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​Manusmriti: बाहर से जोड़ी गईं विवादित चीजें… अंग्रेजों ने कैसे तैयार की बांटने वाली मनुस्मृति?

मनुस्मृति पर क्यों सवाल उठते हैं? विवाद क्यों होता है? क्या आज भी लोगों के पास जो मनुस्मृति है वही वास्तविक है? टीवी9 के पॉडकास्ट में मनुस्मृति पर शोध करने वाले और बनारस विश्वविद्यालय में भारतीय अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर राकेश उपाध्याय ने इन्हीं सवालों के जवाब दिए. वह कहते हैं, सबसे बड़ा सवाल है कि मनुस्मृति की जो किताब आमतौर पर लोगों के पास है कि वो उन्हें कहां से मिली है क्योंकि यह न किसी शंकराचार्य के आश्रम में है. न ही किसी आचार्य गुरुकुल परंपरा में यह ग्रंथ देखा जा रहा है. काशी में आज भी लगभग 50 से ज्यादा गुरुकुल हैं. किसी गुरुकुल में इसकी कोई कॉपी नहीं है. क्यों नहीं है? क्योंकि आज जो मनुस्मृति प्रचलित है दुनिया भर में यह किसी गुरुकुल में पढ़ाई नहीं जाती.

​Manusmriti: बाहर से जोड़ी गईं विवादित चीजें… अंग्रेजों ने कैसे तैयार की बांटने वाली मनुस्मृति?

सनातन वैदिक धर्म को या हिंदू धर्म को जो कह लीजिए आप उसका जो नाम दीजिए सनातन धर्म तो कहते ही हैं. उसका जो स्वरूप जगदगुरु आदि शंकराचार्य के समय चार पीठों के द्वारा विकसित हुआ उसकी किसी पीठ में यह प्रति नहीं है. खुद जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने इस पर कुछ नहीं लिखा. कुछ टिप्पणी नहीं लिखी है. इतनी ही महत्वपूर्ण होती तो आदि शंकराचार्य जरूर लिखते. उन्होंने उपनिषदों का भाष्य लिखा है. एक से एक बढ़कर दृश्य विवेक लिखा है. विवेक चूड़ामणि लिखी है. मनु का नाम भी बड़े सम्मान से लिया है. लेकिन वो नहीं लिखा जो आज के दौर में बताया जा रहा है.

वर्तमान किताब कहां से आई?

प्रोफेसर राकेश उपाध्याय कहते हैं, यह किताब मूल रूप से भारतीय परंपरा से हमको नहीं मिली है. यह किताब स्टेप बाय स्टेप मुगलों के जमाने से अनेक हाथों में होते हुए विभिन्न स्मृतियों से निकलते हुए यह विलियम जोंस के हाथ में आई है. अंग्रेजों के हाथ में आई है. अब सवाल है कि विलियम जोंस कौन थे? कैसे क्या हुआ? आपका पक्ष क्या है?

मनुस्मृति.

भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण दुनिया जानती है. जो प्लासी का युद्ध हुआ, बक्सर का युद्ध हुआ उसके बाद 1761 में जब अवध का बंगाल का जो रेवेन्यू राइट्स था वो ब्रिटिश के हाथ में चला गया. 1608 से ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में प्रवेश किया. सूरत से एंट्री की. सबसे पहले अपना स्टेशन मुंबई और चेन्नई में बनाया. मुंबई तो दहेज में उन्होंने ले ली क्योंकि मुंबई द्वीप समूह थे जो पुर्तगालियों के पास थे. हम पुर्तगाली रानी की शादी ब्रिटेन के राजकुमार से हुई और उस ब्रिटेन के राजकुमार से ईस्ट इंडिया कंपनी ने किराए पर मुंबई ले ली, तो मुंबई प्रेसिडेंसी पर इन्होंने अपना ऑफिस खोल लिया. उसके बाद ये चेन्नई पहुंच गए मद्रास में. यहां ब्रिटिश प्रेस भी आ रहा है.

भारत में 1556 में जेसिट पादरी गोवा में प्रेस लेकर आया. बाइबल छपी. बाइबल चेन्नई में तमिल में छपी. मलयालम की जो कॉपी है वो तो वेटिकन में ही छपी. इवेंज इवेंजिकल मिशन चालू हुआ. 1698 ईस्ट इंडिया कंपनी के चैप्लिंस को आदेश मिला कि आप लोग भारत में कन्वर्जन चालू करिए. बाइबल छप रही है, लेकिन बाइबल कोई ले नहीं रहा है भारत में. इतनी कोशिश के बाद भी कन्वर्जन हो नहीं रहा है.

मनु स्मृति पर सबसे बड़ी पड़ताल…
1 सितंबर रात 8 बजे

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…ना काहू से बैर

मनु स्मृति में अंग्रेजों की मिलावट का लाइव पर्दाफाश

बाजार में उपलब्ध मौजूदा मनु स्मृति की क्या वास्तविकता है, यह कैसे भारत के लोगों को मिली, इसके विवादित, प्रक्षिप्त हिस्सों pic.twitter.com/7CWqWpM6nN

— Prof Rakesh Upadhyay August 31, 2026

धर्म परिवर्तन

प्रोफेसर राकेश उपाध्याय कहते हैं, जेवियर ने तमिलनाडु में मछुआरों का पहला मास कन्वर्जन किया. तलवार की धार पर किया. उनके सामने चुनौती थी कि बाइबल तो कोई ले नहीं रहा है. तब ये स्ट्रेटजी वो फॉर्मुलेट कर रहे हैं कि बाइबल क्यों पढ़ा रहे हो? पहले इनको इनका चरित्र दिखाओ. इनको इनका टेक्स्ट दिखाओ. तो ये टेक्स्ट छापने का काम चालू हो गया. वस्तुतः मनुस्मृति रोमन एंपायर की खोज रहा है पिछले 3000 साल से. इसीलिए मैं यहां हो सकता है कुछ विद्वान इसमें मतभेद करें. लेकिन अंग्रेजी का जो शब्द है मैनुस्क्रिप्ट, इस पर इसके बड़े मत हैं. मनुस्मृति का शब्द उच्चारण नहीं कर पाए तो मैनुस्क्रिप्ट बोलने लगे. कुछ लोग बोलते हैं मैन से भी निकला है. मैन से भी निकला है तो मैन भी मन से आया है. खैर हम उसमें नहीं जाते हो जाएगा.

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में 1813 में ऑफिशियल चार्टर के द्वारा ब्रिटिश सरकार से धर्म प्रचार की ईसाई धर्म प्रचार की और मतांतरण की छूट ले ली, कि इसको अब हम ऑफिशियल करेंगे लेकिन 1775 से लेकर 1813 के बीच क्या हुआ है? 1776 में पहली बार जब कोलकाता में प्रेस आया तो उसमें बाइबल छाप गए. लेकिन वहीं पर यह कह रहे हैं जेंटू लॉ क्योंकि अंग्रेज हिंदू को हिंदू बोल नहीं पा रहा है. तो वह बोलता है जटू हमारे गांव में बनारस में बोलते हैं झंटू. तो ये जो जेंटू झटू बोलने लगे हिंदू.

बातचीत में प्रोफेसर राकेश उपाध्याय एनबी हेलहेड का जिक्र करते हुए कहते हैं कि वो एक पर्शियन के जानकार और ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी थे. अंग्रेजी जानते थे. संस्कृत के कुछ पंडितों को लेकर उसने पहली बार पर्शियन में मनुस्मृति का अनुवाद किया. हेलहेड ने खुद ही बहुत सारी चीजें गलत की हैं. छेपक जोड़े. मनुस्मृति पहले से ही छाप के अंग्रेज ने रख ली थी. हेल हेड ने जो छापी थी वो न संस्कृत से पर्शियन में और पर्शियन से फिर अंग्रेजी में ट्रांसलेट हुई. एनबी हेलहेड द्वारा 1776 लंदन से छपी उस समय प्रेस आया था कोलकाता में, लेकिन ये कॉपी ट्रांसलेट करके लंदन गई. वहां से ब्रिटिश गवर्नमेंट ने छापी.

विलियम जो वारेन हेस्टिंग को चिट्ठी लिखता है कि मिस्टर हेलहेड ने जो पहली मनुस्मृति छापी है वो गड़बड़ हो गई. विलियम जोंस ने हेलहेड के बारे में रिपोर्ट दे दी कि साहब इसने तो गड़बड़ छाप दिया है. इसमें तो वो चीज है नहीं जो हमें डालनी है. वारेन हेस्टिंग को चिट्ठी लिखी गई कि इसे रद्द करो. 1776 में जो छप गई उसको हटाओ.

1784 में 15 जनवरी को बंगाल एशियाटिक सोसाइटी का गठन हुआ. इसमें चार्ल्स विल्किंस समेत कई विद्वान थे. इन्होंने मिलकर वारेन हेस्टिंग को कहा कि आप इस सोसायटी के पहले अध्यक्ष रहेंगे. वारेन हेस्टिंग ने कहा, मैं बहुत व्यस्त हूं आप लोग ये लिखने पढ़ने का काम संभालो. वारेन हेस्टिंग ने विलियम जोंस को नियुक्त कर दिया.

विलियम जोंस ने कहा, आप हमें ब्रिटिश पार्लियामेंट से पैसा रिलीज कराइए. बहुत सारे पंडितों को दक्षिणा देनी पड़ेगी और उसमें पर्शियन स्कॉलर्स भी लगेंगे. यह जो 11 पंडितों की कमेटी थी उस 11 पंडितों की कमेटी में सात पंडित और जोड़े गए. ये पंडित कौन थे? ये सब ईस्ट इंडिया कंपनी के पेरोल पर चलने वाले उस समय बंगाल के जितने राजे रजवाड़े थे छोटेछोटे उनके पंडित थे जो उनको राजकाज में सहयोग देते थे.ये वारेन हेस्टिंग के इशारे पर ये लोग आ गए.

इसमें तीन पंडितों का जो विशेष उल्लेख आता है उसको लेकर बारबार इसमें टिगेन माउथ ने लिखा है जिसने उसको संस्कृत भी सिखाई क्योंकि ये बारबार लिखा है कि कोर्ट में पंडितों में झगड़ा हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट में एक पंडित कहता है मेरा असली लॉ है. दूसरा पंडित कहता है मेरी विधि ठीक है. तीसरा कह रहा है साहब मेरे पास असली स्मृति है. बोले कितनी स्मृति है? कहा, 36 स्मृति तो बंगाल में हमारे पास है. कोई एक लॉ से भारत कभी गवर्न नहीं हुआ. भारत के हो 562 गणराज्य थे उनके सबके अपनेअपने ट्रेडिशनल लॉ थे. अलिखित भी थे. जैसे ब्रिटिश ब्रिटेन में संविधान लिखित नहीं है आज भी. हम वैसे ही भारत में भी परंपरा श्रुत से चलती थी. हमको लॉ को एग्जीक्यूट करना है. तो ये भारतीय जो लोग थे, राजा थे, यह न्याय और नीति को ध्यान में रखकर चलते थे. कोई यह कह देना कि मनुस्मृति से भारत चल रहा था. यह बिल्कुल गलत बात है. वाहियात बात है. लेकिन मनु का सम्मान था. मनु का उद्धण था. तो ये जो 36 ग्रंथ थे ये पंडितों ने जो हेलहेड को दिए थे.

हेलहेड से फिर इनको आ गए विलियम जोंस को. विलियम जोंस ने सीरियसली 1786 से काम चालू कर दिया. और वो खुद ही लिखता है सुबह 8:00 बजे से लेकर 11 बजे तक तो इसका काम करता था. दिन भर कोर्ट में रहता था. कोर्ट में झगड़े निपटाता था और उसने लिखा है कि ये पंडित हमको मूर्ख बनाते हैं. सोचते हैं हमको संस्कृत नहीं आती है. बेवकूफ बना लेंगे. हम बेवकूफ नहीं बनेंगे. हम जो है भारत की 2 करोड़ प्रजा के लिए एक लॉ बुक लेकर के आएंगे.

कब पब्लिश हुई मनुस्मृति?

डॉक्टर प्राइज को कृष्णा नगर से 14 सितंबर 1790 को चिट्ठी लिखी विलियम जोंस ने. ब्रिटिश गवर्नमेंट ने 1794 में पहली बार मनुस्मृति ऑफिशियली पब्लिश कर दी. जो कोलकाता से पब्लिश हुई वो विलियम जोंस की एडिटेड कॉपी थी. वो वास्तविकता में कुल्लू भट्ट की जो कॉपी थी उसको ही मिलाया और उसमें मेधाथि को भी मिलाया जितनी कॉपियां मिली थीं सबका इन्होंने मिलाजुला करके के एक एक कॉपी छापी. उसने यह लिखा, 2 करोड़ हमारी प्रजा है. अब यहां कहते हैं ट्रांसलेट किया विलियम जोस ने. कोई ट्रांसलेट नहीं किया है. कंपाइल किया है. हम उसको व्यवस्थित कर रहे हैं.

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