शैतान आई, जो गुजराती फिल्म वश का हिंदी रूपांतरण थी। यहां भी अजय जैसे बड़े स्टारकी मौजूदगी ने फिल्म को हिंदी बेल्ट में एक अलग पहुंच दी, लेकिन मूल कहानी पहले ही दूसरी इंडस्ट्री में अपना असर साबित कर चुकी थी। ऐसे मेंसवाल यह बनता है कि जब कहानी की ताकत पहले से जांचीपरखी हो, तब एक सुपरस्टार के लिए जोखिम आखिर कितना रह जाता है?
रीमेक होना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। भारतीय सिनेमा में एक भाषा की अच्छी कहानी का दूसरी भाषा में जाना कोई नई बात नहीं। कई बाररूपांतरण मूल फिल्म को नए दर्शकों तक पहुंचाता है और अभिनेता अपनी अदाकारी से किरदार को एक अलग पहचान भी दे देता है। परेशानी तब शुरूहोती है जब रीमेक सुरक्षित फॉर्मूला बन जाए। किसी दूसरी इंडस्ट्री में फिल्म चलती है, उसके अधिकार खरीदे जाते हैं, बड़ा स्टार लिया जाता है औरउम्मीद की जाती है कि सफलता भी उसी रास्ते से दोबारा सिनेमाघरों तक पहुंच जाएगी। निर्माता के नजरिए से यह व्यावहारिक फैसला हो सकता है, लेकिन अजय देवगन जैसे अनुभवी स्टार से दर्शक शायद थोड़ा ज्यादा उम्मीद कर सकते हैं।
क्योंकि अजय खुद यह साबित कर चुके हैं कि उन्हें दर्शकों तक पहुंचने के लिए किसी सफल कहानी का सहारा लेने की जरूरत नहीं है। रेड जैसीफिल्मों में उनका अभिनय और कहानी दोनों अपनी अलग पहचान बनाते हैं। तानाजी में भी उन्होंने एक ऐतिहासिक किरदार को बड़े पर्दे पर अपनी स्टारपर्सनैलिटी के साथ पेश किया। उनके करियर में कई ऐसी फिल्में हैं जहां उनका अभिनय ही कहानी की सबसे बड़ी ताकत बना। यही वजह है कि जबवही अभिनेता बारबार ऐसी कहानियों का हिस्सा बनता है जिन्हें दर्शक पहले किसी दूसरी भाषा में देख चुके हैं, तो सवाल थोड़ा ज्यादा चुभता है।
और आज का दर्शक भी पहले जैसा नहीं रहा। पहले किसी रीजनल फिल्म का हिंदी रीमेक आने तक शायद बहुत कम लोगों को पता होता था कि मूलफिल्म कहां बनी थी। अब ओटीटी, सोशल मीडिया और डब फिल्मों ने यह दूरी लगभग खत्म कर दी है। मलयालम, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ या गुजरातीफिल्में दर्शकों के फोन तक पहुंच चुकी हैं। इसलिए जब किसी पुरानी कहानी का हिंदी वर्जन आता है तो दर्शक सिर्फ यह नहीं पूछता कि “फिल्मअच्छी है?” वह यह भी पूछता है—“इसमें नया क्या है?”
यहां अजय देवगन की आलोचना उनकी उपलब्धियों को कम नहीं करती, बल्कि उनसे उम्मीद बढ़ाती है। वह ऐसे मुकाम पर हैं जहां कोई निर्माता उनकेसाथ नई कहानी पर दांव लगा सकता है। उनके पास स्टार पावर भी है और अभिनय का अनुभव भी। ऐसे में अगर वह किसी बिल्कुल नए और अनदेखेआइडिया के साथ आते हैं और उसे बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता दिलाते हैं, तो उसका असर किसी सफल रीमेक की जीत से कहीं बड़ा होगा।
दृश्यम और शैतान की सफलता को नकारा नहीं जा सकता। दोनों फिल्मों ने दर्शकों को प्रभावित किया और अजय ने अपने किरदारों को मजबूती सेनिभाया। लेकिन तीन दशक से ज्यादा के करियर के बाद शायद उनके लिए अगला रोमांच यही होना चाहिए कि ऐसी कहानी चुनी जाए जिसकीसफलता का कोई पुराना रिपोर्ट कार्ड मौजूद न हो। आखिर किसी सुपरस्टार की असली ताकत तब सामने आती है, जब उसके पीछे पहले से हिटकहानी की गारंटी नहीं होती। अजय देवगन के पास वह मुकाम और काबिलियत दोनों हैं—अब देखना यह है कि वह उस ताकत का इस्तेमाल कितनी बार अपनी और बिल्कुल नई कहानियों के लिए करते हैं।
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